छात्रों में अनुशासन लोकतंत्र का आधार है
छात्रों
में अनुशासन लोकतंत्र का आधार है
लोकतंत्र की परिभाषा में ही हमें बता दिया जाता है कि इस प्रणाली में
हमें सबकी सहभागिता की आवश्यकता होती है। सबके साथ से ही देश के विकास का रास्ता
बन पाता है। यदि बात साथ की हो रही है तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि सबसे
महत्वपूर्ण सहयोग रहता है छात्रों का, जो किसी
भी देश के कायाकल्प में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन करते हैं। अगर हम छात्रों
की ही बात कर रहे हैं तो हमें इसपर भी ध्यान देना होता है कि छात्रों में अनुशासन
की भावना का होना आवश्यक होता है। अनुशासन की भावना इसलिए कहा क्योंकि अनुशासन
किसी के सिखाने से नहीं आ सकता है, यह एक
मात्र हमारे अन्दर ही अपने आप उत्पन्न होने वाली भावना है, जो हमें
औरों से अलग करती है। अत: यदि स्व: अनुशासन
की बात की जाए तो यह अधिक सही रहेगा। यदि छात्र अनुशासित होंगे तो स्वाभाविक है कि
देश का प्रत्येक नागरिक अनुशासित होगा। क्योंकि यह तो स्पष्ट ही है कि यही छात्र
ही आगे चलकर हमारे देश के जागरुक नागरिक बनते हैं। इसी बात को सामान्य शब्दों में
कहा जाए तो हम कह सकते हैं कि अनुशासित छात्र ही देश के अनुशासित नागरिक बन सकते
हैं और यह अनुशासन की भावना हमारे अन्दर स्वत: ही आती है। इसे किसी के द्वारा थोपा नहीं जा सकता
है। हां इतना संभव है कि हमें अनुशासित रहने के लिए कोई प्रेरित करता रहे औऱ साथ
ही साथ हर एक पल हमारे अन्दर के अनुशासित भावों को परखता भी रहे। यदि ऐसा वास्तव
में होता है तो हमारे अन्दर एक स्तर तक अनुशासन की भावना आ जाएगी।
अनुशासन का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं की जो कुछ कहा औऱ बताया जाए आंख
बंद करके उसे स्वीकार कर लिया जाए। बल्कि अनुशासन इससे हटकर कुछ अधिक स्पष्ट भाव
है। अनुशासन हमें सिखाता है कि हमें कोई कार्य कैसे और किस प्रकार से करना चाहिए।
साथ ही हमें अपने कर्तव्यों के प्रति भी जागरुक बनाता है। हमें अपने विचारों को
नियंत्रित रखने की कला भी एकमात्र अनुशासन के बल पर ही मिल सकती है। किसी व्यक्ति
का जीवन अनुशासन के अभाव मे कैसा हो जाता है यह बताने की आवश्यकता शायद मुझे नहीं
है क्योंकि आप सभी जानते हैं कि अनुशासन विहीन व्यक्ति पशुवत व्यवहार करता है, जिसका
परिणाम यह होता है कि समाज की मुख्य धारा से उसे सदैव के लिए दूर कर दिया जाता है।
और तबतक दूर रखा जाता है जबतक वह अनुशासन में रहना सीख नहीं जाता है। समाज के
प्रत्येक व्यक्ति को अनुशासित रहने की आवश्यकता होती है, जिससे वह
अनावश्यक रूप से किसी के कार्यों में हस्ताक्षेप नहीं करता है और अपने कार्यों के
प्रति भी सदैव सजग ही रहता है। जोकि अनुशासन का प्रमुख आधार है।
छात्र
जीवन में ही हम जो कुछ सीखते हैं उसी के आधार पर हम अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
यदि हमारे छात्र जीवन का आरम्भ ही अनुशासन विहीन रहा तो यह निश्चित है कि हमारा
पूरा जीवन ही दिशा विहीन हो जाएगा। एक दिशा विहीन व्यक्ति का जीवन किस तरह का होता
है यह स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। यदि देश
का नागरिक ही दिशा विहीन हो जाता है तो यह तो निश्चित है कि देश रसातल में जाएगा
ही जाएगा। अत: हमें
आवश्यकता है तो सिर्फ औऱ सिर्फ अनुशासित नागरिकों की जो आपने आधिकारों के साथ-साथ
अपने कर्तव्यों के प्रति भी जागरुक हों औऱ यह सब तभी संभव हो सकता है जब हम अपने
देश के प्रत्येक छात्र के अन्दर अनुशासन की भावना को उत्पन्न कर सकें। यदि ऐसा हो
गया तो लोकतंत्र को सच्चे अर्थों में सार्थक स्वरूप दे दिया जाएगा। देश को फिर कभी
भी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ेगा।

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