ब्राह्मण का बेटा


                            ब्राह्मण का बेटा

         चन्द्रशेखर पाण्डेय जी बलिया (उत्तर प्रदेश) के छोटे से गांव में रामनगर में रहते हैं। चन्द्रशेखर जी धार्मिक और कर्मकांडी ब्राम्हण हैं। पुरखों से मिली दो एकड़ जमीन से तो जीवन यापन होना मुश्किल है, इसलिए पाण्डेय जी ने पुरोहित का काम करना चालू कर दिया। वे अकसर बताया करते हैं कि उनके दादा जी के पास सत्तर एकड़ जमीन हुआ करती थी, पर अपने उदार स्वभाव के कारण ज्यादातर जमीन जरूरत मंदों को दे दी। पाण्डेय जी के पिता जी हरिशंकर पाण्डेय जी को अपने पिता से ग्यारह एकड़ जमीन मिली पर पत्नी के इलाज में नौ एकड़ जमीन बिक गई और जो बची वो पाण्डेय जी को विरासत में मिली। खैर पाण्डेय जी को इस बात को तनिक भी मलाल नही है कि उनके दादा जी की उदार प्रवृत्ति के कारण उन्हें आज आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है बल्कि उन्हें तो इस बात का फक्र है कि दादा जी ने गरीबों की मदद की।
            अब दो एकड़ जमीन से क्या भला हो सकता है ये तो आप भी जानते है, इसीलिए पाण्डेय जी ने पुरोहित का काम करना शुरु कर दिया। महीने भर में दो तीन कथाएं और दो तीन ही हवन वगैरह कराकर पंद्रह सौ रूपए मिल जाते है। वेसे तो पाण्डेय जी अपने इस काम से संतुष्ट है क्यूंकि किसी तरीके से घर की खर्च चल ही जाता है। पर पाण्डेय जी अकसर चिंतित नजर आते हैं।
एक दिन सुबह अपने नित्य क्रियाओं के बाद पंडित जी शांत बैठे थे तो पडोस के एक युवक जयकिशन ने पंडित जी से पूंछ ही लिया-
जयकिशन- चाचा जी क्या बात है आप इतने शांत क्यूं बैठे हैं? क्या कोई बात है?
पंडित जी जयकिशन को अपने बेटे पुनीत की तरह ही प्यार करते थे और अपनी सभी बात उसी से साझा करते थे।
पाण्डेय जी – क्या बताऊं बेटा? हमारा तो जीवन किसी तरह कट ही गया और बची-कुची जिंदगी भी भगवान की कृपा से पार हो ही जाएगी। मुझे अब बस पुनीत के जीवन को लेकर चिंता है। में नही चाहता कि जिन अभावों में हमने अपना जीवन जिया है, वेसा ही हमारा पुनीत जिए।
जयकिशन- चाचा जी, पुनीत तो अभी दशवीं में ही है और आप अभी से चिंता करने लगे।
पाण्डेय जी­- बेटा, वक्त जाते देर नही लगता।
जयकिशन- हां वो तो है चाचा जी।
पाण्डेय जी­- तभी तो चिंता है बेटा, आज के समय नौकरी मिलना कितना मुस्किल हो गया है ये बात तो तुम भी जानते हो। अगर अभी से चिंता न की तो फिर और देर हो जाएगी बेटा। तुम खुद को ही देख लो, क्या कमी है तुममें एम. ए. पास हो और योग्य भी हो, पर सरकार की एक गलत नीति की वजह से तुम्हारी नौकरी न लग पायी जबकि गांव के ही कुछ बच्चे जो तुम्हारी तुलना में कुछ नहीं थे अच्छे पद पर हैं। इस आरक्षण के गलत तरीके के कारण उन्हें नौकरियां मिल जाती हैं जो उसके काबिल भी नहीं हैं। और जो काबिल हैं उन्हें दर-दर भटकना पड़ रहा है।
जयकिशन-  हम कर भी क्या सकते है, चाचा जी?
पाण्डेय जी­- हां वो तो है बेटा। पर ये समझ नहीं आता की क्या हम सवर्ण गरीब नहीं होते हैं। मैं आरक्षण को गलत नहीं मानता पर जिस आधार पर इसे दिया जा रहा है वह गलत है। इससे तो यही लगता है कि हमें और भी बुरे दिन देखने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
खैर जाने दो, तुम बताओ आगे क्या करना है
जयकिशन- चाचा जी मैं तो अब एक किराने की दुकान रखने की सोच रहा हूं और साथ में ही शाम को कोचिंग पढ़ाने लगूंगा तो कुछ आमदनी भी हो जाएगी।
पाण्डेय जी- हां ये सही विचार हैं, पर अपनी तैयारी करते रहना और हमारे पुनीत पर भी ध्यान देते रहना।
जयकिशन आपने रास्ते आगे चला जाता है। और पाण्डेय जी अपने अन्य कामों में व्यस्त हो जाते हैं।
समय का पहिया घूमता रहता है और कब दो साल गुजर जाते है पता भी नही चलता है। अब पुनीत बारहवीं में पढ़ रहा है। पर चिंता की लकीरें पाण्डेय जी के माथे पर और गहरी होती जा रही हैं। अपने मित्रों में सबसे अधिक योग्य पुनीत ही है। जब भी कोई बात करता है तो ये जरूर कहता है कि बारहवीं के बाद तो पुनीत की नौकरी लगना तय ही है। खैर परीक्षा का समय आ ही गया। पुनीत की अच्छी तैयारी थी, इसलिए उसने सभी प्रश्न पत्रों को अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन कर हल लिखा। परीक्षाओं के दो माह बाद ही परिणाम आने वाला था। पुनीत से कहीं अधिक चिंता तो पंडित जी के चेहरे में स्पष्ट देखी जा सकती थीं, और हों भी क्यों न, एक पिता अपने अधूरे सपनों को अपने पुत्र के माध्य़म से साकार होते हुए देखना चाहता है।
       आज सुबह से ही पंडित जी के दिल में अजीब हलचल हो रही थी। एक जगह बैठा भी नहीं जा रहा था। कहीं यहां तो कहीं वहां टहल रहे थे। पुनीत ने अपने पिता जी से उनकी बेचैनी का कारण जानना चाहा तो उन्होंने कुछ जवाब न देकर सिर्फ सिर हिला दिया। पर पुनीत जानता था कि आज उसका बाहरवीं का परिणाम आने वाला है, इसलिए पिता जी चिंतित हैं।

