धार्मिक शोषण
धर्म की आड़ में......
प्राचीन काल से ही मानव जीवन के धर्म का दबदबा
कायम रहा है। शासन, प्रशासन और समाजिक जीवन इन सभी में धर्म का
हस्ताक्षेप बना रहा है। यह बात किसी एक धर्म के लिए लागू नही होती है, बल्कि
धर्म की बेड़ियों से मनुष्य को नियंत्रित रखने का कार्य सभी धर्मों ने किया है।
हां यह जरूर रहा है कि कुछ धर्मों में कट्टरता की अधिकता देखने को मिल जाती है।
प्रारम्भ में धर्म एक सामाजिक नियमावली की तरह
ही था, जिसके माध्यम से सभी के मध्य समानता से कार्य वितरण सहजता से किया जा
सके। लेकिन धर्म के तथाकथित रखवालों ने धर्म को सहज से जटिल बना दिया। अपना वर्चस्व
स्थापित करने के लिए नए और जटिल नियम बनाए गए ताकि कुछ लोगों के हितों पर किसी तरह
की आंच न आ सके।
इन सभी में भय यानि की डर का सबसे विशेष महत्व
रहा है। जन सामान्य को धर्म से डरा कर रखा गया है, जिससे लोगों के
मन में किसी भी तरह से उस बात को बैठा दिया जाए जिससे विशेष वर्ग को लाभ मिल सके। पहले
के यूरोपीय जगत में तो चर्चों के विरुद्ध बोलने की हिम्मत कोई नही कर पाता था, औऱ
जिसने भी आवाज उठाई समझो उसे संसार से ही उठा दिया जाता था। कहने को तो राजतंत्र
था पर वास्तव में राजा के माध्यम से शासन को पादरी ही चलाते रहे हैं। ऐसी ही
स्थिति भारत में ही रही है। वैदिक काल में जो धर्म लोगों की सुविधाओं के लिए बनाया
गया, उस धर्म की सहायता से लोगों को धार्मिक दासता दे दी गई और इस बात का
लोगों को पता भी न चला कि वे कब धार्मिक दासता की बेड़ियों में बंध गये।
धर्म का बीज हमारे मस्तिष्क में अपनी जड़े
फैलाता रहता है और हमारे शरीर को कब अपनी जकड़ में ले लेता है, हमें स्वयं ही पता
नही चलता है। यदि किसी ने हमें वास्तविकता दिखाने का प्रयास भी किया तो वह हमें
अपने दुश्मन की तरह दिखता है क्यूंकि हमारे शरीर पर अब धर्म की पकड़ मजबूत हो चुकी
होती है। हम इतने धर्मान्ध हो चुके होते हैं कि हमें जो दिखाया जाता है, वही देखना
पसंद करते हैं। वास्तविकता से हमारी दूरी निरंतर बड़ती जाती है। इसी अवस्था में
हमारा शोषण आरम्भ हो जाता है। हमारी मूर्खता जिसे हम धार्मिकता कहते हैं, उसका
लाभ लेकर कुछ लोग प्रभुत्व संपन्न और धनाड्य हो जाते हैं औऱ हम सिर्फ और सिर्फ
कठपुतली बन कर रह जाते हैं। यह परम्परा आज की नही अपितु वर्षों पुरानी है, जिसमें
लोगों को धर्म की आड़ से मूर्ख बना कर अपना उल्लू
सीधा किया जा रहा है।
धर्म का वास्तविक तात्पर्य कर्म से जुड़ा होता
है, यदि आप अपने कर्तव्यों का निर्वाहन सही तरह से कर रहे हैं तो आप धर्म
का पालन कर रहे हैं। आपने कर्तव्यों को न करके, अकर्मण्य बन कर
रहना किसी धर्म की परिभाषा नही हो सकती
है। पर वास्तव में आज ऐसा ही हो रहा है। कुछ ऐसे दलाल आ पनपे हैं जो आपको बिना कोई
कर्म किए सीधे वैकुण्ठ को जाने वाले विमान की टिकट दिलाने की गारंटी भी लेते हैं, पर
वास्तव में जो व्यक्ति स्वयं मुक्ति को न पा सका आपको मुक्ति कैसे दिला सकता है।
विडम्बना तो यहीं से शुरू होती है, हर व्यक्ति यही
चाहते है कि वह किसी लघु मार्ग से ईश्वर के समीप पहुंच जाए। और ये जो पहुंचने और
पहुंचाने का खेल है, यही तो आज का प्रमुख व्यवसाय बन गया है। क्षमा कीजिए आज
का नही बल्कि यह व्यवसाय तो बहुत ही पुराना हो चुका है। यह बात अलग है कि आज के
समय इस काम में दलालों का आगमन अधिक हो गया है और हो भी क्यूं न भला जब लुटने वाला
स्वयं चल कर लुटरे के पास आ रहा हो तो इसमें लूटने वाले का क्या दोष, उसका
तो काम ही है लूटना।
पिछले कुछ वर्षों में प्रसिद्ध दलालों के काले
कारनामों को उजागर किया गया है। लेकिन वास्तव में आज जितने लोग पकड़े गए हैं, उससे
कहीं अधिक माफिया अभी भी धर्म का चोला ओड़े धार्मिक स्थानों में छिपे हुए हैं। इस
तरह के लोग किसी एक धर्म विशेष में ही नही बल्कि सभी धर्मों में होते हैं। यह बात
अलग है कि जहां लोग जागरूक अधिक होते हैं वहां पहले पकड़ में आ जाते हैं। एक बात
यह भी हो सकती है कि लोगों के मन में आज भी धर्म का डर इतना हो कि विरोध करने की
ताकत ही न जुटा पा रहे हों। जब तक यह धर्म का भय हमारे अन्दर भरा रहेगा हमारा
धार्मिक शोषण होता रहेगा, यह बात तो निश्चित ही है। अगर कोई व्यक्ति यह बोले कि हमारे
धर्म का कोई धार्मिक गुरू अभी तक नही गलत सिद्ध हुआ है तो यह उस व्यक्ति की
मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नही हो सकता है। क्यूंकि आप जिस धर्म की बात कर रहें हैं
वहां पर लोगों पर इतनी पाबंदी है कि आप तो क्या आप जैसे हजार लोगों की हिम्मत ही
नही पड़ती है कि आप कुछ बोल सकें।
इन सभी बातों का यह मतलब बिल्कुल नही है कि
जितने लोग धार्मिक प्रवृत्ति के हैं या धर्म गुरू हैं, सभी
के सभी गलत हों। जो वास्तव में धर्म के तत्व ज्ञानी हैं, वे
सभी न तो आपको प्रलोभन देते हैं और न ही धर्म को धन संग्रह का जरिया बनाते हैं।
ऐसे व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ दिशानिर्देशन करते हैं। उस पर अमल करना या न करना आप
पर निर्भर करता है। इन लोगों का लक्ष्य समाज की भलाई करना और जरूरतमंदों तक आवश्यक
सुविधाएं पहुंचाना होता है। जिसके लिए ये अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। स्वयं को
विलासता से दूर रखते हैं, और लोगों के दुःख को अपना दुःख मानते
हैं। इस तरह के लोगों की निश्चित वेश-भूषा नही होती है और न ही कोई स्वार्थ।
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