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शिक्षक और गुरू

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                   'शिक्षक' और 'गुरू'          समान्य रूप से हम शिक्षक और गुरू दोनों को एक ही समझ लेते हैं, परन्तु दोनों के बीच में बहुत बड़ा अन्तर है। वैदिक-कालीन समाज में गुरू को ईश्वर के समान माना जाता था। गुरूकुल की परंपरा के कारण शिष्य अपनी किशोरावस्था गुरू के साथ ही व्यतीत करते थे। गुरूकुल जिसका सीधा सा अर्थ है- गुरू का परिवार, जिसमें गुरू मुखिया और सभी शिष्य़ उस परिवार के सदस्य बनकर रहते थे। शिष्यों का पूरा दायित्व गुरू के पर ही रहता था। शिष्य़ का रहना, खाना-पीना, स्वास्थ और शिक्षा का दायित्व गुरू पर होता था। यहां पर विशेष बात यह है कि इतनी जिम्मेदारियों के बाद भी गुरू अपने शिष्य से किसी भी प्रकार की आर्थिक कमाई नहीं करता था। उसका खर्च किसी के द्वारा दिया गया दान या फिर गुरू और शिष्य़ों द्वारा मांगी गई भिक्षा से ही पूरा होता था।           यदि हम बात गुरू द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की करें तो गुरू अपने शिष्य़ को शस्त्र और शास्त्र दोनों ...