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Showing posts from 2018

दलित विरोधी सवर्ण

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                    'दलित' विरोधी 'सवर्ण'            देश की राजनीति में भले ही स्थिरता दिख रही हो पर सामाजिक अस्थिरता बढ़ती जा रही है, जिसका एक मात्र कारण सरकार की गलत नीतियां हैं। भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र अस्तित्व दिया है परन्तु व्यवस्थापिका हर बार न्यायपालिका के कार्य क्षेत्र में हस्ताक्षेप करके संविधानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर रहा है। ऐसा ही कुछ sc-st अधिनियम को लेकर भी हुआ। कोई भी कानून ऐसा नहीं होता जिसमें कमियां न हो और यदि उन कमियों की वजह से किसी नागरिक के संविधानिक अधिकारों का हनन हो रहा हो तो सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह उस कानून में परिवर्त्तन कर सकता है। ऐसा ही ही कुछ  sc-st अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट ने किया। कोर्ट ने आंकड़ो के आधार पर कहा कि ज्यादातर केस फर्जी होते हैं, जिसकी वजह से निर्दोष सवर्णों को न्याय नहीं मिल पाता।   sc-st अधिनियम  की विसंगतियों को दूर करते हुए सिर्फ अग्रिम जमानत का प्रावधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया। परन्तु को...

शिक्षक और गुरू

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                   'शिक्षक' और 'गुरू'          समान्य रूप से हम शिक्षक और गुरू दोनों को एक ही समझ लेते हैं, परन्तु दोनों के बीच में बहुत बड़ा अन्तर है। वैदिक-कालीन समाज में गुरू को ईश्वर के समान माना जाता था। गुरूकुल की परंपरा के कारण शिष्य अपनी किशोरावस्था गुरू के साथ ही व्यतीत करते थे। गुरूकुल जिसका सीधा सा अर्थ है- गुरू का परिवार, जिसमें गुरू मुखिया और सभी शिष्य़ उस परिवार के सदस्य बनकर रहते थे। शिष्यों का पूरा दायित्व गुरू के पर ही रहता था। शिष्य़ का रहना, खाना-पीना, स्वास्थ और शिक्षा का दायित्व गुरू पर होता था। यहां पर विशेष बात यह है कि इतनी जिम्मेदारियों के बाद भी गुरू अपने शिष्य से किसी भी प्रकार की आर्थिक कमाई नहीं करता था। उसका खर्च किसी के द्वारा दिया गया दान या फिर गुरू और शिष्य़ों द्वारा मांगी गई भिक्षा से ही पूरा होता था।           यदि हम बात गुरू द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की करें तो गुरू अपने शिष्य़ को शस्त्र और शास्त्र दोनों ...

ब्राह्मण का बेटा

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                               ब्राह्मण का बेटा          चन्द्रशेखर पाण्डेय जी बलिया (उत्तर प्रदेश) के छोटे से गांव में रामनगर में रहते हैं। चन्द्रशेखर जी धार्मिक और कर्मकांडी ब्राम्हण हैं। पुरखों से मिली दो एकड़ जमीन से तो जीवन यापन होना मुश्किल है, इसलिए पाण्डेय जी ने पुरोहित का काम करना चालू कर दिया। वे अकसर बताया करते हैं कि उनके दादा जी के पास सत्तर एकड़ जमीन हुआ करती थी, पर अपने उदार स्वभाव के कारण ज्यादातर जमीन जरूरत मंदों को दे दी। पाण्डेय जी के पिता जी हरिशंकर पाण्डेय जी को अपने पिता से ग्यारह एकड़ जमीन मिली पर पत्नी के इलाज में नौ एकड़ जमीन बिक गई और जो बची वो पाण्डेय जी को विरासत में मिली। खैर पाण्डेय जी को इस बात को तनिक भी मलाल नही है कि उनके दादा जी की उदार प्रवृत्ति के कारण उन्हें आज आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है बल्कि उन्हें तो इस बात का फक्र है कि दादा जी ने गरीबों की मदद की।  ...

