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Showing posts from 2017

काला अध्याय: आपातकाल

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काला अध्याय “ पराधीन सपनेहु सुख नाहीं “ इस बात को भले ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने सोलहवीं शताब्दी के मध्य में लिखा था, पर धरातल पर चरितार्थ होते हुए कई बार देखा गया है। यदि बात आधुनिक समय की जाए तो इसका जीता-जागता उदाहरण आपातकाल का समय था। जिसने लोकतंत्र के मुंह पर कालिख पोत दी। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाले भारत नें शायद ही ऐसा सोचा था कि उसका लोकतांत्रिक इतिहास इस तरह कलंकित होगा। जो राजनीतिक दल उस समय सत्ता में था उसे भी उस समय की बात करनें में शर्म आती है। शायद इसी कारण से उस पार्टी का कोई भी सदस्य कभी भी उस समय विशेष की बात नहीं करता है। या फिर यह भी हो सकता है कि भय वश इतनी शक्ति ही नहीं एकत्रित कर पाता कि उस आपातकाल की बात कर सके।        दुनिया भर से कांपी पेस्ट करके थोपे गए संविधान को वास्तविक आइना तो शायद आपातकाल के समय में दिख गया था, पर हम भारतीय हैं, जो ठोकर खाकर गिरने के बाद कभी भी उस पत्थर को नहीं हटाते जिसके कारण हम गिरे थे।       कई वर्ष बीत चुके हैं उस दौर को , पर आज इस बात को प्रमुखता देने का ...

जीत के मायने

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जीत के मायने पिछले कुछ दिनों से चुनाव की गर्मी जारी थी, जो जीत और हार के परिणाम के साथ रुक भी गई। चुनाव चाहे गुजरात का रहा हो या फिर हिमांचल का सभी में एक बात स्पष्ट थी, कि जीत की चाह में राजनीति के नाम पर जो निर्रथक मुद्दे खड़े किए जा सकते हैं, वे सब आम जनता की समझ से परे थे। जीत और हार के साथ ही सभी मुद्दे कहां गुम हो जाते हैं ये बात शायद ही कोई भारतीय नागरिक हो, जो न जानता हो। क्योंकि जीतने के लिए जिस तरह की राजनीति का खेल आज के समय खेला जा रहा मुझे नही लगता कि यह राजनीति हो सकती है। आज राजनीति को युद्ध की तरह ही देखा जा रहा है जिसमें जीत आवश्यक है न कि यह कि किस तरह से जीत मिली। शायद यही वजह भी है कि राजनेताओं का सामाजिक और नैतिक पतन सर्वाधिक हो रहा है। पर उन्हें इसकी परवाह ही कहां है, उन्हें तो आर्थिक उत्थान की चिंता है।  जब चुनाव का समय करीब आ जाता है तो सबसे अधिक आशा नागरिकों के दिल में जागती है कि शायद अब हमारी समस्याओं के समाधान का समय करीब आ गया है। क्योंकि जिस तरह से पक्ष-विपक्ष के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियां जन समस्याओं की बात करती है शायद भारत के इतिहास में ...

शर्म की बात

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                        शर्म की बात                         दुनिया का इतिहास जिस किसी को भी याद हो, उससे आप एक बात जरूर पूछिएगा कि पूरी दुनिया में जितने भी देश आज संपन्नता की श्रेणी में अग्र भाग पर आते हैं, उनके विकास का समय काल कितना रहा है। मुझे नहीं लगता कि किसी का भी जवाब चार, पांच, या फिर छ :  दशक के अलावा कुछ और होगा। इतनें ही समय में दुनिया के दिग्गज देशों ने अपने आपको इस स्थिति में ला खड़ा किया है कि मुझे दिग्गज शब्द का उपयोग करना पड़ रहा है। आपके मन में यह विचार तो आ ही रहा होगा कि शीर्षक के आधार पर तो विषय का मेल नहीं हो पा रहा है। परेशान मत होइए यह कार्य मेरा है जो मैं अच्छे से करना जानता हूं। संसार के सभी प्रभुत्व संपन्न देशों की एक लिस्ट बनाइए और देखिए कि उन देशों के नागरिकों और वहां कि सरकार ने अपने देश को शिखर पर लाने के लिए कितनी मेहनत की है। यहां पर मैंने नागरिकों का जिक्र पहले किया है।...

बालदिवस: नेहरू ही क्यों ?

