‘गांव’
ममता और समरसता से
परिपूर्ण ‘गांव’
विकास की अन्धी दौड़ में मनुष्य अपनी सभ्यता से विमुख होता जा रहा है, और
आज यह स्थिति इतनी विकट हो गई है कि हम अपने ही परिवार से दूर होते जा रहे हैं।
व्यक्ति एकाकी जीवन में ही अपनी प्रगति का समझता है। अपनों से दूर होकर सिर्फ अपने
लिए आधुनिक सुविधाएं एकत्रित कर लेना मात्र ही व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य रहा
गया है। इसका परिणाम यह है कि व्यक्ति के पास सर्वसुविधाएं होने के बावजूद भी वह
तनाव में जीवन जीता है और उसी तनाव में स्वयं को समाप्त भी कर लेता है। इन
परिस्थितियों का एक मात्र कारण व्यक्ति का व्यक्तिवादी होना है। यदि इसी बात को
सरल शब्दों में कहें तो हम यह भी कह सकते हैं कि आज के परिदृष्य में हर एक व्यक्ति
स्वार्थी होता जा रहा है, जो सिर्फ और सिर्फ आपने विषय में ही सोचता है।
यदि हम गांव और शहरों की तुलना करें तो ये बात सभी जानते हैं कि गांव का
सीधा सा अर्थ शान्त औऱ सुकून से भरा हुआ जीवन होता है, और शहरी जीवन भागदौड़ से
भरा होता है। जहां एक ओर गांव में लोगों के पास अपने परिवार और अपनों के लिए पर्याप्त
समय होता है वहीं दूसरी ओर शहरों में जिंदगी भी गाड़ियों की रफ्तार से इस तरह भाग
रही हैं कि अपने लिए ही वक्त निकालना असम्भव हो रहा है, तो अपनों के लिए कोई
व्यक्ति कैसे समय निकाल सकता है। अभी हम सिर्फ और सिर्फ गांव की बात करने वाले
हैं। जब कोई भी व्यक्ति गांव की बात करता है तो हमारे दिमाग पर यही बात आती है कि
गांव का मतलब असुविधाएं, अव्यवस्थाएं और बदहाल जिंदगी। पर वास्तव में गांव इन सभी
से परेय है। एक गांव को जानने के लिए पहले हमें एक इंसान बनना पड़ेगा, तब जाकर हम
गांव को सही तरीके से समझ सकेंगे। वर्तमान में गांव हमारी प्रचीन परम्पराओं और
मान्यताओं के संवहक हैं, जिन सभ्यता की जड़ों पर हमारा वर्तमान है, वे सभी हमारे
गांवों में ही बसती हैं। हम जिस आधार पर खड़े होकर स्वयं के आधुनिक होने की बात
करते हैं वो हमारे गांव ही हैं।
यदि
हम अपनी संकुचित बुद्धि के दायरे से बाहर निकलें तो देखते हैं कि गांवों ने आज भी
आपसी सामंजस्य, प्रेम, समरसता के माध्यम से सामाजिकता को जीवंत रखा हुआ है।
संयुक्त परिवार की परंपरा हो या फिर पड़ोसी धर्म के निर्वहन की बात सभी में गांवों
में बसने वाले लोग आज भी शहरी लोगों से कहीं आगे हैं। यूं तो हम ग्रामीणों को
पिछड़ा और आधुनिकता से दूर समझते हैं पर वास्तव में आज के समय में हम स्वयं ही उन
परम्पराओं से दूर होकर अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं जिन्हें गांवों ने जीवित रखा
है। ग्रामीणों में आज भी आपसी प्रेम और सौहार्द विद्यमान है। लोग एक दूसरे की भावनाओं
का सम्मान करते हैं। सुख और दुख में हर कदम साथ रहते हैं। किसी एक व्यक्ति का या
परिवार का कष्ट सिर्फ उसका कष्ट नहीं होता है अपितु ये कष्ट पूरे गांव का होता है।
जिस तरह हम सुख के समय एकत्रित होकर अपनत्व का भाव दिखाते हैं ठीक उसी तरह दुख में भी सदैव एक दूसरे के साथ खड़े रहते हैं।
आज भी लोग त्योहारों को मनाने के लिए गांव आते
हैं क्योंकि त्योहार शब्द को सार्थकता देने का कार्य आज भी गांवों से अच्छा कोई
नहीं कर सकता है। शहरों में किसी पर्व को मनाने के लिए लोगों को बुलाना पड़ता है
और यह सुनिश्चित नहीं होता कि कौन आएगा, वहीं गांवों में पर्व या त्योहारों में
लोग स्वयं एक दूसरे से मिलने जाते हैं, एक साथ मिलकर ही पर्व को पर्व का सही
स्वरूप देते हैं।
देश को तोड़ने में जातीय समीकरण जिस तरह से हावी होता जा रहा है, उस दृष्टि
से भी गांव आज हमारे लिए एक आदर्श की तरह हैं। गांवों में आज भी लोगों का सम्बोधन
अपने परिवार की तरह ही होता है। हर एक ग्रामीण चाचा-चाची, ताऊ-ताई, भैया-भाभी आदि
से एक दूसरे से संबोधित करता है, इसमें कहीं भी धर्म जाति आड़े नहीं आती है। हर एक
व्यक्ति एक-दूसरे के सम्मान का पूरा ध्यान रखता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों के
बीच आपसी प्रेम और ममत्व की भावना बनी रहती है। यदि बात आधुनिकता की करें तो गांव के लोग आधुनिक
हैं पर वैसे नहीं जिस तरह से वर्तमान में आधुनिकता को परिभाषित किया जाता है।
गांवों में आधुनिकता या विकास का एकमात्र मानक खुशहाली है। व्यक्ति कम संशाधनों
में भी किस तरह से खुश रह सकता है यह आप गांवों में जाकर देख सकते हैं।
जैसे-जैसे शहरीकरण बड़ता जा रहा है वैसे ही
व्यक्ति की विचारधारा भी परिवर्तित होती जा रही है। आधुनिकता की आंधी ने अब गांवों
को भी प्रभावित करना आरम्भ कर दिया है। इस अर्थ युग ने लोगों को अपनी ओर इस तरह से
खींचा है कि हर व्यक्ति सिर्फ धन की ओर दौड़ा चला जा रहा है। आज धन हर एक व्यक्ति
की मजबूरी बन चुका है, और इसी मजबूरी के कारण गांवों के लोग भी शहरों की ओर दौड़े
चले जा रहे हैं। फर्क इतना है कि पहले यह मजबूरी थी और आज यह जरूरी हो गया है।
लोगों के मन में सिर्फ सुविधाएं जुटाने की भावना मात्र नहीं है वरन भावना है आपने
आपको सबसे बड़ा दिखाने की, और इसी भावना ने हमारे गांवों को भी शहरीकरण की ओर
अग्रसर कर दिया है। लोग इसे अच्छा समझ रहे हैं पर वास्तव में यह भस्मासुर से कम
नहीं है जो आगे आने वाले समय में हमारे लिए
ही नहीं बल्कि हमारी परम्परा के विनास का
कारण बनने वाला है।

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