वर्तमान में देवर्षि नारद की प्रासंगिकता

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            वर्तमान में देवर्षि नारद की प्रासंगिकता          आज के समय में पत्रकारों की स्थिति चिंता का विषय बन गई है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, पर यहां पर हम आदि पत्रकार के रूप में पूज्य नारद जी को आदर्श मानते हुए वर्तमान के पत्रकारों की परिस्थिति को दर्शाना चाहते हैं। सर्वपूज्य- नारद जी का महत्व मात्र देवताओं में ही नहीं अपितु राक्षसों में भी रहा है। उन्हें तीनों लोकों के हर एक व्यक्ति ने समान महत्व दिया है। उसके पीछे का कारण उनकी प्रवृत्ति रही है। नारद जी ने कभी किसी का अहित नहीं किया और न ही यह प्रयास किया कि वह पक्षपात करें। जितना मान उन्हें देवताओं ने दिया उससे कहीं अधिक सम्मान राक्षसों ने भी किया है। वर्तमान में पत्रकारों को सत्ता और विपक्ष दोनों के द्वारा समान सम्मान मिलना   चाहिए। अवध्य- नारद जी कटु वक्ता के रूप में भी जाने जाते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि जो व्यक्ति सत्य बोलता है वह मृदु वक्ता नहीं हो सकता है। कटु वक्ता होने के बावजूद भी नारद जी के सम्मान और जीवन पर कभ...

लीक होते प्रश्न-पत्र ( व्यंग )

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        लीक होते प्रश्न-पत्र             भारतीय प्रश्न-पत्र लीक के इतिहास को खोलकर देखने पर आपको भारतीय युवाओं के होनहार होने के कई प्रमाण मिल जाएगेँ। बस सरकार उन्हें इस सराहनीय कार्य के लिए प्रमाण-पत्र नहीं दे पा रही है। ये भी एक कला है और हां काम तो बेहद मेहनत का है, साथ में रिस्क अलग से है। बेरोजगारी ने तो करेले को नीम पर चढ़ा दिया है। सरकारी संस्थान भी अपनी इंटरनेट सुरक्षा इतनी अधिक रखते हैं कि कोई अवतारी व्यक्ति ही सेंध लगा सकता है। और आप ये बात अच्छे से जानते हैं कि भारत में अवतारी व्यक्तियों की कमी नहीं है। हर वर्ष ऐसे कई अवतार हो जाते हैं, जो हमारे युवाओं की परीक्षा के दबाव को कम करने में अपना सहयोग दे देते हैं। इस परोपकार के बदले में अच्छी रकम के साथ उन युवाओं के करोड़पति माता-पिता का आशिर्वाद भी मिल जाता है। चूंकि भारत धार्मिक देश है, तो इतना पुण्य तो हर कोई कमाना चाहता है। हां कुछ एक निठल्ले लोग हैं, जो दिन-रात दिमाग घिस-घिस कर पढ़ते रहते हैं, औऱ सोंचते हैं कि वे पास भी होंगे और अच्छी नौकरी भी पा जाएगें। ...

जीवन की दौड़

  जीवन की दौड़ कल्पनाओं के अनंत आकाश में गोते खाता मन, कुछ पाने की तलास में ठोकर खाता तन, उलझा हुआ हूं पहेलियों में बीत रहा जीवन, दीप्त प्रतिस्पर्धा की दोपहर में झुलस रहा भोल...

‘गांव’

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               ममता और समरसता से परिपूर्ण ‘ गांव ’            विकास की अन्धी दौड़ में मनुष्य अपनी सभ्यता से विमुख होता जा रहा है, और आज यह स्थिति इतनी विकट हो गई है कि हम अपने ही परिवार से दूर होते जा रहे हैं। व्यक्ति एकाकी जीवन में ही अपनी प्रगति का समझता है। अपनों से दूर होकर सिर्फ अपने लिए आधुनिक सुविधाएं एकत्रित कर लेना मात्र ही व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य रहा गया है। इसका परिणाम यह है कि व्यक्ति के पास सर्वसुविधाएं होने के बावजूद भी वह तनाव में जीवन जीता है और उसी तनाव में स्वयं को समाप्त भी कर लेता है। इन परिस्थितियों का एक मात्र कारण व्यक्ति का व्यक्तिवादी होना है। यदि इसी बात को सरल शब्दों में कहें तो हम यह भी कह सकते हैं कि आज के परिदृष्य में हर एक व्यक्ति स्वार्थी होता जा रहा है, जो सिर्फ और सिर्फ आपने विषय में ही सोचता है।           यदि हम गांव और शहरों की तुलना करें तो ये बात सभी जानते हैं कि गांव का ...

जब कृष्ण बने मुरारी

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                                         जब श्रीकृष्ण बने मुरारी                   द्वापर युग में प्रागज्योतिषपुर नामक एक राज्य था , जिस पर भौमासुर नामक राक्षस राज किया करता था। भौमासुर की मां पृथ्वी थीं।। भौमासुर यह बात भाली-भांति जानता था कि कोई भी मां अपने पुत्र की मृत्यु की कामना नहीं कर सकती है। इसीलिए भौमासुर ने ब्रम्हा की कठोर तपस्या करके वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु उसकी मां की इच्छा से ही हो। इस वरदान के कारण भौमासुर अजेय हो गया। अपनी आसुरी प्रवृत्ति के कारण तीनों लोकों में उसका आतंक दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा। भौमासुर का सेनापति जिसका नाम मुरार था , उसकी सहायता से भौमासुर ने देवताओं को परास्त करके उन्हें स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। भौमासुर की तरह ही मुरार भी अजेय था क्योंकि उसकी पुत्री अहिलावती कामाख्या देवी की उपासक थी और उसे कामाख्या देवी ने वरदान दिया था कि उसकी सदैव सहायता करेंगी।         ...

