शर्म की बात

                        शर्म की बात
                       दुनिया का इतिहास जिस किसी को भी याद हो, उससे आप एक बात जरूर पूछिएगा कि पूरी दुनिया में जितने भी देश आज संपन्नता की श्रेणी में अग्र भाग पर आते हैं, उनके विकास का समय काल कितना रहा है। मुझे नहीं लगता कि किसी का भी जवाब चार, पांच, या फिर छ:  दशक के अलावा कुछ और होगा। इतनें ही समय में दुनिया के दिग्गज देशों ने अपने आपको इस स्थिति में ला खड़ा किया है कि मुझे दिग्गज शब्द का उपयोग करना पड़ रहा है।

आपके मन में यह विचार तो आ ही रहा होगा कि शीर्षक के आधार पर तो विषय का मेल नहीं हो पा रहा है। परेशान मत होइए यह कार्य मेरा है जो मैं अच्छे से करना जानता हूं।

संसार के सभी प्रभुत्व संपन्न देशों की एक लिस्ट बनाइए और देखिए कि उन देशों के नागरिकों और वहां कि सरकार ने अपने देश को शिखर पर लाने के लिए कितनी मेहनत की है। यहां पर मैंने नागरिकों का जिक्र पहले किया है। उसके बाद सरकार की बात की है। नागरिकों की बात इसलिए की है क्योंकि नागरिक ही सरकार बनाते हैं और सरकार में बनने वाले मंत्री हमारे बीच से निकल कर ही जाते हैं न कि किसी अन्य ग्रह से आते हैं। आजादी के बाद से लेकर हमारे नागरिकों में एक बात अच्छे से देखी जा सकती है और वह है हरामखोरी। जी हां आपने सही पढ़ा हरामखोरी ही लिखा है मैंने। शब्द पर मत जाए सिर्फ शब्द के अर्थ को समझें। भारत के किसी भी विभाग में बैठा व्यक्ति हो या फिर स्वयं को मासूम और दबा कुचला कहने वाला व्यक्ति ही क्यों न हो सब के दिल में एक ही बात घुसी रहती है कि बिना मेहनत के मैं अमीर बन जाऊं। अब बात करता हूं हरामखोरी की तो जो व्यक्ति अपने काम को पूरी निष्ठा से नही कर रहा है वह हरामखोर ही तो है। मास्टर साहब बच्चों को पढ़ाना नही चाहते, डाक्टर साहब को प्राइवेट प्रेक्टिस की चिंता है, क्लर्क बाबू एक फाइल में पूरी नौकरी निकाल देना चाहते हैं, सफाई कर्मी सप्ताह में एक दिन आ कर हाजिरी पूरी कर लेता है, आदि-आदि इत्यादि उदाहरण हैं जो आप सभी अच्छे से जानते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है समय का महत्व। आप किसी भी कार्यालय में जाएं, खासकर सरकारी कार्यालय, तो जिनसे आपका काम है श्रीमान मोबाइल में गेम खेल रहे होंगे पर आपसे कहेंगे कि एक घण्टे बाद आइए। खुद तो सरकार के पैसों की आसाराम  कर ही रहे हैं आपके समय को भी रामरहीम कर देगें।
इन सबसे महान तो हमारी भोली-भाली जनता है जो खुद को मासूम कहती है। अपना भाई, बहन, या फिर बेटा पुलिस में हो तो सीना चौड़ा करके कहते हैं कि दिन के तीन-चार हजार तो कमा ही लेता है हमारा सपूत। और जब स्वयं को देने पड़ जाएं तो देश में बड़ा भ्रष्टाचार है, इस देश का कुछ नहीं हो सकता है। मास्टर साहब स्कूल के छ: घण्टे में बच्चों को कितना पढ़ाते हैं यह तो प्रभू ही जानें पर जब अपनी औलाद फेल होती है तो कहते हैं कि देश का एजूकेशन सिस्टम सही नहीं है।

ये सब तो बानगी मात्र हैं वास्तविकता तो इससे भी अधिक घातक है। क्योंकि हरामखोरी की हद ही नहीं है। पर एक बात में हमारे देश के नागरिक बहुत सही हैं, दूसरों को कोसने में। सभी केजरीवाल की तरह ही हैं, हम श़रीफ, जवाना बेईमान। जब सभी श़रीफ हैं तो ये बेईमानी का शब्द ही हटा दो या फिर ये कहो कि बेईमानों में हम भी हैं। क्योंकि इन्हीं यानी हम और आपसे मिलकर ही तो देश बना है और सरकार भी बनी है। जब नागरिक ही हरामखोरी के मर्ज से पीड़ित हों तो यह कैसे संभव है कि सरकार साफ-सुथरी हो। ये तो मूर्खता होगी, म़ाफ कीजिए महामूर्खता होगी।
यदि हम यानी कि हर एक व्यक्ति  सिर्फ एक काम बन्द कर दे यानी कि हरामखोरी बन्द कर दे तो कुछ ही समय में भारत भी इस महामारी से स्वच्छ हो जाएगा।
आजादी के सात दशकों के बाद भी हम अगर अन्दर से जागते हैं तो अधिक समय नहीं लगेगा जब दुनिया में हमारे जैसा कोई देश नहीं होगा। वैसे तो आज भी हमारे जैसा देश कोई नहीं है पर मैं बात कर रहा हूं कलाम के भारत की, गांधी के भारत की ( राहुल नही भाई, महात्मा गांधी), उस भारत की जिसके लिए अनेकों माताओं ने अपने बच्चों की कुर्बानी दी, मैं बात कर रहा हूं उस भारत की जहां हम किसी पर निर्भर नहीं हों बल्कि दुनिया हम पर निर्भर हो।
और यह सब बड़ी-बड़ी हवाई बातों से नहीं होगा बल्कि हमारे द्वारा उठाए गए एक कदम से होगा। एक कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है। पर वही चना चाहे तो अपने जैसे हजार चनें पैदा कर सकता है जो मिलकर भाड़ फोड़ सकते हैं।

अगर आपको मेरी बात सही लगी हो तो प्रतिक्रिया अवश्य दें। क्योंकि ये ज्ञान नही यथार्थ है।  

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