शिक्षक और गुरू
'शिक्षक' और 'गुरू'
समान्य रूप से हम शिक्षक और गुरू दोनों को एक ही समझ लेते हैं, परन्तु
दोनों के बीच में बहुत बड़ा अन्तर है। वैदिक-कालीन समाज में गुरू को ईश्वर के समान
माना जाता था। गुरूकुल की परंपरा के कारण शिष्य अपनी
किशोरावस्था गुरू के साथ ही व्यतीत करते थे। गुरूकुल जिसका सीधा सा अर्थ है- गुरू
का परिवार, जिसमें गुरू मुखिया और सभी शिष्य़ उस परिवार के सदस्य बनकर रहते थे।
शिष्यों
का पूरा दायित्व गुरू के पर ही रहता था। शिष्य़ का रहना, खाना-पीना, स्वास्थ और
शिक्षा का दायित्व गुरू पर होता था। यहां पर विशेष बात यह है कि इतनी
जिम्मेदारियों के बाद भी गुरू अपने शिष्य से किसी भी प्रकार की आर्थिक कमाई नहीं
करता था। उसका खर्च किसी के द्वारा दिया गया दान या फिर गुरू और शिष्य़ों द्वारा
मांगी गई भिक्षा से ही पूरा होता था।
यदि हम बात गुरू द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की करें तो गुरू अपने शिष्य़ को शस्त्र और शास्त्र दोनों प्रकार की शिक्षा
देता था, जिससे उसका शिष्य किसी भी तरह की शिक्षा से वंचित न रह जाए। गुरूकुल
की शिक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार का बाहरी हस्ताक्षेप नहीं था। यदि किसी
राजा के पुत्र गुरूकुल में हैं तो वह राजा चाह कर भी गुरूकुल की व्यवस्था पर अपना
आधिपत्य नहीं दिखाता था। इसका कारण गुरूओं के प्रति सम्मान भाव था।
वर्तमान में शिक्षा शब्द का अर्थ ही बदल गया है। अब
शिक्षा सिर्फ औऱ सिर्फ रोजगार के लिए दी और ली जाती है। सीधे शब्दों में कहा जाए
तो शिक्षा का व्यापार होने लगा है। इस व्यापार में व्यापारी की भूमिका कुछ धन से
संपंन लोग निभा रहे हैं और इस व्यवस्था में शिक्षा देने वाला शिक्षक बन गया है।
वास्तव में शिक्षक अब मात्र बेतन भोगी व्यक्ति की तरह ही रह गया है, जो अपनी शिफ्ट
पूरी करता है और हर माह के अन्त में अपनी बेतन लेता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि
शिक्षा और शिक्षार्थी दोनों में ही समंजस्य समाप्त हो गया है।
संक्षिप्त रूप में यदि गुरू और शिक्षक को व्यक्त किया जाए तो
शिक्षक लौकिक शिक्षा देता है और गुरू लौकिक के साथ पारलौकिक शिक्षा भी देता है।
पूरे व्यवस्था तंत्र में
सुधार की आवश्यकता-
यदि
हम वास्तव में चाहते हैं कि शिक्षक औऱ गुरू के मध्य का भेद समाप्त हो जाए तो उसके
लिए हमें पूरी शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन करना होगा। सर्वप्रथम तो शिक्षा को
व्यापार से अलग करना होगा। शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षकों को अपने आचरणों में
परिवर्तन करना होगा। यदि यह सब हो गया तो निश्चय ही शिक्षार्थियों में अपने
शिक्षकों के प्रति वही आदर औऱ संमान का भाव उत्पन्न हो जाएगा, जो कभी शिष्यों का
अपने गुरुओं के प्रति रहा करता था।
अन्त में एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि शिक्षक को
अपने दायित्वों का निर्वहन उचित तरीके से करना चाहिए क्योंकि शिक्षक के हाथ में
पूरे देश का भविष्य होता है। शिक्षक की गलती या फिर काम चोरी का खामियाजा पूरे देश
को भुगतना पड़ता है।

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