           दोपहर के बारह बज गए थे। उत्तर प्रदेश बोर्ड ने परिणाम जारी कर दिए थे। पुनीत ने पास के इंटरनेट कैफे में जाकर अपना परिणाम देखा और सीधे अपने पिता जी के पास दौढ़ता हुआ आया।
पुनीत को तेजी से अपनी ओर आते देखकर पंडित जी विश्मय में थे कि आखिर क्या हुआ है। पुनीत सीधे आकर अपने पिता जी के पैरों को छूता है।
पंडित जी- क्या हुआ पुनीत?
पुनीत- पिता जी, मैं पास हो गया।
पंडित जी- वो तो ठीक है पर ये बता कि परशेंटेज कितने बनें?
पुनीत- पिता जी 85 बनें हैं।
पंडित जी के मुख से कुछ नहीं निकला बस पुनीत को अपने सीने से चिपका लिया। पंडित जी के चेहरे पर प्रसंनता थी और आंखों में नमी। अपने रुंधे हुए गले से पंडित जी अपने बेटे को 'बहुत
अच्छे बेटा' कहना चाह रहे थे पर आवाज उनके गले में ही रुक गयी थी। करीब दो मिनट तक पिता-पुत्र में कोई संवाद संभाव न हो सका दोनों एक दूसरे के सीने में सिमटे खड़े रहे। तभी पीछे से
आवाज आई "चाचा जी मिठाई मंगवाइए, पुनीत ने पूरे गांव में सभी से अच्छे नम्बर पाए हैं।"  पंडित जी ने पलट कर देखा तो जयकिशन था। हांथ में पुनीत के रिजर्ट का पिंट आउट लिए पंडित
जी की तरफ ही आ रहा था। पुनीत ने जाकर जयकिशन का आशिर्वाद लिया। पंडित जी की खुशी का ठिकाना न था। उन्होंने जयकिशन को अपने गले से लगा लिया और बोले-
"आज बहुत दिनों के बाद दिल के इतनी खुशी मिली है, बेटा।"
                                                                              ...क्रमश:

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