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जीत के मायने

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जीत के मायने पिछले कुछ दिनों से चुनाव की गर्मी जारी थी, जो जीत और हार के परिणाम के साथ रुक भी गई। चुनाव चाहे गुजरात का रहा हो या फिर हिमांचल का सभी में एक बात स्पष्ट थी, कि जीत की चाह में राजनीति के नाम पर जो निर्रथक मुद्दे खड़े किए जा सकते हैं, वे सब आम जनता की समझ से परे थे। जीत और हार के साथ ही सभी मुद्दे कहां गुम हो जाते हैं ये बात शायद ही कोई भारतीय नागरिक हो, जो न जानता हो। क्योंकि जीतने के लिए जिस तरह की राजनीति का खेल आज के समय खेला जा रहा मुझे नही लगता कि यह राजनीति हो सकती है। आज राजनीति को युद्ध की तरह ही देखा जा रहा है जिसमें जीत आवश्यक है न कि यह कि किस तरह से जीत मिली। शायद यही वजह भी है कि राजनेताओं का सामाजिक और नैतिक पतन सर्वाधिक हो रहा है। पर उन्हें इसकी परवाह ही कहां है, उन्हें तो आर्थिक उत्थान की चिंता है।  जब चुनाव का समय करीब आ जाता है तो सबसे अधिक आशा नागरिकों के दिल में जागती है कि शायद अब हमारी समस्याओं के समाधान का समय करीब आ गया है। क्योंकि जिस तरह से पक्ष-विपक्ष के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियां जन समस्याओं की बात करती है शायद भारत के इतिहास में ...