वचन
वचन से अभिप्राय वाणी से
होता है। वाणी जिसका उपयोग हम अभिव्यक्ति के लिये करते हैं। अपने विचारों, भावों
को व्यक्त करने के लिए हमें वाणी की आवश्यकता होती है।
हम अपनी वाणी से ही किसी को अपना मित्र अथवा
शत्रु बना सकते हैं। एक प्रचलित बात है कि कौवा किसी का शत्रु नही होता है परन्तु
फिर भी अपनी कर्कस आवाज के कारण ही वह किसी को पसंद नही आता है। ठीक इसी तरह कोयल
किसी को कुछ देती नही है परन्तु मीठी आवाज को कारण सभी उसको पसंद करते हैं।
कबीर दास जी ने भी कहा है -
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए ।
औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होए ।।
किसी को आहत करने कि लिए मात्र हम वाणी का
यदि गलत उपयोग करते हैं तो यह ईश्वर की दी गई शक्ति का दुरुपयोग होगा जोकि हमें
नही करना चाहिए। परन्तु हमनें सदैव ही इसका गलत उपयोग ही किया है। जिसनें भी वाणी
पर नियंत्रण रख लिया या वाणी को नियंत्रित कर सिद्ध हस्त हो गया है वही अपनी वाणी
को सार्थक कर पाया है। अर्थात उस व्यक्ति की कही गयी सभी बातें पूर्ण सत्य हो जाती
हैं।
शास्त्रों में भी कहा गया
है कि-
श्लोक - "सत्यं
ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यंप्रियम्।
प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः।।"
- सत्य कहो
किन्तु सभी को प्रिय लगने वाला सत्य ही कहो, उस सत्य को मत कहो जो सर्वजन के लिए हानिप्रद है, (इसी प्रकार से) उस झूठ को भी मत कहो जो सर्वजन को प्रिय हो, यही सनातन धर्म है।
श्लोक -"सत्यस्य
वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।
यद्भूतहितमत्यन्तं
एतत् सत्यं मतं मम्।। "
- यद्यपि
सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का
कल्याण हो।
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