भारतीय मानसिकता
भारतीय
मानसिकता
हम भारतीयों को
दुसरों के विचारों और संस्कृति ने हमेशा ही अपनी ओर आकर्षित किया है। हमनें कभी भी
अपनी विरासत को ठीक से न जाना है और न ही समझा है। वैदिक भारत से आज के आधूनिक
भारत के बीच के समय में हमारे देश ने अनेकों आक्रमण झेले हैं। अनेकों विचारों और
संस्कृतियों को हम पर थोपा गया है। जिसके प्रभाव के कारण हम यह भूल गये हैं कि
वास्तव में हम कौन हैं? बस उतना ही जानते हैं जितना विदेशियों ने हमें
हमारे विषय में बताया है। वास्तव में हमें यह सब समझनें का अवसर ही नही मिला है।
जैसे हनुमान जी अपना
बल भूल गए थे वैसी ही स्थिति आज हमारी है बस जरूरत है तो एक जामवन्त की जो हमें
हमारे बल से परिचित कराए।
हम भारतीयों की एक विशेषता यह भी है
कि हम अपने आप को स्वयं के दृष्टिकोण से कभी भी नही देखते हैं। सिर्फ दूसरों की
कही बात का अनुसरण करते रहते हैं। पिछलग्गू
बनना तो हमारे स्वभाव में बस गया है। आधूनिकता की आंधी में हम उन विदेशियों का
अंधा अनुकरण करते हैं जिन्हें वास्तव में जीवन जीने की कला हमनें सिखाई है।
हमारी परम्पराओं,
संस्कृति और जीवन जीने के तौर तरीकों को अंगीकृत करके विदेशियों ने अपने आपको
सम्पन्न बना लिया है। परन्तु इसके विपरीत हम भारतीय सिर्फ दूसरों के बहकावे में
आकर स्वयं को ही नष्ट करते जा रहे हैं।
हमें अपनी सभ्यता को
जानने के लिए कुछ हजार वर्ष पहले के इतिहास को जानना होगा। जब पूरी दुनिया
की संस्कृतियों ने जन्म भी नही लिया था तब हमारी सनातन परम्परा विशाल वट व्रक्ष के
रूप में अपना बृहद रूप ले चुकी थी। हमारे
ऋषियों, मुनियों, विदूषियों और विचारकों ने ज्ञान विज्ञान के अगूढ़ रहस्यों को न
केवल स्पष्ट बल्कि उन्हें एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के रूप में हमें समर्पित भी
किया। पूरी दुनिया के लोगों को सिर्फ और सिर्फ भारतीयों पर ही निर्भर
रहना पड़ता था। परन्तु जैसे जैसे समय बीतता गया हम अपनी सभ्यता को भूलते गए और
सांस्कृतिक पतन की ओर बढ़ते गए। विदेशी विचारों ने हमारे मस्तिष्क पर आघात पर आघात
किया और हम आधूनिकता के नाम पर पूरी तरह
से विदेशियों पर निर्भर हो गए। हमारे मन में यह धारणा भर दी गई कि हम कुछ नही कर सकते
हैं, हमारे विचार, संस्क्रति सिर्फ रूढ़वादिता है जिनके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार
नही है। परन्तु सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि हम इस बात को सहजता से
स्वीकार भी करने लगे। अब समय आ गया है कि हम अपने आपको समझे और अपने विचारों को एक
नया आयाम दें। अपने ऊपर थोपे जा रहे विचारों का त्याग कर स्वयं अर्जुन बनकर रथ में
बैठें और श्रीकृष्ण की भाँति सारथी भी बनें। हमारी मानसिक दासता ने आजतक गुलाम बना
रखा है, अब हमें मानसिक और मनोविज्ञानिक दासता के बंधन तोड़ने होगें। अपने पूर्वजों की धरोहर को नीव की तरह उपयोग कर विचारों,
खोजों, और आधूनिक विज्ञान का एक ऐसा गोवर्धन अपने हाथों में लेना है जिसके नीचे
पूरा विश्व अपने आपको सुरक्षित कर सके। हमें
मानसिक रूप से दृढ़ होकर इतना विशाल बनना है कि भगवान बावन की तरह दो कदमों में ही
पूरा विश्व नाप सकें। क्योंकि मानसिक रूप से दृढ़ होकर ही किसी भी
समस्याओं के गहरे समुद्र में सहजता से विकास का रामसेतु सहजता से बना सकते हैं।
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