वर्तमान में देवर्षि नारद की प्रासंगिकता
वर्तमान में देवर्षि नारद की प्रासंगिकता
आज के समय में पत्रकारों की स्थिति चिंता का विषय बन गई है। इसके पीछे कई
कारण हो सकते हैं, पर यहां पर हम आदि पत्रकार के रूप में पूज्य नारद जी को आदर्श
मानते हुए वर्तमान के पत्रकारों की परिस्थिति को दर्शाना चाहते हैं।
सर्वपूज्य- नारद जी
का महत्व मात्र देवताओं में ही नहीं अपितु राक्षसों में भी रहा है। उन्हें तीनों
लोकों के हर एक व्यक्ति ने समान महत्व दिया है। उसके पीछे का कारण उनकी प्रवृत्ति
रही है। नारद जी ने कभी किसी का अहित नहीं किया और न ही यह प्रयास किया कि वह
पक्षपात करें। जितना मान उन्हें देवताओं ने दिया उससे कहीं अधिक सम्मान राक्षसों
ने भी किया है। वर्तमान में पत्रकारों को सत्ता और विपक्ष दोनों के द्वारा समान
सम्मान मिलना चाहिए।
अवध्य- नारद जी
कटु वक्ता के रूप में भी जाने जाते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि जो व्यक्ति
सत्य बोलता है वह मृदु वक्ता नहीं हो सकता है। कटु वक्ता होने के बावजूद भी नारद
जी के सम्मान और जीवन पर कभी संकट नहीं आया। क्योंकि वे तो समाज का चिंतन करते थे।
और समाजिक बुराईय़ों को दूर करने का प्रयास करते थे। लेकिन कभी भी सत्ताधारी या फिर
सामर्थ्यवान व्यक्ति ने उनके अपमान करने या जीवन समाप्त करने का प्रयास तक नहीं किया।
ठीक नारद की तरह ही आज के पत्रकारों को भी स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए ताकि वे
निर्भीक होकर काम कर सकें।
सर्वगम्य- नारद
जी को बिना रोक-टोंक के कहीं पर भी जाने की अनुमति थी। उन्हें कोई भी रोक नहीं
सकता था। यह सूचनाओं की पारदर्शिता के लिए जरूरी भी होता है। नारद के सर्वगम्य
होने से पूरे त्रिभुवन की सूचनाएं पूरे त्रिभुवन तक सहजता से पहुंच जाती थी। एक
पत्रकार पर रोक लगाने का सीधा सा अर्थ होता है सूचनाओं के प्रवाह को बाधित करना,
औऱ जो स्थितियां आज बन रहीं हैं वहां पर सूचनाएं सदैव बाधित होती रहती हैं,
क्योंकि पत्रकार अब सर्वगम्य नहीं रहा।
निर्भीक- नारद
की निर्भीकता ही तो थी, कि संसार के संचालक भगवान विष्णु को भी श्राप दे दिया।
सत्ता पर बैठे व्यक्ति से डरे बिना अपने कार्य को पूरा करना एक पत्रकार का मूल
सिद्धान्त होता है, जिस पर चलकर ही पत्रकार अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। पर
वर्तमान में पत्रकारों की निर्भीकता समाप्त हो गई है। जिसके परिणाम स्वरूप कोई भी
पत्रकार सत्ता के गलत होने के बावजूद खिलाफत करने से डरता है।
निरपेक्षता- किसी का पक्षपात
न करना तो नारद का गुण कहें या फिर महागुण, वैसे महागुण जैसा शब्द होता नहीं पर
जिस तरह से नारद ने निरपेक्षता के साथ अपने लोकहित के कार्य को किया, वह धारणीय है
वर्तमान के पत्रकारों के लिए, क्योंकि जो परिस्थितियों आज के समय में बन रही हैं
उनमें निरपेक्षता से पत्रकार दूर हटते जा रहें या फिर निरपेक्षता को गलत ढ़ग से
परिभाषित कर रहे हैं।
निस्वार्थ- नारद जी
ने कभी कोई कार्य स्वयं के लिए नहीं किया बल्कि समाज के लिए किया। क्योंकि पत्रकार
का दायित्व समाज के प्रति होता है। उसे हर तरह से समाज के उत्थान के बारे में
चिंतन करना चाहिए। यदि हम अपने लिए ही की कार्य करेंगे तो यह निश्चित है कि हमारे
कार्य में हजारों दुर्गुण व्यप्त हो जाएगे।

बहुत अच्छा लेख। कुछ लोगों ने देवर्षि नारद की छवि को सुनियोजित ढंग से बिगाड़ा है।
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