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यात्रा: कुछ विशेष

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यात्रा : कुछ विशेष सांकेतिक चित्र      दीपावली अवकाश के समाप्त होते ही मैं कानपुर से भोपाल के लिए रवाना हुआ। अपने गांव से जब कानपुर सेन्ट्रल आया तो मैं अकेला ही था। समान्यत :  कानपुर और भोपाल की यात्रा में मेरा मित्र शिवम साथ ही रहता है परन्तु इस बार वह कुछ दिन पहले ही भोपाल वापस आ गया था।  अन्य यात्राओं की तरह ही इस बार भी मेरी यात्रा दिव्यांग डिब्बे वाली थी। ट्रेन का समय शाम सवा नौ बजे का था। मैं सही समय पर स्टेशन आ चुका था। भारतीय रेल ने भी अपनी गरिमा को ध्यान में रखा और लगभग आधा घण्टा विलम्ब से आई। मैं डिब्बे में चढ़ न सका क्यूंकि उसके सभी दरवाजे अन्दर से बन्द थे। दरवाजों को खुलवाने के लिए रेलवे पुलिस के दो जवानों से कहा तो उन्होंने दरवाजे खुलवाएं। मैंने अन्दर जाते ही देखा कि कुछ नेत्रहीन लड़के बैठे हैं जिन्होंने दरवाजों को बन्द कर रखा था ताकि कोई अन्य व्यक्ति अन्दर न आ सके। एक नजर से देखें तो उन्होंने सही किया था। साधारणतया दिव्यांग बोगी में पुलिस वाले कब्जा कर लेते हैं या फिर पैसे लेकर सामान्य व्यक्ति को उसमें बैठा देते हैं, जिससे दिव्यांग या...