यात्रा: कुछ विशेष
यात्रा: कुछ विशेष
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| सांकेतिक चित्र |
दीपावली अवकाश के समाप्त
होते ही मैं कानपुर से भोपाल के लिए रवाना हुआ। अपने गांव से जब कानपुर
सेन्ट्रल आया तो मैं अकेला ही था। समान्यत: कानपुर और भोपाल की यात्रा में मेरा मित्र शिवम
साथ ही रहता है परन्तु इस बार वह कुछ दिन पहले ही भोपाल वापस आ गया था। अन्य यात्राओं की तरह ही इस बार भी मेरी यात्रा
दिव्यांग डिब्बे वाली थी। ट्रेन का समय शाम सवा नौ बजे का था। मैं सही समय पर
स्टेशन आ चुका था। भारतीय रेल ने भी अपनी गरिमा को ध्यान में रखा और लगभग आधा
घण्टा विलम्ब से आई। मैं डिब्बे में चढ़ न सका क्यूंकि उसके सभी दरवाजे अन्दर से बन्द
थे। दरवाजों को खुलवाने के लिए रेलवे पुलिस के दो जवानों से कहा तो उन्होंने
दरवाजे खुलवाएं। मैंने अन्दर जाते ही देखा कि कुछ नेत्रहीन लड़के बैठे हैं
जिन्होंने दरवाजों को बन्द कर रखा था ताकि कोई अन्य व्यक्ति अन्दर न आ सके। एक नजर
से देखें तो उन्होंने सही किया था। साधारणतया दिव्यांग बोगी में पुलिस वाले कब्जा
कर लेते हैं या फिर पैसे लेकर सामान्य व्यक्ति को उसमें बैठा देते हैं, जिससे
दिव्यांग यात्रियों को अपने ही डिब्बे में जगह नही मिल पाती है और अगर मिल भी जाए
तो पूरे सफर में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
मैं नीचे खाली पड़ी फर्स
पर ही पेपर बिछा कर बैठ गया क्योंकि भारतीय रेलवे ने दिव्यांग डिब्बे में अनुकम्पा
करते हुए चार सीटों की ही व्यवस्था की है, जोकि पहले से ही भरी हुई थी। मेरे पास
ही एक लड़का बैठा था जोकि उन नेत्रहीन लड़कों के समूह का ही सदस्य था।
ट्रेन के चलने के साथ ही बातों का सफर भी चलने लगा। उस नेत्रहीन लड़के
ने अपना नाम आकाश सिंह बताया और साथ ही अपने अन्य साथियों से भी परिचय कराया। कुल
नौ सदस्य थे उस समूह में, जिसमें से छ: सदस्य नेत्रहीन थे और शेष तीन उनके सहयोगी
थे। आकाश ने बताया कि वे सभी राज्य स्तरीय क्रिकेट खेलते हैं और एक टूर्नामेंट में
भाग लेने के लिए मुम्बई जा रहे हैं। यह मेरे लिए पहला अवसर था जब मुझे नेत्रहीन
खिलाड़ियों से मिलने और उनसे बात करने का अवसर मिला। मन में बहुत से प्रश्न थे और
आज उनका उत्तर जानने का अवसर भी मिल गया।
आकाश ने बताया कि वे सभी खिलाड़ी लखनऊ में रहते हैं और पढ़ाई के
साथ साथ उन्हें क्रिकेट खेलना भी पसंद है। टीम के सभी सदस्य उत्तर प्रदेश के
विभिन्न जिलों से आए थे परन्तु सभी लखनऊ में रह कर अपनी पढ़ाई करते थे और राज्य
स्तरीय प्रतिस्पर्धा में भाग भी लेते हैं। मैने पूछा कि जब तुम लोगों को दिखता
नही तो खेल कैसे पाते हो। इस पर आकाश ने बाताया कि हमारी गेंद प्लास्टिक ही होती
है जिसके अन्दर कुछ ऐसा भर दिया जाता है जिससे कि उस गेंद से निरन्तर आवाज आती रहे
और उसी आवाज के सहारे हम गेंद की स्थिति को जान जाते हैं और आसानी से खेल पाते
हैं। फिर आकाश नें अपनी किट में से उस गेंद को निकाला और मुझे दिखाया।
मेरा अगला प्रश्न उन सभी को
मिलने वाली सुविधाओं के लिए था। जैसे ही मैने उससे यह पूछा तो आकाश हंसने लगा और बोला
कि भैया हमें रिजर्वेशन तक तो मिलता नही है आगे क्या बताएं। जिस जगह आयोजन होता है
वहां पर अपने खर्च से जाना और आना होता है। बस आयोजन के समय हमारे रहने और खाने की
व्यवस्था कर दी जाती है औऱ वह भी सामूहिक रूप से यानी कि एक ही कमरे में सात से आठ
लोगों को रहना पड़ता है। हां इतना जरूर है कि हर आयोजन में एक शर्ट औऱ पैंट या फिर
दो शर्ट हमें थमा दी जाती है। यदि हम मैच
जीत जाते है तो कुछ पैसे भी मिल जाते हैं। मैंने तुरन्त पूछा कि ऐसा है तो क्यो जाते हो खेलने के लिए तो आकाश का जवाब वाकई उचित था। उसने कहा कि भैया हम तो खिलाड़ी
हैं और जब तक सामर्थ्य रहेगा खेलते रहेगें औऱ जब हम मजबूर हो जाएगें तो खेलना बंद कर
देगें। खेलने के पीछे एक कारण यह भी है कि हम चाहते हैं कि हमारे जैसे औऱ भी जितने
बच्चे हैं वे कभी भी अपने आपको किसी से कमजोर न समझें।
आकाश के जवाब में दम था, पर शायद यह बात हमारी सरकार के कान तक कभी भी
नही पहुंच पाती या फिर कह सकते हैं कि सरकार की इच्छा शक्ति ही नही है कि वह
दिव्यांगों को प्रोत्साहित करे। किसी को पेंशन और सहायक उपकरण देकर आप सिर्फ
दूसरों पर निर्भर ही बना सकते हैं। जबकि सरकार को चाहिए कि वह दिव्यांगों को
आत्मनिर्भिर बनाने में सहयता करे, पर शायद ये बातें कभी भी सरकारी तंत्र को नही
समझ में आने वाली हैं।
आकाश जैसे लड़कों को देख कर गर्व होता है कि अपनी कमी को दूर करने के
लिए किस तरह से मेहनत कर रहे हैं। सरकार की उदासीनता को देख कर मैं कुछ कह नही
सकता क्यूंकि आप लोग स्वयं समझदार हैं।

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