Posts

Showing posts from September, 2018

दलित विरोधी सवर्ण

Image
                    'दलित' विरोधी 'सवर्ण'            देश की राजनीति में भले ही स्थिरता दिख रही हो पर सामाजिक अस्थिरता बढ़ती जा रही है, जिसका एक मात्र कारण सरकार की गलत नीतियां हैं। भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र अस्तित्व दिया है परन्तु व्यवस्थापिका हर बार न्यायपालिका के कार्य क्षेत्र में हस्ताक्षेप करके संविधानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर रहा है। ऐसा ही कुछ sc-st अधिनियम को लेकर भी हुआ। कोई भी कानून ऐसा नहीं होता जिसमें कमियां न हो और यदि उन कमियों की वजह से किसी नागरिक के संविधानिक अधिकारों का हनन हो रहा हो तो सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह उस कानून में परिवर्त्तन कर सकता है। ऐसा ही ही कुछ  sc-st अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट ने किया। कोर्ट ने आंकड़ो के आधार पर कहा कि ज्यादातर केस फर्जी होते हैं, जिसकी वजह से निर्दोष सवर्णों को न्याय नहीं मिल पाता।   sc-st अधिनियम  की विसंगतियों को दूर करते हुए सिर्फ अग्रिम जमानत का प्रावधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया। परन्तु को...

शिक्षक और गुरू

Image
                   'शिक्षक' और 'गुरू'          समान्य रूप से हम शिक्षक और गुरू दोनों को एक ही समझ लेते हैं, परन्तु दोनों के बीच में बहुत बड़ा अन्तर है। वैदिक-कालीन समाज में गुरू को ईश्वर के समान माना जाता था। गुरूकुल की परंपरा के कारण शिष्य अपनी किशोरावस्था गुरू के साथ ही व्यतीत करते थे। गुरूकुल जिसका सीधा सा अर्थ है- गुरू का परिवार, जिसमें गुरू मुखिया और सभी शिष्य़ उस परिवार के सदस्य बनकर रहते थे। शिष्यों का पूरा दायित्व गुरू के पर ही रहता था। शिष्य़ का रहना, खाना-पीना, स्वास्थ और शिक्षा का दायित्व गुरू पर होता था। यहां पर विशेष बात यह है कि इतनी जिम्मेदारियों के बाद भी गुरू अपने शिष्य से किसी भी प्रकार की आर्थिक कमाई नहीं करता था। उसका खर्च किसी के द्वारा दिया गया दान या फिर गुरू और शिष्य़ों द्वारा मांगी गई भिक्षा से ही पूरा होता था।           यदि हम बात गुरू द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की करें तो गुरू अपने शिष्य़ को शस्त्र और शास्त्र दोनों ...