मित्रता

मित्रता
दुनिया में अपने पदार्पण के बाद मनुष्य को संबंधों का एक जाल विरासत में मिलता है। जन्म से ही व्यक्ति अनगिनत रिश्तों की डोर से जुड़ा रहता है। कुछ रिश्ते मां के पक्ष से और कुछ रिश्ते पिता के पक्ष से हर व्यक्ति को स्वत: ही मिल जाते हैं। जब व्यक्ति का विवाह होता है तो इन रिश्तों में कुछ और लोग जुड़ जाते हैं। रिश्तों के अपने मायने भी होते हैं। इन्हीं रिश्तों की वजह से व्यक्ति सामाजिक प्राणी से रूप में परिवर्तित हो पाता है।


    सामाजिक बन्धन कहे जाने वाले रिश्तों में से एक ही रिश्ता ऐसा है जो हम अपनी आप निर्धारित करते हैं और वह है मित्रता वैसे तो मित्रता का अर्थ व्यापक होता है, जिन्हें आज के संकुचित विचारधारा के युवाओं का समझाना थोड़ा जटिल है। आज के परिपेक्ष में देखें तो जिस व्यक्ति से अपना स्वार्थ सिद्ध हो रहा होता है, हम उसे अपना मित्र कहने लगते हैं और जैसे मतलब निकल गया सामने वाला गया भाड़ में। अब इसे मित्रता का नाम देना वास्तव में मित्रता शब्द का अपमान करना ही तो है।


जब मित्रता की बात आती है तो हमारे मस्तिष्क में सबसे पहले एक चित्र स्वत:  बन जाता है। जिसमें श्रीकृष्ण और सुदामा जी एक साथ दिख जाते हैं। श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण सदैव इसलिए दिया जाता है क्योंकि उन दोनों में सामाजिक, आर्थिक और कई प्रकार की भिन्नता मौजूद थीं। परन्तु उनमें एक ऐसा अटूट बन्धन था जिसके कारण वे आपस में मजबूती से जुड़े हुए थे और वह बंधन था मित्रता का। इस मित्रता ने कभी अमीरी और गरीबी को नहीं देखा। न ही समाज द्वारा बनाए गए धर्म, जाति के ऊंच और नीच के बंधनों को अपने अन्दर व्याप्त होने दिया है। जब हम स्वार्थ के भावों से ऊपर उठकर अपनत्व के साथ मित्रता करते हैं तो सही अर्थों में वही मित्रता है। 

समय के साथ सभी चीजों में बदलाव होना स्वाभाविक है। परन्तु बदलाव इस तरह से हो जाए के हम मानव से पशुता की ओर अग्रसर होते जाए तो इस तरह के परिवर्तन से परहेज करना चाहिए। आज देखावे की दुनिया है। जिसमें हम सिर्फ अन्धी दौड़ लगाए जा रहे हैं। इस दौड़ में हमारा क्या होगा शायद हमें ही पता नहीं होता है। पर यदि इस दौड़ में हमारे साथ कोई सदैव के लिए बना रहे ताकि समय आने पर हम एक दूसरे का सहयोग कर सकें और जो समस्याएं आने वाली हैं या फिर आ चुकी हैं, उनसे निपट सकें तो इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता है। और यह साथ एक अच्छा मित्र ही दे सकता है।


गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-
धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी। आपद काल परखिए चारी।।
मित्रता पर न जाने कितनी फिल्में बन गयी हैं। आज भी हम किन्हीं दो प्रिय मित्रों को देखते हैं तो सहज ही कह देते हैं कि जय और बीरू आ गए। कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि मित्रता की परम्परा आज की नहीं है यह तो मानव सभ्यता के आरम्भ से जुड़ी है। द्वापर युग में कर्ण और सुयोधन की मित्रता को कौन नहीं जानता। कर्ण ने अपनी मित्रता धर्म का पालन करते हुए अपना प्राण भी बलिदान कर दिया। अर्जुन से मित्रता निभाते हुए भगवान कृष्ण ने सारे नियमों को तोड़ दिया।  त्रेता युग की बात करें तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने मर्यादा को तोड़ते हुए अपने मित्र सुग्रीव के लिए बालि का वध किया।  ऐसे अनेकानेक उदाहरण हैं जो मित्रता को वास्तव में परिभाषित करते हैं। पर समझने की बात यह है कि क्या हम इस शब्द की सार्थकता को कभी समझ सकते हैं?


आज के समय में जरूरत है श्रीकृष्ण और सुदामा की, जरूरत है कर्ण और सुयोधन की, यदि ये नहीं तो कम से कम जय और बीरू की तो जरूर है। जिसमें हम अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर अपने मित्रता धर्म का पालन करें। मित्रता को धर्म इसलिए कहा क्योंकि धर्म की परिभाषा है कि जो धारणीय है वही धर्म है। अर्थात जिन आचरणों को अवश्य ही धारण करना चाहिए वे सभी धर्म हैं तो उनमें मित्रता भी एक है। अत: इसे भी अवश्य ही धारण करना चाहिए।


अब ऐसी भी मित्रता नहीं होनी चाहिए कि सिर्फ एक व्यक्ति ही अपने मित्रता धर्म का पालन करे और दूसरा अपने मित्र का शोषण करे। यदि ऐसा है तो चापलूस और चटुकार मित्र से दूर हो जाना चाहिए। क्योंकि ऐसे व्यक्ति शत्रु से भी घातक होते हैं। इन्हेंं दीमक की तरह ही समझों, जो सबकुछ खोखला कर देते हैं। और फिर हजार लोगों की अपेक्षा कुछ मित्र ही बनाना उचित भी होता है जिससे हम अपनें मित्रों की अपेक्षाओं पर खरे उतर सकते हैं और मित्रता निभा  भी सकते हैं। 

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