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मित्रता

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मित्रता दुनिया में अपने पदार्पण के बाद मनुष्य को संबंधों का एक जाल विरासत में मिलता है। जन्म से ही व्यक्ति अनगिनत रिश्तों की डोर से जुड़ा रहता है। कुछ रिश्ते मां के पक्ष से और कुछ रिश्ते पिता के पक्ष से हर व्यक्ति को स्वत : ही मिल जाते हैं। जब व्यक्ति का विवाह होता है तो इन रिश्तों में कुछ और लोग जुड़ जाते हैं। रिश्तों के अपने मायने भी होते हैं। इन्हीं रिश्तों की वजह से व्यक्ति सामाजिक प्राणी से रूप में परिवर्तित हो पाता है।     सामाजिक बन्धन कहे जाने वाले रिश्तों में से एक ही रिश्ता ऐसा है जो हम अपनी आप निर्धारित करते हैं और वह है मित्रता । वैसे तो मित्रता का अर्थ व्यापक होता है, जिन्हें आज के संकुचित विचारधारा के युवाओं का समझाना थोड़ा जटिल है। आज के परिपेक्ष में देखें तो जिस व्यक्ति से अपना स्वार्थ सिद्ध हो रहा होता है, हम उसे अपना मित्र कहने लगते हैं और जैसे मतलब निकल गया सामने वाला गया भाड़ में। अब इसे मित्रता का नाम देना वास्तव में मित्रता शब्द का अपमान करना ही तो है। जब मित्रता की बात आती है तो हमारे मस्तिष्क में सबसे पहले एक चित्र स्वत : ...