कार्य के प्रति समर्पण जरूरी है : विजय अग्रवाल
दिनांक 28 जुलाई 2017 को माखनलाल विश्वविद्यालय के नवें सत्रारम्भ कार्यक्रम में विद्यार्थियों को समय प्रबंधन विषय पर बोलते हुए विजय अग्रवाल जी ने कहा कि प्रकृति और जीवन के मध्य एक द्वंद दिखता है, जिसमें आपका मन ही नियंत्रक की भूमिका निभाता है। किसी भी कार्य के समय से पूर्ण न होने पर हम दूसरों पर दोष देते हैं। समय का प्रबंधन करना आपका दायित्व है लेकिन यदि ऐसा नही कर पा रहे हैं समझो की आपको उस काम में रुचि नही है।
समय दिखता नही है सिर्फ इसे एहसास किया जाता है। यदि इस एहसास को समझ सकते हैं तो समय को माप सकते हैं।
हम सभी कीमती वस्तुओं को सम्भाल कर रखते हैं, उसी तरह समय भी है जिसका सही उपयोग करना चाहिए।
समय को ईश्वर से जोड़कर कहा कि ईश्वर को समदर्शी कहा जाता है क्योंकि ईश्वर ने अमीर और गरीब सभी को समान समय दिया है। जिसका उपयोग करना आपके हाथ में है।
नवागत विद्यार्थों को सम्बोधित करते हुए कहा कि समय का विश्लेषण करना सम्भव नही है। महाकाल को परिभाषित करते हुए कहा कि जो समय से परेय है वही महाकाल है। समय सबसे महत्वपूर्ण है। व्यक्ति साधन, धन और बल से कमजोर हो सकता है लेकिन समय से कमजोर नही होता है। जो लोग समय को व्यर्थ गवांते हैं, बरबाद हो जाते हैं। जो लोग समय का सदुपयोग करते हैं उन्हें ही ख्याति मिलती है।
हम समय को प्रबंधित नही कर सकते लेकिन अगर अपने को प्रबंधित कर लें तो समय स्वत: प्रबंधित हो जाता है। अपने आधार पर समय को देखें, अगर समय कहीं नष्ट हो रहा है तो समझो कि उस काम में आपका मन नही लग रहा है।
आप जहां हैं, वहां हैं के आधार पर कार्य करें। जो भी काम करें तत्परता से करें।
समय के मापन की बात करते हुए कहा कि सभी लोगों के पास घड़ी होती है जो उस व्यक्ति की मनोवैग्यानिक स्थिति के आधार पर सेट रहती है। समय हम जबरजस्ती अपने नियंत्रण में रखता है। जो कार्य करने में हमारा मन लगता है उसे करने में समय कब गुजर जाता है हमे पता भी नही चलता है पर जिस कार्य में हमारी रुचि नही होती उसका एक एक सेकण्ड भारी लगता है।
आपके अन्दर वह तत्व है जो समय का प्रबंधन कर सकता है। आप जो करना चाहते हैं और कोई अन्य विकल्प भी नही होता है तो हम समय का प्रबंधन अच्छे से कर लेते हैं। इसके साथ जो काम करें अपनी पसंद से करें। पूरी निष्ठा से करें। कलाम जी की पुस्तक अग्नि की उडान की बात की जिसमें कलाम जी ने कहा है कि वह अपनी प्रयोगशाला में जब भी प्रवेश करते थे, अपने जूते बाहर उतार देते थे। इस उदाहरण से यह स्पष्ट किया कि अपने कार्य के प्रति समर्पण और पूरी निष्ठा से हम समय का प्रबंधन सरलता से कर सकते है।
हम जो कार्य करते हैं, उसे कैसे करना है हमें यह स्पष्ट होना चाहिए। बड़े काम आपको बड़ा नही बनाते बल्कि छोटे काम को दक्षता से करें तो हम बड़े बन सकते हैं।
अन्त में कहा कि ग्यान को कर्म में बदलनें की विशेष जरूरत होती है। क्योकि यदि आपने कोई कार्य नही किया तो आपका ग्यान बेकार है।
काम कोई भी करे लेकिन समर्पण के साथ करें। अगर समर्पण से काम करते हैं तो समय का प्रबंधन अपने आप हो जाएगा।
