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Showing posts from July, 2017

भारतीय मानसिकता

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भारतीय मानसिकता हम भारतीयों को दुसरों के विचारों और संस्कृति ने हमेशा ही अपनी ओर आकर्षित किया है। हमनें कभी भी अपनी विरासत को ठीक से न जाना है और न ही समझा है। वैदिक भारत से आज के आधूनिक भारत के बीच के समय में हमारे देश ने अनेकों आक्रमण झेले हैं। अनेकों विचारों और संस्कृतियों को हम पर थोपा गया है। जिसके प्रभाव के कारण हम यह भूल गये हैं कि वास्तव में हम कौन हैं ? बस उतना ही जानते हैं जितना विदेशियों ने हमें हमारे विषय में बताया है। वास्तव में हमें यह सब समझनें का अवसर ही नही मिला है। जैसे हनुमान जी अपना बल भूल गए थे वैसी ही स्थिति आज हमारी है बस जरूरत है तो एक जामवन्त की जो हमें हमारे बल से परिचित कराए। हम भारतीयों की एक विशेषता यह भी है कि हम अपने आप को स्वयं के दृष्टिकोण से कभी भी नही देखते हैं। सिर्फ दूसरों की कही बात का अनुसरण करते रहते हैं। पिछलग्गू बनना तो हमारे स्वभाव में बस गया है। आधूनिकता की आंधी में हम उन विदेशियों का अंधा अनुकरण करते हैं जिन्हें वास्तव में जीवन जीने की कला हमनें सिखाई है। हमारी परम्पराओं, संस्कृति और जीवन जीने के तौर तरीकों को अंगीकृत करके विदेश...

भाषा का भटकाव

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भाषा का भटकाव आजकल सबसे अधिक चर्चा में दो देश हैं , पहला इजराइल और  दूसरा चीन। जहाँ इजराइल के चर्चा में होने का प्रमुख कारण भारत के साथ उसकी घनिष्ठता में बढ़ोतरी है तो वहीं दूसरी तरफ चीन से भारत के सीमा विवाद के कारण वह लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। परन्तु हम इन सभी बातों से अलग कुछ विशेष बिन्दुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। इजराइल और चीन इन दोनों देशों में कई समानताएँ और कई विषमताएँ हैं फिर भी इन दोनों देशों को तकनीकि के क्षेत्र में विश्व के प्रमुख देशों में गिना जाता है। इसी तकनीकि के कारण ही इन देशों को अन्य देशों से अलग किया जाता है और भारत के साथ इन दोनों देशों के सम्बन्धों को प्रभावित करने का श्रेय भी यहां की तकनीकि को ही जाता है। एक ओर इजराइल अपनी तकनीकि कुशलता से हमें अपनी ओर आकर्षित कर रहा है , वहीं दूसरी ओर चीन हमारे लिए सिर दर्द बना बैठा है। परन्तु हमनें यह जानने का प्रयास कभी नही किया कि यह आधूनिक तकनीकि का विकास आखिर हुआ कैसे , दुनिया के जितने भी तकनीकि कुशल देश हैं जैसे अमेरिका , जापान , रूस , जर्मनी , इजराइल , चीन और कोरिया जैसे देश इनका इतना वि...

