भाषा का भटकाव

भाषा का भटकाव
आजकल सबसे अधिक चर्चा में दो देश हैं, पहला इजराइल और  दूसरा चीन। जहाँ इजराइल के चर्चा में होने का प्रमुख कारण भारत के साथ उसकी घनिष्ठता में बढ़ोतरी है तो वहीं दूसरी तरफ चीन से भारत के सीमा विवाद के कारण वह लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। परन्तु हम इन सभी बातों से अलग कुछ विशेष बिन्दुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।
इजराइल और चीन इन दोनों देशों में कई समानताएँ और कई विषमताएँ हैं फिर भी इन दोनों देशों को तकनीकि के क्षेत्र में विश्व के प्रमुख देशों में गिना जाता है। इसी तकनीकि के कारण ही इन देशों को अन्य देशों से अलग किया जाता है और भारत के साथ इन दोनों देशों के सम्बन्धों को प्रभावित करने का श्रेय भी यहां की तकनीकि को ही जाता है। एक ओर इजराइल अपनी तकनीकि कुशलता से हमें अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन हमारे लिए सिर दर्द बना बैठा है। परन्तु हमनें यह जानने का प्रयास कभी नही किया कि यह आधूनिक तकनीकि का विकास आखिर हुआ कैसे, दुनिया के जितने भी तकनीकि कुशल देश हैं जैसे अमेरिका, जापान, रूस, जर्मनी, इजराइल, चीन और कोरिया जैसे देश इनका इतना विकास हुआ कैसे।
इन सभी देशों में आपको एक समानता जरूर दिखेगी वह है भाषा। अपनी भाषा को लेकर ये सभी देश बहुत पहले से ही जागरुक रहे हैं। यदि हम इजराइल की बात करें तो यह बात सभी को पता है इजराइल अपनी स्थापना के समय से ही विवादित रहा है, लेकिन हमें यह जानना चाहिए कि अपने गठन के बाद उसने अपनी भाषा हिब्रू जोकि यहूदियों की मूल भाषा है का पुनरोद्धार किया। पूरे इजराइल में जितनी भी पुस्तकें थीं सभी का अनुबाद हिब्रू में किया गया। आज की स्थिति यह है कि पूरे देश में एक मात्र भाषा हिब्रू का ही बोलबाला है।
यदि हम चीन को देखें तो चीन ने भी सिर्फ चीनी भाषा का इस्तेमाल किया और विशाल जनसंख्या के दबाव के बावजूद भी चीन जिस तरह से तरक्की की राह में दिन प्रति दिन बड़ता जा रहा है वहा तारीफ के काबिल है। इन सभी बातों का मूल और एकमात्र कारण उसका अपनी भाषा के प्रति लगाव ही है।
कुछ अन्य प्रभावशाली देशों को देखें तो हमें अमेरिका पहले पायदान पर दिखता है। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र ने अपनी आजादी के बाद सबसे पहला काम अपनी भाषा पर ही किया। उसकी भाषा और ब्रिटेन की भाषा भले ही एक जैसी थी परन्तु अमेरिका ने अपनी डिक्सनरी का निर्माण अलग से कराया और अपनी अलग अंग्रजी भाषा को जन्म दिया। जापान के विषय में तो पता हि है वहाँ के किसी भी विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए जापानी भाषा का ज्ञान होना जरूरी है। रूस ने सिर्फ औऱ सिर्फ अपनी भाषा के दम पर विकास किया और विश्व में अमेरिका की दादागिरी को नही चलनें दिया। दो विश्व युद्धों के बीच से गुजर कर  आज जर्मनी नें विश्व में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है तो वह सिर्फ अपनी भाषा के दम पर किए गए तकनीकि के क्षेत्र में किए गए विकास के माध्यम से।
इन सभी देशों की तुलना जब हम भारत से करते हैं तो हमे स्पष्ट दिखता है कि वैश्विक स्तर पर हम तकनीकि, विज्ञान और शोध के क्षेत्र आज भी बहुत पीछे हैं। इसका कारण भी हम स्वयं ही हैं। देश में आजादी के पहले 1835 ई. में लार्ड मैकाले को भारत अंग्रजी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए भेजा गया। इसके पीछे का प्रमुख कारण भारतीयों को अंग्रजी सिखाना नही था, बल्कि ईस्ट इंडिया कम्पनी को अपने काम काज चलाने के लिए सस्ते और मेहनती लिपिक तैयार करना था। चूँकि ब्रिटेन से जो लिपिक आते थे वे सभी अधिक बेतन लेते थे अत: उनके विकल्प के रूप में भारतीयों को अंग्रजी सिखाकर उन्हीं से काम कराना सस्ता पड़ता था। अंग्रजी इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि कम्पनी के सभी काम अंग्रजी भाषा में ही किए जाते थे। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए मैकाले को भारत भेजा गया। मैकाले ने भारत का भ्रमण किया और वापस ब्रिटेन पहुँच कर वहाँ कि संसद में कहा कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन्हें उखाड़ना असम्भव है पर इन पर अपनी भाषा थोप कर बीच से जरूर काटा  जा सकता है। भारत वापस आकर मैकाले ने चतुराई दिखाई और कहा कि अंग्रेजी भाषा उच्च घरानों की भाषा है। जब इसका कारण पूछा गया तो उसने कहा कि भारत के सामान्य लोगों को सम्पन्न लोगों की नकल करने की आदत है औऱ यदि उच्च वर्ग के लोग अंग्रजी को अपनाते हैं तो इसी आदत की वजह से सामान्य लोग भी अंग्रजी भाषा को स्वत: अपना लेगें। अन्त में ऐसा ही हुआ, मैकाले की नीति काम कर गई। अंग्रजी को देश के प्रभावी लोगों ने अपना लिया जिसके परिणाम स्वरूप सामान्य लोग भी अंग्रजी के जादू से अछूते न रह सके। अंग्रजों को इसके दो फायदे हुए, पहला कि भारतीयों का अपनी परम्परा और संस्कृति से भटकाव होता गया और दूसरा यह कि उन्हें सस्ते लिपिक मिलने लगे।
आजादी के बाद यह समस्या और भी विकराल हो गई। देश के उत्तर भारत और मध्य भारत के राज्यों के छोंड़कर अन्य कोई भी राज्य हिंदी को स्वीकारने को तैयार ही नही था। कुछ राज्यों ने तो हिंदी के विरोध की शपथ ले रखी थी। उन्हें लगा कि हिंदी थोपकर उनकी अस्मिता को खण्डित कर दिया जाएगा और इसी कारण से इन राज्यों ने हिंदी के प्रति विरोध के रूप में अंग्रेजी भाषा को सिरमौर बना लिया।

आज के वर्तमान भारत में हिंदी भाषा किसी एक क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा मात्र बन कर रह गई है। जबकी होना यह चाहिए था कि पूरा देश मिलकर हिंदी को पुन: जाग्रत करता और अपनी सूख चुकी संस्कृति को एक नया जीवन देता। परन्तु सभी कुछ इसके विपरीत ही हुआ। जिसका परिणाम साफ तौर पर देख सकते हैं। हम आज भी पढ़े लिखे लिपिक बनकर तैयार हो रहे हैं और दुनिया के सभी तकनीकि प्रधान देशों को सस्ते में सुलभ हो रहे हैं। यदि हम अपनी भाषा को अपना कर चलते तो हमें आधूनिक तकनीकि के लिए अन्य देशों की ओर न देखना पड़ता। भारत भी दुनिया के प्रमुख तकनीकि प्रधान देशों में से एक होता न कि तकनीकि आयातक देश के रूप में, जैसा कि आज है।

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