जीत के मायने

जीत के मायने
पिछले कुछ दिनों से चुनाव की गर्मी जारी थी, जो जीत और हार के परिणाम के साथ रुक भी गई। चुनाव चाहे गुजरात का रहा हो या फिर हिमांचल का सभी में एक बात स्पष्ट थी, कि जीत की चाह में राजनीति के नाम पर जो निर्रथक मुद्दे खड़े किए जा सकते हैं, वे सब आम जनता की समझ से परे थे। जीत और हार के साथ ही सभी मुद्दे कहां गुम हो जाते हैं ये बात शायद ही कोई भारतीय नागरिक हो, जो न जानता हो। क्योंकि जीतने के लिए जिस तरह की राजनीति का खेल आज के समय खेला जा रहा मुझे नही लगता कि यह राजनीति हो सकती है। आज राजनीति को युद्ध की तरह ही देखा जा रहा है जिसमें जीत आवश्यक है न कि यह कि किस तरह से जीत मिली। शायद यही वजह भी है कि राजनेताओं का सामाजिक और नैतिक पतन सर्वाधिक हो रहा है। पर उन्हें इसकी परवाह ही कहां है, उन्हें तो आर्थिक उत्थान की चिंता है।
 जब चुनाव का समय करीब आ जाता है तो सबसे अधिक आशा नागरिकों के दिल में जागती है कि शायद अब हमारी समस्याओं के समाधान का समय करीब आ गया है। क्योंकि जिस तरह से पक्ष-विपक्ष के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियां जन समस्याओं की बात करती है शायद भारत के इतिहास में कभी भी इस तरह से मुद्दे न उठाए गए हों। जनता के मन में एक आशा कि किरण भी जगने लगी है कि शायद अब कुछ भला होगा पर परिणाम क्या होता है यह आप और हम सभी जानते हैं। लोकतंत्र का पर्व कहे जाने वाले चुनाव की हार-जीत सिर्फ राजनीतिक पार्टियों की होती है, जनता की तो सिर्फ हार ही होती है। जीत का सेहरा चाहे किसी के भी सिर पर बंधे लेकिन जनता जनार्दन कही जाने वाली जनता को फिर से जनार्दन के सहारे छोंङ दिया जाता है। जो पहले स्वयं को जनसेवक कहकर वोट के लिए हाथ जोड़े खड़े रहते थे अब वही जनता को अपना सेवक समझने लगते हैं। पर दुर्भाग्य ये नही है कि ऐसा क्यूं होता है बल्कि इसलिए होता है कि वोटर भी अपनी सही राह से भटक चुका है। उसे दारू, मुर्गा, पैसा चाहिए भले ही बाद में उसे ही मुर्गा बनना पड़े। जातिवाद का असली खेल तो चुनाव में ही देखने को मिल जाता है। जो नेता जातिवाद के विरोध के प्रबल दावे करते फिरते रहते हैं वही जाति की दुहाई देकर वोट मांगते नजर आते हैं। गणितज्ञ भी सबसे पहले जाति वाली गणित लगाते नजर आने लगते हैं। मीडिया की तो बाद ही करना व्यर्थ है, उसे तो सिर्फ अपनी रोटियां सेंकने से मतलब आग चाहे किसी के घर पर लगी हो।  
    राहुल का अध्यक्ष बनना हो या फिर गुजरात में एकबार फिर से भाजपा का सत्ता में आना हो, इन सभी बातों से ऊपर एक बात यह होनी चाहिए कि जिस क्षेत्र में हम चुनाव की बात कर रहें हैं वहां पर पहले की तुलना में आज कितना विकास हुआ है। और विकास के मायने कारखाने तो बिल्कुल भी नही होने चाहिए बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि उस स्थान विशेष के लोगों तक कितनी सुविधाएं पहुंची हैं और उनका उपयोग  लोग किस हद तक कर पा रहे हैं। अगर इस मानक के आधार पर चुनाव में जीत हार का निर्धारण किया जाए तो सही मायने में आम जनता की ही जीत होगी नही तो हर बार की तरह इस बार और हर बार जीत सिर्फ औऱ सिर्फ नेताओं की होगी और हार जनता के हिस्से में आनी तय है।

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