रोहिंग्या शरणार्थी
शरणार्थी
मामला
रोहिंग्या शरणार्थियों का मामला दिन प्रति दिन
गम्भीर होता जा रहा है। दुनिया के सभी देश यही चाहते हैं कि इस मामले को हर तरीके
से हल किया जाए, ताकि दुनिया भर में मानवाधिकारों को लेकर जो
गर्मागर्म माहौल बना हुआ है, उसमें विराम लग सके।
रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के साथ जिस तरह की
घटनाएं आज सामने आ रही हैं, वे वास्तव में अमानवीय हैं। परन्तु इस मामले में जिस
तरीके से भारत सरकार पर देश और दुनिया के लोगों का जो दबाव पड़ रहा है, वह एक
विचारणीय बात बन चुकी है। मामला मात्र किसी समुदाय को आश्रय देने तक ही सीमित होता
तो शायद अबतक भारत सरकार आपनी सहमति दे चुकी होती।
भारत की आन्तरिक और बाहरी समस्याओं पर जब हम
ध्यान देते हैं तो शायद इस बात का जवाब हमें मिल जाता है कि भारत ने अभी तक
रोहिंग्याओं के लिए अपने दरवाजे नही क्यूं नही खोले?
मेरे विचार से इसके तीन कारण तो स्पष्ट नजर आते
हैं।
सुरक्षा
जिन परिस्थितियों में म्यामार के शान्त बौद्धों
को हिंसक होना पड़ा, उन पर भी हमें ध्यान देना होगा और साथ ही देश के अन्दर अनेक
पूर्व की आतंकी घटनाओं पर ध्यान दिया जाए तो हमें इस समुदाय के अनेक लोगों की
आतंकी गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है। साथ ही जिस तरह से आतंकी संगठनों ने
इनके समर्थन में अपनी बात कही है उससे स्पष्ट हो जाता है कि कुछ हद तक इस समुदाय
की सहानुभूति आतंकियों के प्रति है। अन्यथा जो आतंकी सिर्फ लोगों को मारना जानते
हैं अचानक उनमें इस वर्ग के प्रति सहानुभूति कैसे आ गई। भारत समेत दुनिया के कई
देशों में पहले हो चुकी घटनाओं में रोहिंग्या समुदाय के लोगों की संलिप्तता पाई जा
चुकी है। जिस तरह की आतंकी घटना क्रम और विषम परिस्थितियों से देश गुजर रहा है, उस
स्थिति में सुरक्षा की नजरिए से इनको शरण
देना घातक सिद्ध हो सकता है, और ऐसा खतरा कोई भी सरकार नही उठाना
चाहेगी।
म्यामार
से राजनीतिक संबंध
भारत और म्यामार के बीच आपसी सामंजस्य हमेशा से
अच्छा बना रहा है। आजादी के बाद से हमारे रिस्ते और भी मजबूत हुए हैं। कुछ साल
पहले ही भारतीय सेना ने म्यामार की सीमा के अन्दर जाकर आतंकियों का खात्मा किया
था। उस अभियान में म्यामार ने हमारा साथ दिया था और वादा भी किया था कि भविष्य में
भी वह भारत के साथ रहेगा। अगर अंतरराष्ट्रीय नजरिए से देखें तो चीन दिन प्रतिदिन
भारत के लिए खतरा बनता जा रहा है। चीन भारत के सभी पड़ोसी देशों को किसी न किसी
तरीके से अपने पक्ष में करने औऱ भारत के खिलाफ खड़ा करने में लगा है। यदि हम
रोहिंग्या मामले में पड़ कर म्यामार का विरोध करते हैं या फिर शरणार्थियों को शरण
देने की भूल करते हैं तो यह अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारना होगा। भारत अपना एक
अहम औऱ भरोसेमंद पड़ोसी खो देगा। जिससे कारण
आतंकियों के लिए भारत में आने के नए विकल्प मिल जाएगें। चीन को बठे बिठाए
ही भारत को अपनी विस्तारवादी नीति का शिकार बनाने के लिए नया मित्र मिल जाएगा।
आर्थिक
समस्याएं
भारत में वैसे भी जनसंख्या दबाव अधिक है औऱ यदि
भारत सरकार रोहिंग्या समुदाय को शरण देती है तो यह बचकानी हरकत होगी। देश के
बहुताया लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन
रहे हैं। उस पर जब इन लोगों का बसाया जाएगा तो भोजन,पानी, कपड़े, आवास
आदि की दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। बांग्लादेशी शरणार्थियों की समस्या का
समाधान आज तक नही निकल पाया है। उस पर एक नयी समस्या मोल लेना किसी भी नजरिए से
अच्छा निर्णय नही हो सकता है।
जब कोई शरणार्थी किसी देश में जाता है तो उस
देश के सामने समस्या होती है कि उन्हें किस तरह से रखा जाए ताकि वे अपनी जरूरतों
को पूरा कर सकें औऱ उस देश के लिए भार न बनें। पर वास्तव में शरणार्थी हमेशा से
शरण देने वाले देशों के लिए समस्या ही बने हैं। भारत में बांग्लादेश से आए
शरणार्थी इसका जीता जागता उदाहरण है। रोहिंग्या समुदाय पर गुप्तचर विभाग और
सुरक्षा विभाग भारत सरकार को पहले ही चेतावनी जारी कर चुका है कि ये देश की
सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं।
यदि वास्तव में इस समस्या का कोई हल है तो वह
है म्यामार के साथ शान्त तरीके से बातचीत। यदि म्यामार सरकार पर उचित
अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़े और हर सम्भव मदद का वादा किया जाए तो ऐसा सम्भव है कि
वहां की सरकार रोहिंग्या मामले पर अपना रुख स्पष्ट और नरम कर लेगी। जैसा की अभी
वहां कि स्टेट काउंसलर सू की ने भी कहा है।
भारत के लिए यह एक कठोर निर्णय लेने का समय था
और भारत सरकार ने देश हित में जो निर्णय लिया उसका हम खुले दिल से समर्थन करते
हैं। देश की सुरक्षा से बड़ कर कुछ नही होता यह बात भारत सरकार ने स्पष्ट कर दी
है।
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