योग

परिचय : योग तत्‍वत: बहुत सूक्ष्‍म विज्ञान पर आधारित एक आध्‍यात्मि विषय है जो मन एवं शरीर के बीच सामंजस्‍य स्‍थापित करने पर ध्‍यान देता है। यह स्‍वस्‍थ जीवन - यापन की कला एवं विज्ञान है। योग शब्‍द संस्‍कृत की युज धातु से बना है जिसका अर्थ जुड़ना या एकजुट होना या शामिल होना है। योग से जुड़े ग्रंथों के अनुसार योग करने से व्‍यक्ति की चेतना ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है जो मन एवं शरीर, मानव एवं प्रकृति के बीच परिपूर्ण सामंजस्‍य का द्योतक है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड की हर चीज उसी परिमाण नभ की अभिव्‍यक्ति मात्र है। जो भी अस्तित्‍व की इस एकता को महसूस कर लेता है उसे योग में स्थित कहा जाता है और उसे योगी के रूप में पुकारा जाता है जिसने मुक्‍त अवस्‍था प्राप्‍त कर ली है जिसे मुक्ति, निर्वाण या मोक्ष कहा जाता है। इस प्रकार, योग का लक्ष्‍य आत्‍म-अनुभूति, सभी प्रकार के कष्‍टों से निजात पाना है जिससे मोक्ष की अवस्‍था या कैवल्‍य की अवस्‍था प्राप्‍त होती है। जीवन के हर क्षेत्र में आजादी के साथ जीवन - यापन करना, स्‍वास्‍थ्‍य एवं सामंजस्‍य योग करने के प्रमुख उद्देश्‍य होंगे। योग का अ...
सत्य, तथ्य और कथ्य को बचाना होगा : विवेक अग्रवाल माखनलाल विश्वविद्यालय के सत्रारम्भ 2017 कार्यक्रम के द्वितीय दिवस के पहले सत्र को पत्रकारिता जगत के डाॅन के रूप में पहचाने जाने वाले विवेक अग्रवाल ने सम्बोधित किया । आतंकवाद,अपराध और पत्रकारिता विषय पर नवागत विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए विवेक जी ने कहा कि पत्रकार को अन्दर से अनुशासित और बाहर से अराजक होना चाहिए क्योंकि अपराधियों की तरह व्यवहार करके ही अपराधियों को पकड़ा जा सकता है । यदि आप के अन्दर जुनुन , दीवानगी है तभी आप पत्रकार बन सकते हैं। जो स्वयं को भूल सकता है, परिवार को भूल सकता है वही अपराध पत्रकारिता कर सकता है। पत्रकारिता किसी समय की पाबन्द नही होती न ही यह काम सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे वाला है। जिसने भी इस तरफ एक भी कदम बड़ा दिया है समझो वह अपराध पत्रकारिता में आ चुका है। पत्रकारिता को परिभाषित करते हुए अग्रवाल जी ने कहा कि पत्रकारिता जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य है। कवि, साहित्यकार, नाटककार और लेखक के पास अपनी बात लिखने का वक्त होता है, पत्रकार के पास वक्त की कमी होती है। नवागत छात्रों से श्री विवेक जी ने कहा...
कार्य के प्रति समर्पण जरूरी है : विजय अग्रवाल दिनांक 28 जुलाई 2017 को माखनलाल विश्वविद्यालय के नवें सत्रारम्भ कार्यक्रम में विद्यार्थियों को समय प्रबंधन विषय पर बोलते हुए विजय अग्रवाल जी ने कहा कि प्रकृति और जीवन के मध्य एक द्वंद दिखता है, जिसमें आपका मन ही नियंत्रक की भूमिका निभाता है। किसी भी कार्य के समय से पूर्ण न होने पर हम दूसरों पर दोष देते हैं। समय का प्रबंधन करना आपका दायित्व है लेकिन यदि ऐसा नही कर पा रहे हैं समझो की आपको उस काम में रुचि नही है। समय दिखता नही है सिर्फ इसे एहसास किया जाता है। यदि इस एहसास को समझ सकते हैं तो समय को माप सकते हैं। हम सभी कीमती वस्तुओं को सम्भाल कर रखते हैं, उसी तरह समय भी है जिसका सही उपयोग करना चाहिए। समय को ईश्वर से जोड़कर कहा कि ईश्वर को समदर्शी कहा जाता है क्योंकि ईश्वर ने अमीर और गरीब सभी को समान समय दिया है। जिसका उपयोग करना आपके हाथ में है। नवागत विद्यार्थों को सम्बोधित करते हुए कहा कि समय का विश्लेषण करना सम्भव नही है। महाकाल को परिभाषित करते हुए कहा कि जो समय से परेय है वही महाकाल है। समय सबसे महत्वपूर्ण है। व्यक्ति  साधन, धन औ...