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Showing posts from January, 2018

छात्रों में अनुशासन लोकतंत्र का आधार है

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                         छात्रों में अनुशासन लोकतंत्र का आधार है    लोकतंत्र की परिभाषा में ही हमें बता दिया जाता है कि इस प्रणाली में हमें सबकी सहभागिता की आवश्यकता होती है। सबके साथ से ही देश के विकास का रास्ता बन पाता है। यदि बात साथ की हो रही है तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि सबसे महत्वपूर्ण सहयोग रहता है छात्रों का , जो किसी भी देश के कायाकल्प में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन करते हैं। अगर हम छात्रों की ही बात कर रहे हैं तो हमें इसपर भी ध्यान देना होता है कि छात्रों में अनुशासन की भावना का होना आवश्यक होता है। अनुशासन की भावना इसलिए कहा क्योंकि अनुशासन किसी के सिखाने से नहीं आ सकता है , यह एक मात्र हमारे अन्दर ही अपने आप उत्पन्न होने वाली भावना है , जो हमें औरों से अलग करती है। अत :   यदि स्व :  अनुशासन की बात की जाए तो यह अधिक सही रहेगा। यदि छात्र अनुशासित होंगे तो स्वाभाविक है कि देश का प्रत्येक नागरिक अनुशासित होगा। क्योंकि यह तो स्पष्ट ही है क...

देश प्रेम

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                  देश प्रेम         नागरिकों का देश प्रेम ही देश के भविष्य की राह प्रशस्त करता है। नागरिकों के सहयोग के बल पर ही कोई राष्ट्र सम्पन्नता के शिखर पर पहुंच सकता है। आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में हमें जितने भी राष्ट्र सशक्त और संपन्न दिख रहे हैं, उन सभी का एकमात्र आधार उस देश के नागरिक ही हैं। सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक आदि कई तरह की विषमताएं दुनिया के सभी देशों में व्याप्त हैं पर शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां पर नागरिकों में अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम का भाव व उस भाव में एकमतता न हो। जब बात देश की हो या फिर देश हित की हो तो हम सभी को एकमत होकर सिर्फ और सिर्फ देश के हित के लिए समर्पित हो जाना चाहिए। भारत में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है परन्तु सिर्फ मानसिक रूप से ही देश भक्त होने से देश का भला और हमारा भला नहीं हो सकता है। मैं बात करना चाहता हूं जापान की जो क्षेत्रफल में छोटा है पर अपने कार्यों में हमसे कहीं बड़ा है। जापान में प्रथम विश्व युद्ध के पहले से ही लोगों के अन्दर देश प्रेम की भावना भरी ...

मित्रता

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मित्रता दुनिया में अपने पदार्पण के बाद मनुष्य को संबंधों का एक जाल विरासत में मिलता है। जन्म से ही व्यक्ति अनगिनत रिश्तों की डोर से जुड़ा रहता है। कुछ रिश्ते मां के पक्ष से और कुछ रिश्ते पिता के पक्ष से हर व्यक्ति को स्वत : ही मिल जाते हैं। जब व्यक्ति का विवाह होता है तो इन रिश्तों में कुछ और लोग जुड़ जाते हैं। रिश्तों के अपने मायने भी होते हैं। इन्हीं रिश्तों की वजह से व्यक्ति सामाजिक प्राणी से रूप में परिवर्तित हो पाता है।     सामाजिक बन्धन कहे जाने वाले रिश्तों में से एक ही रिश्ता ऐसा है जो हम अपनी आप निर्धारित करते हैं और वह है मित्रता । वैसे तो मित्रता का अर्थ व्यापक होता है, जिन्हें आज के संकुचित विचारधारा के युवाओं का समझाना थोड़ा जटिल है। आज के परिपेक्ष में देखें तो जिस व्यक्ति से अपना स्वार्थ सिद्ध हो रहा होता है, हम उसे अपना मित्र कहने लगते हैं और जैसे मतलब निकल गया सामने वाला गया भाड़ में। अब इसे मित्रता का नाम देना वास्तव में मित्रता शब्द का अपमान करना ही तो है। जब मित्रता की बात आती है तो हमारे मस्तिष्क में सबसे पहले एक चित्र स्वत : ...

अनर्गल अलाप

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अनर्गल अलाप      देश को सशक्त देश के नागरिक बनाते हैं और उस सशक्तिकरण को लम्बे समय तक बनाए रखने का दायित्व उस देश के वैचारिक विद्वानों का होता है। यदि बात लोकतंत्र के सापेक्ष में की जाए तो न्यायपालिका और मीडिया की यह जिम्मेदारी बनती है कि देश को मजबूत बनाने के लिए सदैव तत्पर रहें। विगत कई वर्षों से कुछ ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं जोकि भारत में पहले कभी नहीं हुई। कुछ नए शब्दों का प्रादुर्भाव हुआ है या यूं कहें कि इन शब्दों को जबरन बनाया गया है। असहिष्णुता – ये क्या होता है, यह तो बाद की बात है, आज भी इसको बोलने में सामान्य लोगों को दिक्कत होती है। अब रही बात असहिष्णुता की तो जो लोग सामान्य लोगों की श्रेणी से भिन्न हैं और उन्हें अति विशिष्ट श्रेणी में रखा जाता है, वे लोग कहते हैं कि देश में असहिष्णुता है, तो शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो उन महाशय की राजनीतिक मनोदशा को न समझ सका हो। हां अगर यही बात देश की आम जनता ने कही होती तो बात विचारणीय हो जाती है। लेकिन कुछ लोग आपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण जबरन ऐसी बातों को फैलाने में लगे रहते हैं, जिनका जन-मानस से प्रत्...