    बालदिवस: नेहरू ही क्यों ?  हर वर्ष 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाता है, जी मैं जानता हूं कि आपको ये बात अच्छे से पता है। लेकिन समस्या यह है कि बाल दिवस मनाया क्यों जाता है ? आपका जवाब शायद यही होगा कि जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को हम बाल दिवस के रूप में मनाते हैं। मेरी समस्या भी इसी जवाब से ही उत्पन्न होती है। आखिर नेहरू ने बच्चों के लिए ऐसा क्या कर दिया कि उनके जन्मदिन को बच्चों को समर्पित कर दिया गया। साथ ही यह बात भी दिमाग में चूहे की तरह छेद करने लगती है कि बाल दिवस तो सन् 1925 में ही मनाना आरम्भ कर दिया गया था औऱ सन् 1935 में पूरी दुनिया नें इसे मान्यता भी दे दी थी, तो नेहरू नाम की ये बत्ती किसने जला दी। मोतीलाल के लाल के किस्से तो जग-प्रसिद्ध हैं, आपने भी सुनें ही होगें। हां ये हो सकता है कि आप इन सब बातों पर विश्वास न करते हों पर बिना आग के धुंआ तो उठता भी नहीं साहब जी। फिर किस्से भी इतने हैं कि मन-गढ़ंत हों ऐसा प्रतीत भी नहीं होता। खैर वो बात न करके हम आते हैं मोती के लाल से भविष्य के लाल, पीले, नीले, गुलाबी यानी कि बच्चों पर, जिस पर हमें बात करनी है। ...

बलात्कार: अपराध या मानसिकता

बलात्कार : अपराध या मानसिकता दुनियां में होने वाले अपराधों में सबसे घृणित और वहशी अपराधों की श्रेणी में आने वाला अपराध बलात्कार को ही माना जाता है। किसी की अस्मिता को तार-तार करना वह भी मात्र अपनी वासना की छुधा को शान्त करने के लिए, इससे अधिक जघन्य अपराध कोई नहीं हो सकता है। इस अपराध के पीछे अपराध करने वाले की मानसिकता का प्रभाव होता है, जिसके कारण वह इस तरह के भयानक अपराध को करने से पहले और बाद में आने वाले परिणाम के बारे में भी नहीं सोचता है।   अपराध के कारण शिक्षा :    इस तरह के अपराध के कारणों का निश्चित विश्लेषण करना शायद ही संभव हो सकता है, क्योंकि हर घटना की अपनी परिस्थिति होती है। जरूरी नहीं कि जिस परिस्थिति में एक घटना घटित हुई हो वही परिस्थिति दूसरी घटना के लिए भी हो। परन्तु एक ऐसी चीज है जो सदैव समान ही रहेगी और वह है मानसिकता। हमारे समाज में अपराध की प्रवृत्ति बड़ती जा रही है। पहले ये तर्क दिया जाता था कि जो क्षेत्र अशिक्षित हैं वहीं पर ऐसी घटनाएं होती हैं। परन्तु आज के समय जो अधिक शिक्षित हैं वही ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहें हैं, तो मात्र शिक्षा...

महिला शोषण

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प्रथा के नाम पर महिलाओं का शोषण....             भारत में किराए की कोख पर किसी हद तक नियंत्रण लगा दिया गया है पर देश के अनेक हिस्सों में आज भी अनेक कुप्रथाएं वादस्तूर जारी हैं, जो महिलाओँ के लिए अभिशाप हैं और इन पर रोक लगाना बहुत ही जरूरी है। उन्हीं कुरीतियों में से एक है किराए की बीवी बनाने की प्रथा।             जहां एक ओर हम महिला सशक्तिकरण  और महिलाओं के अधिकारों की बात कर रहे हैं, वही दूसरी ओर देश में मौजूद कुछ कुप्रथाओं ने इन सब बातों पर पानी फेर रखा है। हमारे देश में कठोर कानून होने के बावजूद भी आज महिलाओं की खरीद फरोख्त के मामले सुनने को मिलते रहते हैं। जिनके परिणाम स्वरूप महिलाओं को जिस्मफरोशी के धन्धे में उतार दिया जाता है। लेकिन इन सब के बावजूद कुछ कुप्रथाएं आज भी जारी हैं जो महिलाओँ के अधिकारों का हनन कर रही हैं और इस समस्या पर न ही सरकार  का रुख स्पष्ट हो रहा है और न ही समाज के ठेकेदारों की आंखें खुल पा रही हैं।      ...

धार्मिक शोषण

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धर्म की आड़ में...... प्राचीन काल से ही मानव जीवन के धर्म का दबदबा कायम रहा है। शासन , प्रशासन और समाजिक जीवन इन सभी में धर्म का हस्ताक्षेप बना रहा है। यह बात किसी एक धर्म के लिए लागू नही होती है , बल्कि धर्म की बेड़ियों से मनुष्य को नियंत्रित रखने का कार्य सभी धर्मों ने किया है। हां यह जरूर रहा है कि कुछ धर्मों में कट्टरता की अधिकता देखने को मिल जाती है। प्रारम्भ में धर्म एक सामाजिक नियमावली की तरह ही था , जिसके माध्यम से सभी के मध्य समानता से कार्य वितरण सहजता से किया जा सके। लेकिन धर्म के तथाकथित रखवालों ने धर्म को सहज से जटिल बना दिया। अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए नए और जटिल नियम बनाए गए ताकि कुछ लोगों के हितों पर किसी तरह की आंच न आ सके। इन सभी में भय यानि की डर का सबसे विशेष महत्व रहा है। जन सामान्य को धर्म से डरा कर रखा गया है , जिससे लोगों के मन में किसी भी तरह से उस बात को बैठा दिया जाए जिससे विशेष वर्ग को लाभ मिल सके। पहले के यूरोपीय जगत में तो चर्चों के विरुद्ध बोलने की हिम्मत कोई नही कर पाता था , औऱ जिसने भी आवाज उठाई समझो उसे संसार से ही उठा दिया जाता था...

