जब कृष्ण बने मुरारी


                                        जब श्रीकृष्ण बने मुरारी




                  द्वापर युग में प्रागज्योतिषपुर नामक एक राज्य था, जिस पर भौमासुर नामक राक्षस राज किया करता था। भौमासुर की मां पृथ्वी थीं।। भौमासुर यह बात भाली-भांति जानता था कि कोई भी मां अपने पुत्र की मृत्यु की कामना नहीं कर सकती है। इसीलिए भौमासुर ने ब्रम्हा की कठोर तपस्या करके वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु उसकी मां की इच्छा से ही हो। इस वरदान के कारण भौमासुर अजेय हो गया। अपनी आसुरी प्रवृत्ति के कारण तीनों लोकों में उसका आतंक दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा। भौमासुर का सेनापति जिसका नाम मुरार था, उसकी सहायता से भौमासुर ने देवताओं को परास्त करके उन्हें स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। भौमासुर की तरह ही मुरार भी अजेय था क्योंकि उसकी पुत्री अहिलावती कामाख्या देवी की उपासक थी और उसे कामाख्या देवी ने वरदान दिया था कि उसकी सदैव सहायता करेंगी।

                देवताओं की विनती पर  श्रीकृष्ण  भौमासुर से युद्ध करने के लिए चल दिए। श्रीकृष्ण नें अपने साथ अपनी पटरानी सत्यभामा को भी युद्ध के लिए तैयार किया क्योंकि सत्यभामा पृथ्वी के अंश से ही उत्पन्न हुई थी। दोनों दलों में कई दिनों तक भीषण युदध होता रहा।  हार और जीत का निर्णय न होता देख सत्यभामा का क्रोध बढ़ता जा रहा था। श्रीकृष्ण औऱ भौमासुर का युद्ध समाप्त नहीं हो रहा था तब सत्यभामा ने कहा कि प्रभू इस दुष्ट का वध कर दो। श्रीकृष्ण यही चाहते थे कि सत्यभामा अपने मुख से भौमासुर का वध करने को कहें जिससे ब्रम्हा का वरदान व्यर्थ न हो। सत्यभामा के कहते ही श्रीकृष्ण नें भौमासुर का वध कर दिया। लेकिन समस्या तो मुरार था क्योंकि कामाख्या देवी स्वयं अपने वचन के कारण मुरार की रक्षा कर रहीं थी। लेकिन स्वयं श्रीकृष्ण ने कामाख्या देवी को युद्ध में भाग न लेने का आदेश देकर  भौमासुर के सेनापति मुरार का भी वध कर दिया। मुरार राक्षस का वध करने के कारण मुरार की पुत्री व्याकुल होकर स्वयं युद्ध के लिए श्रीकृष्ण के सम्मुख आ गई , लेकिन देवी कामाख्या ने उसे बताया कि ये स्वयं परम् ब्रम्ह हैं, और श्रीकृष्ण नें अहिलावती को अपने दिव्य स्वरूप के दर्शन कराए। साथ ही एक वरदान देने का वचन भी दिया। अहिलावती ने वरदान में ऐसे पुत्र की कामना की जिसे त्रिभुवन में कोई जीत न सके।
     
                 मुरार का वध करने के  कारण ही श्रीकृष्ण का नाम मुरारी हो गया। मुरार की पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण ने भीमसेन और हिडिम्बा के पुत्र धटोत्कच से करा दिया। कालांतर में घटोत्कच और अहिलावती को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम बर्बरीक रखा गया। ये वही बर्बरीक था जिसे कौरव और पांडव दोनों की सेनाएं हराने में असमर्थ थी, क्योंकि वह अजेय था।


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