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Showing posts from April 19, 2017
           वचन वचन से अभिप्राय वाणी से होता है। वाणी जिसका उपयोग हम अभिव्यक्ति के लिये करते हैं। अपने विचारों, भावों को व्यक्त करने के लिए हमें वाणी की आवश्यकता होती है।    हम अपनी वाणी से ही किसी को अपना मित्र अथवा शत्रु बना सकते हैं। एक प्रचलित बात है कि कौवा किसी का शत्रु नही होता है परन्तु फिर भी अपनी कर्कस आवाज के कारण ही वह किसी को पसंद नही आता है। ठीक इसी तरह कोयल किसी को कुछ देती नही है परन्तु मीठी आवाज को कारण सभी उसको पसंद करते हैं। कबीर दास जी ने भी कहा है - ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए । औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होए ।।      किसी को आहत करने कि लिए मात्र हम वाणी का यदि गलत उपयोग करते हैं तो यह ईश्वर की दी गई शक्ति का दुरुपयोग होगा जोकि हमें नही करना चाहिए। परन्तु हमनें सदैव ही इसका गलत उपयोग ही किया है। जिसनें भी वाणी पर नियंत्रण रख लिया या वाणी को नियंत्रित कर सिद्ध हस्त हो गया है वही अपनी वाणी को सार्थक कर पाया है। अर्थात उस व्यक्ति की कही गयी सभी बातें पूर्ण सत्य हो जाती हैं। शास्त्रों में भी कहा...
नमस्कार   मित्रों आज हम जिस विषय पर चर्चा करने वाले हैं वह है मन। साधारणतया हर व्यक्ति मन को चंचल और अस्थिर बताता है जो कि पूर्ण सत्य नहीं है। यह मात्र मन की दुर्बलता या दोष हो सकते हैं, परंतु ईश्वर द्वारा दी गई मनुष्य को विभिन्न शक्तियों एवं सामर्थ में दोष एवं गुण दोनों ही विद्यमान हैं, परंतु हम साधारण दृष्टि से इन दोनों में से एक को ही देख सकते हैं। ऐसा ही कुछ हम मन के विषय में भी सोचते हैं।   श्रीमद् भगवत गीता में श्रीकृष्ण ने शरीर रूपी रथ के संचालन के लिए मन को सारथी और आत्मा को महारथी की तरह समझाया है। जिसमें रथ का नियंत्रण तो मन के हाथ में ही होता है, परंतु मन का नियंत्रण आत्मा के हाथ में होता है। यदि हम शरीर रूपी रथ की कल्पना बिना मन के करते हैं तो यह असंभव है जिस प्रकार शरीर में जीवन के लिए आत्मा का महत्व ठीक उसी प्रकार शरीर को नियंत्रण करने के लिए मन का भी महत्व है, परंतु हम यहां पर यह अवश्य ध्यान देंगें कि मन का नियंत्रण आत्मा के हाथों हो रहा है या नहीं, क्योंकि यदि आत्मा के द्वारा मन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो मन स्वछंद रूप से अपने अनुसार कार्य करता ...