नमस्कार  मित्रों
आज हम जिस विषय पर चर्चा करने वाले हैं वह है मन। साधारणतया हर व्यक्ति मन को चंचल और अस्थिर बताता है जो कि पूर्ण सत्य नहीं है। यह मात्र मन की दुर्बलता या दोष हो सकते हैं, परंतु ईश्वर द्वारा दी गई मनुष्य को विभिन्न शक्तियों एवं सामर्थ में दोष एवं गुण दोनों ही विद्यमान हैं, परंतु हम साधारण दृष्टि से इन दोनों में से एक को ही देख सकते हैं। ऐसा ही कुछ हम मन के विषय में भी सोचते हैं।  श्रीमद् भगवत गीता में श्रीकृष्ण ने शरीर रूपी रथ के संचालन के लिए मन को सारथी और आत्मा को महारथी की तरह समझाया है। जिसमें रथ का नियंत्रण तो मन के हाथ में ही होता है, परंतु मन का नियंत्रण आत्मा के हाथ में होता है। यदि हम शरीर रूपी रथ की कल्पना बिना मन के करते हैं तो यह असंभव है जिस प्रकार शरीर में जीवन के लिए आत्मा का महत्व ठीक उसी प्रकार शरीर को नियंत्रण करने के लिए मन का भी महत्व है, परंतु हम यहां पर यह अवश्य ध्यान देंगें कि मन का नियंत्रण आत्मा के हाथों हो रहा है या नहीं, क्योंकि यदि आत्मा के द्वारा मन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो मन स्वछंद रूप से अपने अनुसार कार्य करता रहेगा । जैसे मन किसी व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है, तो ठीक वैसे ही यही मन उस व्यक्ति के उत्थान का कारण बन सकता है। बस यहां पर यह निर्भर करता है कि मन को हमने किस दिशा में लगाया है। यदि हम सकारात्मक दिशा में जाते हैं तो हमारा उत्थान होता है और यदि हम नकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर होते हैं तो, इसी मन के कारण हमारा पतन होता चला जाता है। यहां पर हमारे मन पर नियंत्रण रखने की नितांत आ सकता होती है मनुष्य अपने मन ईश्वर की ओर लगाकर संसार के समस्त श्रेष्ठ श्रेणी के व्यक्तियों में स्वयं को स्थापित कर लेता है।
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुध्दं चाशुध्दमेव च ।
अशुद्धं कामसंकल्पं शुद्धं कामविवर्जितम् ।।
शुद्ध और अशुद्ध ऐसे दो प्रकार का मन कहा है कामना और शंकरपुर संकल्प वाला मन अशुद्ध और कामना रहित हो तो वह शुद्ध ।
मन: कपिरयं विश्र्वपरिभ्रमण लम्पट: |
नियन्त्रणीयो यत्रेन मुक्तिमिच्छुभिरात्मन: ||

मन रूपी बंदर विश्व का भ्रमण करने में लंपट है मुक्ति की इच्छा वाले मनुष्य को यह यत्नपूर्वक काबू में रखना चाहिए ।

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