दलित विरोधी सवर्ण
'दलित' विरोधी 'सवर्ण'
देश की राजनीति में भले ही स्थिरता दिख रही हो पर सामाजिक अस्थिरता बढ़ती जा रही है, जिसका एक मात्र कारण सरकार की गलत नीतियां हैं। भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र अस्तित्व दिया है परन्तु व्यवस्थापिका हर बार न्यायपालिका के कार्य क्षेत्र में हस्ताक्षेप करके संविधानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर रहा है। ऐसा ही कुछ sc-st अधिनियम को लेकर भी हुआ। कोई भी कानून ऐसा नहीं होता जिसमें कमियां न हो और यदि उन कमियों की वजह से किसी नागरिक के संविधानिक अधिकारों का हनन हो रहा हो तो सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह उस कानून में परिवर्त्तन कर सकता है। ऐसा ही ही कुछ sc-st अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट ने किया। कोर्ट ने आंकड़ो के आधार पर कहा कि ज्यादातर केस फर्जी होते हैं, जिसकी वजह से निर्दोष सवर्णों को न्याय नहीं मिल पाता। sc-st अधिनियम की विसंगतियों को दूर करते हुए सिर्फ अग्रिम जमानत का प्रावधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया। परन्तु कोर्ट के इस फैसले को सरकार की वोटवादी नीति की नजर लग गयी। सरकार ने विधेयक पेश कर कोर्ट के फैसले को पलट दिया।
गाय कितनी भी क्यों न सीधी हो, परेशान करोगे तो लात मारेगी। ऐसा ही कुछ सवर्णों के साथ हुआ। आरक्षण के कोढ़ में sc-st अधिनियम ने खाज का काम किया, जिसका परिणाम सवर्णों के आक्रोश में सामने आया। जब सवर्णों अपने अघिकार के लिए रोड़ पर आए तो उन पर दलित विरोधी होने की मोहर लग गई। वैसे भी यह सर्व विदित है कि सवर्ण दलितों को हमेशा से परेशान करते आए हैं। तो अब अधिकार के नाम से एक गलत अधिनियम का सहारा लेकर अनावश्यक रूप से सवर्णों को परेशान किया जा रहा है। जिसमे ज्यादातर राजनीतिक स्वार्थ छुपा रहता है।
दलित वर्ग के उत्थान से कहीं अधिक कार्य सवर्णों को गिराने का किया जा रहा है। इस तरह के प्रयास से कभी किसी को बराबरी का अधिकार नहीं मिल सकता है, सिर्फ और सिर्फ घृणा की भावना का सामना ही करना पड़ता है। वर्तमान समाज में सभी कहीं न कही सामाजिक समानता का भाव देखने को मिल जाता है परन्तु आरक्षण और SC-ST अधिनियम जैसे कानूनों और नियमों की वजह से आपसी मतभेद और बढ जाते हैं, जिसका परिणाम आपसी संघर्ष के रूप में आता है। सरकार को सवर्णों की दलित विरोधी छवि को मिटाने के लिए प्रयास करना चाहिए, जिससे समाज में स्थिरता आ सके।
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कोई भी कानून सिर्फ और सिर्फ घृणा और तिरस्कार की भावना का कारण बन सकता है, अगर समानता चाहिए तो नियमों में भी समानता होनी चाहिए। हां अपने उत्थान के लिए सुविधाओं की मांग की जा सकती है क्योंकि बैशाखी के सहारे चल सकते हैं दौढ़ना संभव नहीं है। और अगर आगे दौढ़ रहे व्यक्ति को जबरन रोक कर बैशाखी वाले को आगे करने का प्रयास किया जाएगा तो विद्रोह होना स्वाभाविक है, जिसका परिणाम कोई एक वर्ग नहीं बल्कि पूरा देश को प्रभावित करेगा।

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