छात्रों में अनुशासन लोकतंत्र का आधार है

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                         छात्रों में अनुशासन लोकतंत्र का आधार है    लोकतंत्र की परिभाषा में ही हमें बता दिया जाता है कि इस प्रणाली में हमें सबकी सहभागिता की आवश्यकता होती है। सबके साथ से ही देश के विकास का रास्ता बन पाता है। यदि बात साथ की हो रही है तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि सबसे महत्वपूर्ण सहयोग रहता है छात्रों का , जो किसी भी देश के कायाकल्प में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन करते हैं। अगर हम छात्रों की ही बात कर रहे हैं तो हमें इसपर भी ध्यान देना होता है कि छात्रों में अनुशासन की भावना का होना आवश्यक होता है। अनुशासन की भावना इसलिए कहा क्योंकि अनुशासन किसी के सिखाने से नहीं आ सकता है , यह एक मात्र हमारे अन्दर ही अपने आप उत्पन्न होने वाली भावना है , जो हमें औरों से अलग करती है। अत :   यदि स्व :  अनुशासन की बात की जाए तो यह अधिक सही रहेगा। यदि छात्र अनुशासित होंगे तो स्वाभाविक है कि देश का प्रत्येक नागरिक अनुशासित होगा। क्योंकि यह तो स्पष्ट ही है क...

देश प्रेम

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                  देश प्रेम         नागरिकों का देश प्रेम ही देश के भविष्य की राह प्रशस्त करता है। नागरिकों के सहयोग के बल पर ही कोई राष्ट्र सम्पन्नता के शिखर पर पहुंच सकता है। आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में हमें जितने भी राष्ट्र सशक्त और संपन्न दिख रहे हैं, उन सभी का एकमात्र आधार उस देश के नागरिक ही हैं। सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक आदि कई तरह की विषमताएं दुनिया के सभी देशों में व्याप्त हैं पर शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां पर नागरिकों में अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम का भाव व उस भाव में एकमतता न हो। जब बात देश की हो या फिर देश हित की हो तो हम सभी को एकमत होकर सिर्फ और सिर्फ देश के हित के लिए समर्पित हो जाना चाहिए। भारत में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है परन्तु सिर्फ मानसिक रूप से ही देश भक्त होने से देश का भला और हमारा भला नहीं हो सकता है। मैं बात करना चाहता हूं जापान की जो क्षेत्रफल में छोटा है पर अपने कार्यों में हमसे कहीं बड़ा है। जापान में प्रथम विश्व युद्ध के पहले से ही लोगों के अन्दर देश प्रेम की भावना भरी ...

मित्रता

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मित्रता दुनिया में अपने पदार्पण के बाद मनुष्य को संबंधों का एक जाल विरासत में मिलता है। जन्म से ही व्यक्ति अनगिनत रिश्तों की डोर से जुड़ा रहता है। कुछ रिश्ते मां के पक्ष से और कुछ रिश्ते पिता के पक्ष से हर व्यक्ति को स्वत : ही मिल जाते हैं। जब व्यक्ति का विवाह होता है तो इन रिश्तों में कुछ और लोग जुड़ जाते हैं। रिश्तों के अपने मायने भी होते हैं। इन्हीं रिश्तों की वजह से व्यक्ति सामाजिक प्राणी से रूप में परिवर्तित हो पाता है।     सामाजिक बन्धन कहे जाने वाले रिश्तों में से एक ही रिश्ता ऐसा है जो हम अपनी आप निर्धारित करते हैं और वह है मित्रता । वैसे तो मित्रता का अर्थ व्यापक होता है, जिन्हें आज के संकुचित विचारधारा के युवाओं का समझाना थोड़ा जटिल है। आज के परिपेक्ष में देखें तो जिस व्यक्ति से अपना स्वार्थ सिद्ध हो रहा होता है, हम उसे अपना मित्र कहने लगते हैं और जैसे मतलब निकल गया सामने वाला गया भाड़ में। अब इसे मित्रता का नाम देना वास्तव में मित्रता शब्द का अपमान करना ही तो है। जब मित्रता की बात आती है तो हमारे मस्तिष्क में सबसे पहले एक चित्र स्वत : ...