वचन वचन से अभिप्राय वाणी से होता है। वाणी जिसका उपयोग हम अभिव्यक्ति के लिये करते हैं। अपने विचारों, भावों को व्यक्त करने के लिए हमें वाणी की आवश्यकता होती है। हम अपनी वाणी से ही किसी को अपना मित्र अथवा शत्रु बना सकते हैं। एक प्रचलित बात है कि कौवा किसी का शत्रु नही होता है परन्तु फिर भी अपनी कर्कस आवाज के कारण ही वह किसी को पसंद नही आता है। ठीक इसी तरह कोयल किसी को कुछ देती नही है परन्तु मीठी आवाज को कारण सभी उसको पसंद करते हैं। कबीर दास जी ने भी कहा है - ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए । औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होए ।। किसी को आहत करने कि लिए मात्र हम वाणी का यदि गलत उपयोग करते हैं तो यह ईश्वर की दी गई शक्ति का दुरुपयोग होगा जोकि हमें नही करना चाहिए। परन्तु हमनें सदैव ही इसका गलत उपयोग ही किया है। जिसनें भी वाणी पर नियंत्रण रख लिया या वाणी को नियंत्रित कर सिद्ध हस्त हो गया है वही अपनी वाणी को सार्थक कर पाया है। अर्थात उस व्यक्ति की कही गयी सभी बातें पूर्ण सत्य हो जाती हैं। शास्त्रों में भी कहा...
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Showing posts from April, 2017
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नमस्कार मित्रों आज हम जिस विषय पर चर्चा करने वाले हैं वह है मन। साधारणतया हर व्यक्ति मन को चंचल और अस्थिर बताता है जो कि पूर्ण सत्य नहीं है। यह मात्र मन की दुर्बलता या दोष हो सकते हैं, परंतु ईश्वर द्वारा दी गई मनुष्य को विभिन्न शक्तियों एवं सामर्थ में दोष एवं गुण दोनों ही विद्यमान हैं, परंतु हम साधारण दृष्टि से इन दोनों में से एक को ही देख सकते हैं। ऐसा ही कुछ हम मन के विषय में भी सोचते हैं। श्रीमद् भगवत गीता में श्रीकृष्ण ने शरीर रूपी रथ के संचालन के लिए मन को सारथी और आत्मा को महारथी की तरह समझाया है। जिसमें रथ का नियंत्रण तो मन के हाथ में ही होता है, परंतु मन का नियंत्रण आत्मा के हाथ में होता है। यदि हम शरीर रूपी रथ की कल्पना बिना मन के करते हैं तो यह असंभव है जिस प्रकार शरीर में जीवन के लिए आत्मा का महत्व ठीक उसी प्रकार शरीर को नियंत्रण करने के लिए मन का भी महत्व है, परंतु हम यहां पर यह अवश्य ध्यान देंगें कि मन का नियंत्रण आत्मा के हाथों हो रहा है या नहीं, क्योंकि यदि आत्मा के द्वारा मन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो मन स्वछंद रूप से अपने अनुसार कार्य करता ...
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स्वाद के कारण आज के समय सबसे अधिक चर्चा गौमांस पर हो रही है और चिंता की बात तो यह है कि इसको हवा देने का काम महान तथा कथित हिंदू महान भावों के माध्यम से हो रहा है । हम तर्क देते हैं कि भोजन करने और उसके चयन का अधिकार सभी को है । पर यह अधिकार तब तक ही है जब तक हम किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत न करें पर आज के परिद्रश्य में देखे तो इसका उपयोग मात्र और एक मात्र धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचाने के लिए ही किया जा रहा है । क्या हमेशा के लिये धार्मिक सद्भाव की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदूओं की ही है ।यह एक अच्छा अवसर है हमारे मुस्लिम और इसाई भाइयों के लिय़े है,उन्हें सार्वजनिक मंचों पर आ कर समाज में सामंजस्य के लिए अपना योगदान देने के लिये हिन्दुओं का साथ देना चाहिए । इस अवसर पर इनको आगे बड़कर गोमांस के मुद्दे पर हिन्दुओं का साथ देकर हिन्दु भावनाओं की रक्षा करनी चाहिए । सिर्फ मौन रहना ही समाधान नही हो सकता है , जबतक कि खुले मंच पर बोला न जाए और इससे उपयुक्त समय कोई नही हो सकता है । यदि आप लोग (मुस्लिम और इसाई) का खुलकर व...
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कुछ शर्म करो आज के समय में जब हमारा नैतिक पतन होता जा रहा तो हम अपनें में सुधार की जगह अब हिन्दू भगवानों पर उँगली उठाने लगे हैं । जिसको देखो बस श्री कृष्ण पर आरोप लगाने लगता है । पर उसनें शायद ही उसने कभी श्री कृष्ण का अध्ययन किया हो । सात दिन की आयु में पूतना का वध, पाँच वर्ष की आयु में रहस्य लीला ( रास लीला ) की और ग्यारह वर्ष में कंश का संहार किया । पर हम सिर्फ 16108 रानियो के विषय में ही जानते हैं या बात करते हैं ,पर वो भी अधूरी । इतनी संख्या में रानियों के बावजूद वह पूर्ण महायोगी थे । सिर्फ स्त्री सुरक्षा के लिये उन्होंने ऐसा किया । हमारा पतन इतना हो चुका है कि “ कलिकाल बेहाल किये सबही कोउ नही माने अनुजा तनुजा “ की स्तिथि आ चुकी है । हमें रिस्ते दिखाई देना बन्द हो चुके हैं । सिर्फ स्त्री पुरुष के अलावा हमें समझ में ही कुछ नही आता है , और हम अपनें में सुधार की जगह ईश्वर पर संदेह करते हैं । अपनी स...