जीवन की दौड़
जीवन की दौड़
कल्पनाओं के अनंत आकाश में
गोते खाता मन,
कुछ पाने की तलास में
ठोकर खाता तन,
उलझा हुआ हूं पहेलियों में
बीत रहा जीवन,
दीप्त प्रतिस्पर्धा की दोपहर में
झुलस रहा भोलापन,
महात्वाकांक्षाओं की प्यास में
सूख रहा अपनापन,
प्रतिदिन की अन्धी दौड़ में,
छूट गया बचपन,
सब कुछ पाकर इस जीवन में
निष्प्राण हुआ जीवन।
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