बलात्कार: अपराध या मानसिकता
बलात्कार: अपराध या मानसिकता
दुनियां में होने वाले अपराधों में सबसे घृणित और वहशी अपराधों की
श्रेणी में आने वाला अपराध बलात्कार को ही माना जाता है। किसी की अस्मिता को
तार-तार करना वह भी मात्र अपनी वासना की छुधा को शान्त करने के लिए, इससे अधिक जघन्य
अपराध कोई नहीं हो सकता है। इस अपराध के पीछे अपराध करने वाले की मानसिकता का
प्रभाव होता है, जिसके कारण वह इस तरह के भयानक अपराध को करने से पहले और बाद में
आने वाले परिणाम के बारे में भी नहीं सोचता है।
अपराध के कारण
शिक्षा: इस तरह के अपराध के कारणों का निश्चित विश्लेषण
करना शायद ही संभव हो सकता है, क्योंकि हर घटना की अपनी परिस्थिति होती है। जरूरी
नहीं कि जिस परिस्थिति में एक घटना घटित हुई हो वही परिस्थिति दूसरी घटना के लिए
भी हो। परन्तु एक ऐसी चीज है जो सदैव समान ही रहेगी और वह है मानसिकता।
हमारे समाज में अपराध की प्रवृत्ति बड़ती जा रही है। पहले ये तर्क
दिया जाता था कि जो क्षेत्र अशिक्षित हैं वहीं पर ऐसी घटनाएं होती हैं। परन्तु आज
के समय जो अधिक शिक्षित हैं वही ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहें हैं, तो मात्र शिक्षा
को इसका कारण मानना गलत होगा। हां, यह
जरूर है कि यदि व्यक्ति शिक्षित (सिर्फ डिग्री धारी नही) है तो वह इस तरह के
अनैतिक अपराधों को करने से पहले सोचेगा।
कानून: भारत के लचर कानून की वजह से कई बार दोषियों को
इतना समय मिल जाता है जिसमें वे सबूतों को आसानी से मिटा सकें, जिसके कारण उन्हें
सही सजा भी नहीं मिल पाती है। एक ओर जहां दोषी स्वतंत्र हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर
निर्दोंषों को पकड़कर जबरन जुर्म काबूल करने का दबाव भी बनाया जाता है।
समाज: हम जिस
समाज में रहते हैं, उसका सीधा असर हमारे जीवन में भी पड़ता है। पुरुषवादी समाज में
लड़कियों पर तो कई तरह के प्रतिबंध लगे हैं पर लड़कों के लिए कोई प्रतिबंध नहीं
हैं। लड़कियां रात में कहीं भी आ-जा नहीं सकती हैं परन्तु लड़के रात 12 बजे तक
कहां रहते हैं इसका पता माता-पिता नहीं रखना चाहते हैं। हमारे समाज का दोमुहा रूप
स्पष्ट देखने को मिल जाता है। यदि यही लगाम जो लड़कियों पर लगाई जाती हैं, लड़कों
पर लगा दी जाए तो आधी समस्या का हल स्वत: ही हो जाएगा।
सभ्यता से भटकाव: हम अपनी सभ्यता से भटकते जा रहे हैं। जिस
देश में नारी को शक्ति माना जाता है, वहां अब नारी एक वस्तु की तरह होती जा रही
है। हम अपनी परम्पराओं से विमुख हो रहे हैं। पाश्चात्य संस्कृति ने हमें अपने में
जकड़ना आरम्भ कर दिया है, जहां पर स्त्री और पुरुष के बीच में संबंध कभी भी
परिभाषित नहीं रहते हैं। शारीरिक संतुष्टि ही सर्वे-सर्वा रहती है। उसी की नकल
करते हुए हम अपनी मर्यादाओं का हनन कर देते हैं और बलात्कार जैसा जघन्य अपराध कर
देते हैं।
अभद्र पहनावा, अश्लील दृष्य, अश्लील साहित्य, और कामुकता का बजारीकरण
इन सबके पीछे का प्रमुख कारण है। आज बाजार में कामुकता को इस तरह से बेंचा जा रहा
है जैसे यह कोई वस्तु हों। यही कामुकता ही मानसिकता को बदल देती हैं और साधारण सा
दिखने वाला व्यक्ति बलात्कार जैसे काण्ड कर देता है।
नैतिकता: हमारी सामाजिक नैतिकता
कब समाप्त हो गयी हमें पता भी नहीं चला है। हमारे कृत्यों का हम पर और हमारे
परिवेश पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह तो कोई सोचता भी नहीं है। हमारे घर में भी स्त्री
औऱ पुरुष माता-पिता, भाई-बहन, बुआ-फूफा,
मौसी-मौसा आदि कई रिस्तों में रहते हैं। परन्तु हम कभी भी यह नही सोचते कि हमारे
इस शर्मनाक कृत्य का असर इन पर क्या पड़ेगा। अपराधी व्यक्ति इतना अंधा हो जाता है
कि उसे कुछ समझ में ही नही आता है, बस वह अपराध की मानसिकता से ग्रस्त होकर अपराध
करता है।
पथ-भ्रष्टता: आज के समय में
स्त्री और पुरुष के मध्य के संबंध को कैसे परिभाषित किया जाए समझ में ही नही आता
है। नित नए रिस्ते विकसित हो रहें हैं। पहले महिला मित्र और पुरुष मित्र के नाग ने
हमारे समाज को डसा और अब लिब-इन-रिलेशन रूपी अजगर हमारी मर्यादा को निगलने में लगा
है। इस पर भी लोगों के अपने तर्क हो सकते हैं पर मेरा यही मानना है कि बलात्कार की
मानसिकता का बीजारोपण इन्ही कारणों से होता है। ये मानसिकता हमें इतना कुंठित कर
देती है कि व्यक्ति किसी की मर्जी के खिलाफ जा कर वह कर देता है जो उसे नहीं करना
चाहिए।
कुछ मामलों में यह बात दबी रहती है और यदि कोई जान जाता है तो उसे बलात्कार
का रूप दे दिया जाता है।
कई घटनाएं ऐसी ही हैं जिनमें पीड़ित और आरोपी के मध्य प्रेम संबंध पाए
गए और किसी बात को लेकर हुई अनबन को बलात्कार का नाम दे दिया गया। ख़ैर यह बात अलग
है।
मेरे कहने का एकमात्र तात्पर्य यही है कि यदि हमें समाज से बलात्कार जैसी घटना को कम
करना है या फिर समाप्त करना है तो पहले बलात्कारी मानसिकता को जड़ से समाप्त करना
होगा। क्योंकि इसी मानसिकता की वजह से ही दिन प्रतिदिन इस तरह की घटनाएं बड़ती जा
रही हैँ।
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