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Showing posts from June 23, 2017
ब्राह्मण धर्म (क) धर्मार्थ कर्म- अब यहाँ पर यह प्रश्न उत्पन्न हो सकता हैं कि अच्छा, ब्राह्मण जाति का यही सामान्य स्वरूप रहे। परन्तु उसमें उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ भाव किस प्रकार से हुआ और हो रहा हैं? क्या लोगों की यह धारणा कि अमुक विप्र उत्तम हैं और अमुक मध्यम इत्यादि, मिथ्या ही हैं? इस प्रश्न के हल करने का सबसे उत्तम उपाय यही हैं कि ब्राह्मणों के स्वरूप का विचार, उनके आचार-व्यवहारों की देखभाल और उनके धर्मों के विषय में शास्त्रों की आज्ञाओं का परिशीलन (मीमांसा पर विचार) कर लिया जाये कि याज्ञवल्क्यादि महर्षियों के समय से आज तक वे लोग किस मार्ग का अवलम्बन करने से कैसे माने गये हैं। उन्होंने धर्म और जीविका चलाने के लिए किन-किन कर्मों का आश्रय लिया हैं, उनमें से किसे उत्तम, मध्यम अथवा हीन समझा हैं और भविष्य के लिए कौन से शिक्षा रूप बीज बोये हैं। क्योंकि शिष्टों (श्रेष्ठ पुरुषों) के आचार भी प्रमाण माने जाते हैं। अतएव पूर्व मीमांसा दर्शन के प्रथमाध्याय के तृतीय पाद के अष्टन् अधिकरण में ‘अनुमानव्यवस्थानात्तात्संयुक्तं प्रमाण स्यात्’॥ 15॥ इत्यादि सूत्रों द्वारा होलिकादि शिष्टाचारों को प्...