तानाशाही प्रवृत्ति की परिवारवादी पार्टी
तानाशाही प्रवृत्ति
की परिवारवादी पार्टी
दुनिया के सभी देशों
में आरम्भ में राजतंत्र रहा है और वर्तमान में भी कुछ देशों में संकेतिक रूप से
राजतंत्र की व्यवस्था लागू है। लेकिन जिन देशों ने राजतंत्र को समाप्त करके जनतंत्र
की व्यवस्था को अपनाया उन देशों में शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां पर किसी एक
परिवार का दबदबा कायम हो। क्यूंकि देश किसी एक परिवार की जागीर नहीं होता है।
जिन देशों में तनाशाही की व्यवस्था है सिर्फ वहीं आपको परिवार वाद देखने को मिल
सकता है।
भारत में आजादी के
बाद से ही एक परिवार विशेष का राजनीति में वर्चस्व रहा है। और यह वर्चस्व इतना
गहरा रहा है कि उस पार्टी की कमान और सर्वेसर्वा हमेशा से परिवारिक विरासत बन कर
रहा गया है। कहने को तो वे स्वयं को लोकतांत्रिक पार्टी कहते हैं पर वास्तव में वह
परिवार वाद की परम्परा को आगे बड़ाने वाली पार्टी के अतिरिक्त कुछ नही है। अच्छे
और कदावर नेताओं के होने के बावजूद आज उस परिवारवाद की मानसिकता से ग्रसित पार्टी
की स्थिति विलुप्त प्राय सी ही गई है। फिर भी उनके मन और मस्तिष्क से वंशवाद का
कीडा समाप्त नही हुआ है। उस पार्टी या यूं कहें कि उस परिवार का एक सदस्य भारत के
बाहर यह कह रहा है कि भारत में हर जगह वंशवाद है।
उन महाशय ने उदाहरण
भी दिए तो ज्यादातर व्यावसायिक परिवारों के और फिल्मी जगत की कुछ लोगों के, पर
शायद वे यह भूल गये कि देश न तो व्यावसाय है और नही फिल्मी दुनिया। पर शायद उनकी
समझ में यह बात कभी भी नही आ सकती क्यूंकि उनकी प्रखर बुद्धि और तेज दिमाग के कारण
ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय पप्पू की विभूति से नवाजा गया है। साथ ही उनकी
बुद्धिमत्ता के कारण उनकी पार्टी भारत के राजनीति के इतिहास में सामिल होने जा रही
है। अपनी मूर्खता से व्यक्ति स्वयं को समाप्त करता है, इस बात का वे महोदय जीवंत
उदाहरण है।
आजादी के बाद भारत
मे राजतंत्र को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया। यहां तक की जो उपाधियां राजा
महाराजाओं से जुड़ी होती थी उनको देने पर भी रोक लगा दी गई। देश के लिए जो संविधान
बनाया गया उसका आधार भी लोकतंत्रामक चुना गया। जिससे देश के नागरिकों को समानता मिल सके। पर वास्तव में जमीनी
तौर पर ऐसा न हो सका। आजादी के कई वर्षों तक एक पार्टी के रूप में परोक्ष रूप से
एक परिवार ने ही देश पर राज्य किया। जैसे एक राजा के परिवार की सभी सदस्य या उसके वंशज एक समान योग्य नहीं होते हैं, वही स्थिति इस पार्टी की भी हुई। कुछ अच्छे लोगों ने देश को नई दिशा और दशा
तो दी पर कुछ महान लोगों ने लुटिया भी डुबोई। कुछ महाशय तो लुटिया के साथ स्वयं ही
डूब गए।
अपनी नाकामी और
खामियों को सुधार करने की जगह देश को बदनाम करने लगें तो यह चिंता का विषय बन जाता
है। जैसा की आज हमारे
सामने है। उन महाशय ने अपनी विफलता को ढकने के लिए देश की अस्मिता को भी बेपर्दा
करने में परहेज नहीं किया। और आश्चर्य तो इस बात का है कि कुछ तथाकथित महान
बुद्धिजीवी लोग हां में हां मिला कर अपनी दासता का प्रमाण भी दे रहे हैं। गौर करने
वाली बात यह है कि देश में यदि परिवार वाद है तो उसका मूल तो आपकी ही पार्टी है।
इस बात पर शर्म करने की बजाय महाशय को इस बाद का गर्व है कि वे परिवार वादी
परम्परा के वाहक हैं। यदि वास्तव में वे परिवाद वाद के खिलाफ होते या फिर उनके
नुमाइंदे इस परम्परा के खिलाफ होते तो अब तक उन महाशय को उन्हीं की पार्टी नकार
चुकी होती। क्यूंकि महाशय को ढो-ढो कर पूरी पार्टी की रीढ़ की हड्डी चरमरा चुकी
है। उसपर महाशय के बोल वचन कोढ़ में खाज का काम करते हैं।
अब आप ही बताए जो
व्यक्ति अपनी बचकानी हरकातों और मूर्खता पूर्ण तर्कों से अपने ही पैर में
कुल्हाड़ी मार रहा हो, वह देश को कितना गौरव प्रदान कर सकता है। जिसकी वजह से पूरी
पार्टी के अस्तित्व पर संकट है, वह व्यक्ति स्वयं को भारत के प्रधानमंत्री पद का
प्रबल दावेदार मानता है। अफसोस तो इस बात का है कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहने को
तो भारत देश के स्वतंत्र नागरिक हैं पर वास्तव में आज भी मानसिक दासता के बंधन में
बंधे हुए हैं। उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य उस परिवार की खिदमत करना और जी
हुजूरी करना रहा गया है। ऐसा नही है कि उस पार्टी में अच्छे नेताओं की कमी है,
लेकिन किसी की बोलने की हिम्मत ही नही है। वास्तव में वह कोई लोकतंत्रिक पार्टी
नही है बल्कि तानाशाही प्रवृत्ति की परिवार वादी पार्टी है। जो लोगों को अपने
स्वर्थ के लिए उपयोग में लाती है और फिर उन लोगों का क्या होता है यह तो कोई नही
जानता।
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