बालदिवस: नेहरू ही क्यों ?

    बालदिवस: नेहरू ही क्यों ?
 हर वर्ष 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाता है, जी मैं जानता हूं कि आपको ये बात अच्छे से पता है। लेकिन समस्या यह है कि बाल दिवस मनाया क्यों जाता है? आपका जवाब शायद यही होगा कि जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को हम बाल दिवस के रूप में मनाते हैं। मेरी समस्या भी इसी जवाब से ही उत्पन्न होती है।
आखिर नेहरू ने बच्चों के लिए ऐसा क्या कर दिया कि उनके जन्मदिन को बच्चों को समर्पित कर दिया गया। साथ ही यह बात भी दिमाग में चूहे की तरह छेद करने लगती है कि बाल दिवस तो सन् 1925 में ही मनाना आरम्भ कर दिया गया था औऱ सन् 1935 में पूरी दुनिया नें इसे मान्यता भी दे दी थी, तो नेहरू नाम की ये बत्ती किसने जला दी।
मोतीलाल के लाल के किस्से तो जग-प्रसिद्ध हैं, आपने भी सुनें ही होगें। हां ये हो सकता है कि आप इन सब बातों पर विश्वास न करते हों पर बिना आग के धुंआ तो उठता भी नहीं साहब जी। फिर किस्से भी इतने हैं कि मन-गढ़ंत हों ऐसा प्रतीत भी नहीं होता। खैर वो बात न करके हम आते हैं मोती के लाल से भविष्य के लाल, पीले, नीले, गुलाबी यानी कि बच्चों पर, जिस पर हमें बात करनी है।
 दुनिया के लगभग सभी देशों में बालदिवस मनाया जाता है। कुछ देश 20 नवंबर को इसे मनाते हैं। शायद उन्हें नेहरू की जन्मतिथि सही पता नहीं होगी या फिर वे सभी नेहरू को महान व्यक्ति नहीं मानते होंगे। कहने को तो कुछ भी हो सकता है पर नेहरू जी ने जो बच्चों के लिए किया ये बात उन देशों को पता नहीं होगी। उम्मीद है आपको जरूर पता होगी। मुझे तो पता नहीं और न ही मेरी नानी, दादी ने ऐसी कोई कहानी ही सुनाई है, जिससे मैं यह सीना तान कर कह सकूं कि नेहरू जी ने हमारे देश औऱ दुनिया के बच्चों के लिए इतना बड़ा बलिदान दिया।
अरविंद घोष और रवीन्द्र नाथ जी का नाम तो सुना ही होगा। जी हां नोबल वाले रवीन्द्र नाथ पर अरविंद को तो एक संयाशी के रूप में ही जानते होंगे। इन दोनों महान विभूतियों ने बच्चों की शिक्षा पद्धति पर जो काम किया है वह शायद आज तक भारत में कभी न हुआ है।   कभी न होगा, यह मैं कह नही सकता क्योंकि मैं राधे मां से मेरा कोई वास्ता नही है। पर इन महान पुरुषों का दुर्भाग्य कहें या फिर नेहरू जी के पिता की अपार संपत्ति का सौभाग्य कहें कि देश के कुछ लोगों के मन में इतना स्वामी प्रेम उमड़ आया कि जन्मदिन के उपहार स्वरूप बालदिवस ही मनाने लगे। माना कि जापान में एक हाथी भेजा था दद्दू ने, पर इसका मतलब यह तो बिल्कुल ही नहीं होता कि इस घटना को पूरे बच्चों पर थोप दिया जाए।
मेरा बालदिवस मनाने का विरोध नहीं है, पर किसी को जबरन महान बना कर बेतुका मेल करके बच्चों के साथ मिला देना गलत है। श्रीमान की एकमात्र पुत्री थी। पूरे जीवन कभी भी महाशय ने अपनी एकलौती संतान के साथ उतना समय नहीं बिताया था जितना एक सामान्य पिता को अपनी संतान के साथ बिताना चाहिए। बेटी के बड़े होने पर तो स्थितियां और भी दयनीय हो गईं। पिता-पुत्री के मध्य कभी भी सामंजस्य नहीं रहा। अब आप ही बताएं कि अपने बच्चे को सम्हालनें में जय माता की है तो दुनिया भर के बच्चों को प्यार, दुलार देने का समय कहां से मिल सकता है। उपहार इसलिए नहीं कहा क्योंकि पैसे वाले लोग थे हो सकता है कभी किसी के सेकेंड हैंड खेलौने दे दिए हों।
अब रही बात जगत चाचा के मानद उपाधि से सम्मानित होने की तो जब उम्र बड़ने लगती है तो पड़ोस की सुन्दर लड़की भी अंकल ही कह कर बुलाती है, भले ही यह सुन कर  आपके दिल के हजार टुकढ़े हो रहे हों, पर सुनना पड़ता है। भगवान भी हमें कौवा से हंस बनाने में लगे होते हैं पर हम अपने बालों में खेजाब करके कौवा ही बने रहना चाहते हैं, क्योंकि हम नहीं चाहते कि कोई हमें अंकल कहे। मान भी लिया कि हमारे सफेद हंस जैसे बालों को देखकर कोई अंकल-अंकल कहता है तो इसका ये तो मतलब नही कि हम बच्चों से अपार प्रेम करते हैं, इसलिए बच्चे हमें अंकल कह रहें हैं। बल्कि हमारी उम्र ही है अंकल वाली। पर ये बात समझाए कौन क्योंकि समझने वाले भी राम रहीम के डेर वाले भक्तों जैसे हैं।
एक बात तो एक्वाप्योर वाटर की तरह है साफ कि बालदिवस भारत ही नही दुनिया के कई देशों में भी मनाया जाता है। मुझे बिल्कुल नहीं लगता कि नेहरू जी इन देशों को कोई कर्जा दे गए थे कि भाई मेरे जन्मदिन को बालदिवस के रूप में मनाओ। हां नेहरू को महान बनाने के लिए उनके फैन्स ने यह कारनामा कर दिया होगा कि भारत में बालदिवस उन्ही के जन्मदिन पर मनेगा जिसके सिर में एक भी बाल न हों। और बजी मार ली नेहरू जी ने और हम अभी भी कूप मण्डूक बने गला फाड़कर यही कहते रहते हैं कि नेहरू जी के बालक प्रेम के कारण उनके जन्मदिन पर बालदिवस मनाया जाता है। नेहरू जी को प्रेम तो था पर किससे इस पर कहानियों का अम्बार है, पढ़े और हमें भी सुनाएं।
हमें पढ़ने के लिए धन्यवाद, भगवान मुझे खुश रखे।

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