यात्रा: कुछ विशेष

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यात्रा : कुछ विशेष सांकेतिक चित्र      दीपावली अवकाश के समाप्त होते ही मैं कानपुर से भोपाल के लिए रवाना हुआ। अपने गांव से जब कानपुर सेन्ट्रल आया तो मैं अकेला ही था। समान्यत :  कानपुर और भोपाल की यात्रा में मेरा मित्र शिवम साथ ही रहता है परन्तु इस बार वह कुछ दिन पहले ही भोपाल वापस आ गया था।  अन्य यात्राओं की तरह ही इस बार भी मेरी यात्रा दिव्यांग डिब्बे वाली थी। ट्रेन का समय शाम सवा नौ बजे का था। मैं सही समय पर स्टेशन आ चुका था। भारतीय रेल ने भी अपनी गरिमा को ध्यान में रखा और लगभग आधा घण्टा विलम्ब से आई। मैं डिब्बे में चढ़ न सका क्यूंकि उसके सभी दरवाजे अन्दर से बन्द थे। दरवाजों को खुलवाने के लिए रेलवे पुलिस के दो जवानों से कहा तो उन्होंने दरवाजे खुलवाएं। मैंने अन्दर जाते ही देखा कि कुछ नेत्रहीन लड़के बैठे हैं जिन्होंने दरवाजों को बन्द कर रखा था ताकि कोई अन्य व्यक्ति अन्दर न आ सके। एक नजर से देखें तो उन्होंने सही किया था। साधारणतया दिव्यांग बोगी में पुलिस वाले कब्जा कर लेते हैं या फिर पैसे लेकर सामान्य व्यक्ति को उसमें बैठा देते हैं, जिससे दिव्यांग या...

तानाशाही प्रवृत्ति की परिवारवादी पार्टी

तानाशाही प्रवृत्ति की परिवारवादी पार्टी दुनिया के सभी देशों में आरम्भ में राजतंत्र रहा है और वर्तमान में भी कुछ देशों में संकेतिक रूप से राजतंत्र की व्यवस्था लागू है। लेकिन जिन देशों ने राजतंत्र को समाप्त करके जनतंत्र की व्यवस्था को अपनाया उन देशों में शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां पर किसी एक परिवार का दबदबा कायम हो। क्यूंकि देश किसी एक परिवार की जागीर नहीं होता है। जिन देशों में तनाशाही की व्यवस्था है सिर्फ वहीं आपको परिवार वाद देखने को मिल सकता है। भारत में आजादी के बाद से ही एक परिवार विशेष का राजनीति में वर्चस्व रहा है। और यह वर्चस्व इतना गहरा रहा है कि उस पार्टी की कमान और सर्वेसर्वा हमेशा से परिवारिक विरासत बन कर रहा गया है। कहने को तो वे स्वयं को लोकतांत्रिक पार्टी कहते हैं पर वास्तव में वह परिवार वाद की परम्परा को आगे बड़ाने वाली पार्टी के अतिरिक्त कुछ नही है। अच्छे और कदावर नेताओं के होने के बावजूद आज उस परिवारवाद की मानसिकता से ग्रसित पार्टी की स्थिति विलुप्त प्राय सी ही गई है। फिर भी उनके मन और मस्तिष्क से वंशवाद का कीडा समाप्त नही हुआ है। उस पार्टी या यूं कहें कि उस ...

रोहिंग्या शरणार्थी

शरणार्थी मामला रोहिंग्या शरणार्थियों का मामला दिन प्रति दिन गम्भीर होता जा रहा है। दुनिया के सभी देश यही चाहते हैं कि इस मामले को हर तरीके से हल किया जाए , ताकि दुनिया भर में मानवाधिकारों को लेकर जो गर्मागर्म माहौल बना हुआ है, उसमें विराम लग सके। रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के साथ जिस तरह की घटनाएं आज सामने आ रही हैं, वे वास्तव में अमानवीय हैं। परन्तु इस मामले में जिस तरीके से भारत सरकार पर देश और दुनिया के लोगों का जो दबाव पड़ रहा है, वह एक विचारणीय बात बन चुकी है। मामला मात्र किसी समुदाय को आश्रय देने तक ही सीमित होता तो शायद अबतक भारत सरकार आपनी सहमति दे चुकी होती। भारत की आन्तरिक और बाहरी समस्याओं पर जब हम ध्यान देते हैं तो शायद इस बात का जवाब हमें मिल जाता है कि भारत ने अभी तक रोहिंग्याओं के लिए अपने दरवाजे नही क्यूं नही खोले ? मेरे विचार से इसके तीन कारण तो स्पष्ट नजर आते हैं। सुरक्षा जिन परिस्थितियों में म्यामार के शान्त बौद्धों को हिंसक होना पड़ा, उन पर भी हमें ध्यान देना होगा और साथ ही देश के अन्दर अनेक पूर्व की आतंकी घटनाओं पर ध्यान दिया जाए तो हमें इस समुदाय के अन...