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काला अध्याय: आपातकाल

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काला अध्याय “ पराधीन सपनेहु सुख नाहीं “ इस बात को भले ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने सोलहवीं शताब्दी के मध्य में लिखा था, पर धरातल पर चरितार्थ होते हुए कई बार देखा गया है। यदि बात आधुनिक समय की जाए तो इसका जीता-जागता उदाहरण आपातकाल का समय था। जिसने लोकतंत्र के मुंह पर कालिख पोत दी। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाले भारत नें शायद ही ऐसा सोचा था कि उसका लोकतांत्रिक इतिहास इस तरह कलंकित होगा। जो राजनीतिक दल उस समय सत्ता में था उसे भी उस समय की बात करनें में शर्म आती है। शायद इसी कारण से उस पार्टी का कोई भी सदस्य कभी भी उस समय विशेष की बात नहीं करता है। या फिर यह भी हो सकता है कि भय वश इतनी शक्ति ही नहीं एकत्रित कर पाता कि उस आपातकाल की बात कर सके।        दुनिया भर से कांपी पेस्ट करके थोपे गए संविधान को वास्तविक आइना तो शायद आपातकाल के समय में दिख गया था, पर हम भारतीय हैं, जो ठोकर खाकर गिरने के बाद कभी भी उस पत्थर को नहीं हटाते जिसके कारण हम गिरे थे।       कई वर्ष बीत चुके हैं उस दौर को , पर आज इस बात को प्रमुखता देने का ...