धार्मिक शोषण
धर्म की आड़ में...... प्राचीन काल से ही मानव जीवन के धर्म का दबदबा कायम रहा है। शासन , प्रशासन और समाजिक जीवन इन सभी में धर्म का हस्ताक्षेप बना रहा है। यह बात किसी एक धर्म के लिए लागू नही होती है , बल्कि धर्म की बेड़ियों से मनुष्य को नियंत्रित रखने का कार्य सभी धर्मों ने किया है। हां यह जरूर रहा है कि कुछ धर्मों में कट्टरता की अधिकता देखने को मिल जाती है। प्रारम्भ में धर्म एक सामाजिक नियमावली की तरह ही था , जिसके माध्यम से सभी के मध्य समानता से कार्य वितरण सहजता से किया जा सके। लेकिन धर्म के तथाकथित रखवालों ने धर्म को सहज से जटिल बना दिया। अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए नए और जटिल नियम बनाए गए ताकि कुछ लोगों के हितों पर किसी तरह की आंच न आ सके। इन सभी में भय यानि की डर का सबसे विशेष महत्व रहा है। जन सामान्य को धर्म से डरा कर रखा गया है , जिससे लोगों के मन में किसी भी तरह से उस बात को बैठा दिया जाए जिससे विशेष वर्ग को लाभ मिल सके। पहले के यूरोपीय जगत में तो चर्चों के विरुद्ध बोलने की हिम्मत कोई नही कर पाता था , औऱ जिसने भी आवाज उठाई समझो उसे संसार से ही उठा दिया जाता था...