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काला अध्याय: आपातकाल

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काला अध्याय “ पराधीन सपनेहु सुख नाहीं “ इस बात को भले ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने सोलहवीं शताब्दी के मध्य में लिखा था, पर धरातल पर चरितार्थ होते हुए कई बार देखा गया है। यदि बात आधुनिक समय की जाए तो इसका जीता-जागता उदाहरण आपातकाल का समय था। जिसने लोकतंत्र के मुंह पर कालिख पोत दी। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाले भारत नें शायद ही ऐसा सोचा था कि उसका लोकतांत्रिक इतिहास इस तरह कलंकित होगा। जो राजनीतिक दल उस समय सत्ता में था उसे भी उस समय की बात करनें में शर्म आती है। शायद इसी कारण से उस पार्टी का कोई भी सदस्य कभी भी उस समय विशेष की बात नहीं करता है। या फिर यह भी हो सकता है कि भय वश इतनी शक्ति ही नहीं एकत्रित कर पाता कि उस आपातकाल की बात कर सके।        दुनिया भर से कांपी पेस्ट करके थोपे गए संविधान को वास्तविक आइना तो शायद आपातकाल के समय में दिख गया था, पर हम भारतीय हैं, जो ठोकर खाकर गिरने के बाद कभी भी उस पत्थर को नहीं हटाते जिसके कारण हम गिरे थे।       कई वर्ष बीत चुके हैं उस दौर को , पर आज इस बात को प्रमुखता देने का ...

जीत के मायने

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जीत के मायने पिछले कुछ दिनों से चुनाव की गर्मी जारी थी, जो जीत और हार के परिणाम के साथ रुक भी गई। चुनाव चाहे गुजरात का रहा हो या फिर हिमांचल का सभी में एक बात स्पष्ट थी, कि जीत की चाह में राजनीति के नाम पर जो निर्रथक मुद्दे खड़े किए जा सकते हैं, वे सब आम जनता की समझ से परे थे। जीत और हार के साथ ही सभी मुद्दे कहां गुम हो जाते हैं ये बात शायद ही कोई भारतीय नागरिक हो, जो न जानता हो। क्योंकि जीतने के लिए जिस तरह की राजनीति का खेल आज के समय खेला जा रहा मुझे नही लगता कि यह राजनीति हो सकती है। आज राजनीति को युद्ध की तरह ही देखा जा रहा है जिसमें जीत आवश्यक है न कि यह कि किस तरह से जीत मिली। शायद यही वजह भी है कि राजनेताओं का सामाजिक और नैतिक पतन सर्वाधिक हो रहा है। पर उन्हें इसकी परवाह ही कहां है, उन्हें तो आर्थिक उत्थान की चिंता है।  जब चुनाव का समय करीब आ जाता है तो सबसे अधिक आशा नागरिकों के दिल में जागती है कि शायद अब हमारी समस्याओं के समाधान का समय करीब आ गया है। क्योंकि जिस तरह से पक्ष-विपक्ष के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियां जन समस्याओं की बात करती है शायद भारत के इतिहास में ...