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Showing posts from March 19, 2018

‘गांव’

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               ममता और समरसता से परिपूर्ण ‘ गांव ’            विकास की अन्धी दौड़ में मनुष्य अपनी सभ्यता से विमुख होता जा रहा है, और आज यह स्थिति इतनी विकट हो गई है कि हम अपने ही परिवार से दूर होते जा रहे हैं। व्यक्ति एकाकी जीवन में ही अपनी प्रगति का समझता है। अपनों से दूर होकर सिर्फ अपने लिए आधुनिक सुविधाएं एकत्रित कर लेना मात्र ही व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य रहा गया है। इसका परिणाम यह है कि व्यक्ति के पास सर्वसुविधाएं होने के बावजूद भी वह तनाव में जीवन जीता है और उसी तनाव में स्वयं को समाप्त भी कर लेता है। इन परिस्थितियों का एक मात्र कारण व्यक्ति का व्यक्तिवादी होना है। यदि इसी बात को सरल शब्दों में कहें तो हम यह भी कह सकते हैं कि आज के परिदृष्य में हर एक व्यक्ति स्वार्थी होता जा रहा है, जो सिर्फ और सिर्फ आपने विषय में ही सोचता है।           यदि हम गांव और शहरों की तुलना करें तो ये बात सभी जानते हैं कि गांव का ...