दिनांक 28 जुलाई 2017 को माखनलाल विश्वविद्यालय के नवें सत्रारम्भ कार्यक्रम में विद्यार्थियों को समय प्रबंधन विषय पर बोलते हुए विजय अग्रवाल जी ने कहा कि प्रकृति और जीवन के मध्य एक द्वंद दिखता है, जिसमें आपका मन ही नियंत्रक की भूमिका निभाता है। किसी भी कार्य के समय से पूर्ण न होने पर हम दूसरों पर दोष देते हैं। समय का प्रबंधन करना आपका दायित्व है लेकिन यदि ऐसा नही कर पा रहे हैं समझो की आपको उस काम में रुचि नही है।
समय दिखता नही है सिर्फ इसे एहसास किया जाता है। यदि इस एहसास को समझ सकते हैं तो समय को माप सकते हैं।
हम सभी कीमती वस्तुओं को सम्भाल कर रखते हैं, उसी तरह समय भी है जिसका सही उपयोग करना चाहिए।
समय को ईश्वर से जोड़कर कहा कि ईश्वर को समदर्शी कहा जाता है क्योंकि ईश्वर ने अमीर और गरीब सभी को समान समय दिया है। जिसका उपयोग करना आपके हाथ में है।
नवागत विद्यार्थों को सम्बोधित करते हुए कहा कि समय का विश्लेषण करना सम्भव नही है। महाकाल को परिभाषित करते हुए कहा कि जो समय से परेय है वही महाकाल है। समय सबसे महत्वपूर्ण है। व्यक्ति साधन, धन और बल से कमजोर हो सकता है लेकिन समय से कमजोर नही होता है। जो लोग समय को व्यर्थ गवांते हैं, बरबाद हो जाते हैं। जो लोग समय का सदुपयोग करते हैं उन्हें ही ख्याति मिलती है।
हम समय को प्रबंधित नही कर सकते लेकिन अगर अपने को प्रबंधित कर लें तो समय स्वत: प्रबंधित हो जाता है। अपने आधार पर समय को देखें, अगर समय कहीं नष्ट हो रहा है तो समझो कि उस काम में आपका मन नही लग रहा है।
आप जहां हैं, वहां हैं के आधार पर कार्य करें। जो भी काम करें तत्परता से करें।
समय के मापन की बात करते हुए कहा कि सभी लोगों के पास घड़ी होती है जो उस व्यक्ति की मनोवैग्यानिक स्थिति के आधार पर सेट रहती है। समय हम जबरजस्ती अपने नियंत्रण में रखता है। जो कार्य करने में हमारा मन लगता है उसे करने में समय कब गुजर जाता है हमे पता भी नही चलता है पर जिस कार्य में हमारी रुचि नही होती उसका एक एक सेकण्ड भारी लगता है।
आपके अन्दर वह तत्व है जो समय का प्रबंधन कर सकता है। आप जो करना चाहते हैं और कोई अन्य विकल्प भी नही होता है तो हम समय का प्रबंधन अच्छे से कर लेते हैं। इसके साथ जो काम करें अपनी पसंद से करें। पूरी निष्ठा से करें। कलाम जी की पुस्तक अग्नि की उडान की बात की जिसमें कलाम जी ने कहा है कि वह अपनी प्रयोगशाला में जब भी प्रवेश करते थे, अपने जूते बाहर उतार देते थे। इस उदाहरण से यह स्पष्ट किया कि अपने कार्य के प्रति समर्पण और पूरी निष्ठा से हम समय का प्रबंधन सरलता से कर सकते है।
हम जो कार्य करते हैं, उसे कैसे करना है हमें यह स्पष्ट होना चाहिए। बड़े काम आपको बड़ा नही बनाते बल्कि छोटे काम को दक्षता से करें तो हम बड़े बन सकते हैं।
अन्त में कहा कि ग्यान को कर्म में बदलनें की विशेष जरूरत होती है। क्योकि यदि आपने कोई कार्य नही किया तो आपका ग्यान बेकार है।
काम कोई भी करे लेकिन समर्पण के साथ करें। अगर समर्पण से काम करते हैं तो समय का प्रबंधन अपने आप हो जाएगा।
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