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Showing posts from November, 2017

शर्म की बात

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                        शर्म की बात                         दुनिया का इतिहास जिस किसी को भी याद हो, उससे आप एक बात जरूर पूछिएगा कि पूरी दुनिया में जितने भी देश आज संपन्नता की श्रेणी में अग्र भाग पर आते हैं, उनके विकास का समय काल कितना रहा है। मुझे नहीं लगता कि किसी का भी जवाब चार, पांच, या फिर छ :  दशक के अलावा कुछ और होगा। इतनें ही समय में दुनिया के दिग्गज देशों ने अपने आपको इस स्थिति में ला खड़ा किया है कि मुझे दिग्गज शब्द का उपयोग करना पड़ रहा है। आपके मन में यह विचार तो आ ही रहा होगा कि शीर्षक के आधार पर तो विषय का मेल नहीं हो पा रहा है। परेशान मत होइए यह कार्य मेरा है जो मैं अच्छे से करना जानता हूं। संसार के सभी प्रभुत्व संपन्न देशों की एक लिस्ट बनाइए और देखिए कि उन देशों के नागरिकों और वहां कि सरकार ने अपने देश को शिखर पर लाने के लिए कितनी मेहनत की है। यहां पर मैंने नागरिकों का जिक्र पहले किया है।...

बालदिवस: नेहरू ही क्यों ?

    बालदिवस: नेहरू ही क्यों ?  हर वर्ष 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाता है, जी मैं जानता हूं कि आपको ये बात अच्छे से पता है। लेकिन समस्या यह है कि बाल दिवस मनाया क्यों जाता है ? आपका जवाब शायद यही होगा कि जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को हम बाल दिवस के रूप में मनाते हैं। मेरी समस्या भी इसी जवाब से ही उत्पन्न होती है। आखिर नेहरू ने बच्चों के लिए ऐसा क्या कर दिया कि उनके जन्मदिन को बच्चों को समर्पित कर दिया गया। साथ ही यह बात भी दिमाग में चूहे की तरह छेद करने लगती है कि बाल दिवस तो सन् 1925 में ही मनाना आरम्भ कर दिया गया था औऱ सन् 1935 में पूरी दुनिया नें इसे मान्यता भी दे दी थी, तो नेहरू नाम की ये बत्ती किसने जला दी। मोतीलाल के लाल के किस्से तो जग-प्रसिद्ध हैं, आपने भी सुनें ही होगें। हां ये हो सकता है कि आप इन सब बातों पर विश्वास न करते हों पर बिना आग के धुंआ तो उठता भी नहीं साहब जी। फिर किस्से भी इतने हैं कि मन-गढ़ंत हों ऐसा प्रतीत भी नहीं होता। खैर वो बात न करके हम आते हैं मोती के लाल से भविष्य के लाल, पीले, नीले, गुलाबी यानी कि बच्चों पर, जिस पर हमें बात करनी है। ...

बलात्कार: अपराध या मानसिकता

बलात्कार : अपराध या मानसिकता दुनियां में होने वाले अपराधों में सबसे घृणित और वहशी अपराधों की श्रेणी में आने वाला अपराध बलात्कार को ही माना जाता है। किसी की अस्मिता को तार-तार करना वह भी मात्र अपनी वासना की छुधा को शान्त करने के लिए, इससे अधिक जघन्य अपराध कोई नहीं हो सकता है। इस अपराध के पीछे अपराध करने वाले की मानसिकता का प्रभाव होता है, जिसके कारण वह इस तरह के भयानक अपराध को करने से पहले और बाद में आने वाले परिणाम के बारे में भी नहीं सोचता है।   अपराध के कारण शिक्षा :    इस तरह के अपराध के कारणों का निश्चित विश्लेषण करना शायद ही संभव हो सकता है, क्योंकि हर घटना की अपनी परिस्थिति होती है। जरूरी नहीं कि जिस परिस्थिति में एक घटना घटित हुई हो वही परिस्थिति दूसरी घटना के लिए भी हो। परन्तु एक ऐसी चीज है जो सदैव समान ही रहेगी और वह है मानसिकता। हमारे समाज में अपराध की प्रवृत्ति बड़ती जा रही है। पहले ये तर्क दिया जाता था कि जो क्षेत्र अशिक्षित हैं वहीं पर ऐसी घटनाएं होती हैं। परन्तु आज के समय जो अधिक शिक्षित हैं वही ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहें हैं, तो मात्र शिक्षा...

महिला शोषण

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प्रथा के नाम पर महिलाओं का शोषण....             भारत में किराए की कोख पर किसी हद तक नियंत्रण लगा दिया गया है पर देश के अनेक हिस्सों में आज भी अनेक कुप्रथाएं वादस्तूर जारी हैं, जो महिलाओँ के लिए अभिशाप हैं और इन पर रोक लगाना बहुत ही जरूरी है। उन्हीं कुरीतियों में से एक है किराए की बीवी बनाने की प्रथा।             जहां एक ओर हम महिला सशक्तिकरण  और महिलाओं के अधिकारों की बात कर रहे हैं, वही दूसरी ओर देश में मौजूद कुछ कुप्रथाओं ने इन सब बातों पर पानी फेर रखा है। हमारे देश में कठोर कानून होने के बावजूद भी आज महिलाओं की खरीद फरोख्त के मामले सुनने को मिलते रहते हैं। जिनके परिणाम स्वरूप महिलाओं को जिस्मफरोशी के धन्धे में उतार दिया जाता है। लेकिन इन सब के बावजूद कुछ कुप्रथाएं आज भी जारी हैं जो महिलाओँ के अधिकारों का हनन कर रही हैं और इस समस्या पर न ही सरकार  का रुख स्पष्ट हो रहा है और न ही समाज के ठेकेदारों की आंखें खुल पा रही हैं।      ...

धार्मिक शोषण

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धर्म की आड़ में...... प्राचीन काल से ही मानव जीवन के धर्म का दबदबा कायम रहा है। शासन , प्रशासन और समाजिक जीवन इन सभी में धर्म का हस्ताक्षेप बना रहा है। यह बात किसी एक धर्म के लिए लागू नही होती है , बल्कि धर्म की बेड़ियों से मनुष्य को नियंत्रित रखने का कार्य सभी धर्मों ने किया है। हां यह जरूर रहा है कि कुछ धर्मों में कट्टरता की अधिकता देखने को मिल जाती है। प्रारम्भ में धर्म एक सामाजिक नियमावली की तरह ही था , जिसके माध्यम से सभी के मध्य समानता से कार्य वितरण सहजता से किया जा सके। लेकिन धर्म के तथाकथित रखवालों ने धर्म को सहज से जटिल बना दिया। अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए नए और जटिल नियम बनाए गए ताकि कुछ लोगों के हितों पर किसी तरह की आंच न आ सके। इन सभी में भय यानि की डर का सबसे विशेष महत्व रहा है। जन सामान्य को धर्म से डरा कर रखा गया है , जिससे लोगों के मन में किसी भी तरह से उस बात को बैठा दिया जाए जिससे विशेष वर्ग को लाभ मिल सके। पहले के यूरोपीय जगत में तो चर्चों के विरुद्ध बोलने की हिम्मत कोई नही कर पाता था , औऱ जिसने भी आवाज उठाई समझो उसे संसार से ही उठा दिया जाता था...