ब्राह्मण धर्म
(क) धर्मार्थ कर्म- अब यहाँ पर यह प्रश्न उत्पन्न हो सकता हैं कि अच्छा, ब्राह्मण जाति का यही सामान्य स्वरूप रहे। परन्तु उसमें उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ भाव किस प्रकार से हुआ और हो रहा हैं? क्या लोगों की यह धारणा कि अमुक विप्र उत्तम हैं और अमुक मध्यम इत्यादि, मिथ्या ही हैं? इस प्रश्न के हल करने का सबसे उत्तम उपाय यही हैं कि ब्राह्मणों के स्वरूप का विचार, उनके आचार-व्यवहारों की देखभाल और उनके धर्मों के विषय में शास्त्रों की आज्ञाओं का परिशीलन (मीमांसा पर विचार) कर लिया जाये कि याज्ञवल्क्यादि महर्षियों के समय से आज तक वे लोग किस मार्ग का अवलम्बन करने से कैसे माने गये हैं। उन्होंने धर्म और जीविका चलाने के लिए किन-किन कर्मों का आश्रय लिया हैं, उनमें से किसे उत्तम, मध्यम अथवा हीन समझा हैं और भविष्य के लिए कौन से शिक्षा रूप बीज बोये हैं। क्योंकि शिष्टों (श्रेष्ठ पुरुषों) के आचार भी प्रमाण माने जाते हैं। अतएव पूर्व मीमांसा दर्शन के प्रथमाध्याय के तृतीय पाद के अष्टन् अधिकरण में ‘अनुमानव्यवस्थानात्तात्संयुक्तं प्रमाण स्यात्’॥ 15॥ इत्यादि सूत्रों द्वारा होलिकादि शिष्टाचारों को प्रमाण मानकर उनके विषय में विशेष विचार किया गया हैं और उसी पाद के 5वें अधिकरण में दाक्षिणात्य ब्राह्मणों में प्रचलित शिष्टाचार के अनुसार मामा की कन्या के साथ के विवाह को लोग उचित न समझ लें, इसके लिए :
मातुलस्य सुतामूढ्वा मातृगोत्रां तथैव च।
समान प्रवरां चैव त्यक्त्या चान्द्रायणं चरेत्॥
अर्थात्! मामा की लड़की, माता के गोत्र की लड़की और अपने गोत्र वाली लड़की से भूलकर ब्याह लेने पर भी उसे छोड़कर चन्द्रायण व्रत करें’, इस स्मृति वचन के विरुद्ध होने से उस आचार को उन्होंने अप्रामाणिक ठहराया हैं। परन्तु आजकल तो इतनी प्रबल मूर्खता हो गयी हैं कि अज्ञानवश अथवा तृष्णादि में पड़कर प्राय: सभी ब्राह्मण एवं अन्य जातियाँ अपने और माता के गोत्र में विवाह करने में नहीं हिचकतीं।
अस्तु, अब देखना चाहिए कि श्रुति तथा मनु आदि महर्षियों की आज्ञाएँ ब्राह्मणों के प्रति धार्मिक विषयों में-विशेषकर जीविका और धर्म के लिए किये जाने वाले कर्मों के विषय में कैसी हैं। इस जगह इतना और भी स्मरण रखना होगा कि सभी धर्म अनापत्कालिक (जो किसी दबाव य मजबूरी के किये जा सकें) और आपत्कालिक (जो तकलीफ-दबाव पड़ने पर हार कर किये जाये) इन दो प्रकार के हैं। इससे विषय के विवेचन (निर्णय) में आसानी होगी।
छान्दोग्योपनिषत् के द्वितीय प्रपाठक के 23वें खण्ड में लिखा हैं कि :
त्रयोधर्मस्कन्धा यज्ञो ध्यायनं दानध्मिति प्रथम:।
जिसका भाव यह हैं कि नित्य नैमित्तिकादि धर्म रूप वृक्ष की तीन बड़ी-बड़ी शाखाएँ, जिनमें पहली शाखा यज्ञ, वेद और शास्त्रों का पढ़ना और दान रूप हैं।’ इन्हीं में सन्ध्या और अग्निहोत्र वगैरह भी आ गये, क्योंकि अग्निहोत्र यज्ञ का स्वरूप ही हैं और गायत्री का जप भी उससे बाहर नहीं हैं। जैसा कि गीता में भगवान् श्रीकृष्णजी ने कहा हैं :
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथा परे। (अ. 4/28)
भावार्थ यह हैं कि ‘कोई द्रव्यों (काष्ठ, घृत आदि) से यज्ञ करते, कोई गायत्री जप एवं व्रतादि रूप जो तप कहलाते हैं उन्हीं यज्ञों को करते और कोई समाधि रूप ही यज्ञ करते हैं।’ यदि अध्यायन को भी यज्ञ में मिला ले तो कोई हानि नहीं हैं, परन्तु पढ़ने का फल यज्ञ हैं इसलिए उसे श्रुतियों और स्मृतियों में यज्ञ से पृथक् ही गिनाया हैं। मनुस्मृति में जो लिखा हैं कि :
अध्यापनमध्यायनं याजनं यजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्रजन्मन:॥ 10। 75
अर्थात् ‘पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान और प्रतिग्रह ये छह कर्म ब्राह्मणों के हैं’। उसका भी यही आशय हैं कि अध्यायन (पढ़ना), दान और यज्ञ करना यही तीन कर्म धर्म के लिए हैं, शेष तीन तो जीविका के लिए हैं। परन्तु जगदुत्पत्ति प्रकरण प्रथम अध्याय में इन छह कर्मों की उत्पत्ति के साथ ही कही गयी हैं। इसलिए यहाँ भी सभी का नाम प्राय: उसी उत्पत्ति प्रकरण के श्लोक द्वारा लिया हैं। वास्तव में तो यह प्रकरण (मनुस्मृति का दसवाँ अध्याय) उन कर्मों का हैं जो आपत्काल में जीविका के लिए किये जा सकते हैं। इसीलिए अगले श्लोक में लिख दिया हैं :
षण्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका।
याजनाध्यापने चैव विशुध्दाच्चप्रतिग्रह:॥ म.। 10। 76
अर्थात् ‘पूर्वोक्त छह कर्मों में से यज्ञ कराना, पढ़ाना और शुद्ध जनों का प्रतिग्रह करना ये कर्म तो जीविका के लिए हैं। परन्तु यदि इन्हीं तीनों को यहाँ लिखने और पढ़ने, यज्ञ करने और दान को छोड़ देते तो जैसा कि लोग फिर भी आज समझने लग गये हैं; समझने लग जाते कि आपत्ति काल में पढ़ने, यज्ञ करने और दान देने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। क्योंकि मनुस्मृति में उसकी आज्ञा नहीं हैं। इसलिए मनु भगवान् ने इन तीनों को भी साथ ही लिख दिया हैं। अत्रिजी भी लिखते हैं कि :
कर्म विप्रस्य यजनं दानमध्यायनं तप:।
प्रतिग्रहो धयापनं च याजनं चेति वृत्ताय:॥ 13॥
तात्पर्य यह हैं कि ‘ब्राह्मण के कर्म (धर्म) तो यज्ञ, दान और अध्यायन ये तीन ही हैं, प्रतिग्रह, पढ़ाना और यज्ञ कराना ये तीन तो जीविकाएँ हैं। ब्राह्मण के धार्मर्थक कर्म यज्ञ, अध्यायन और दान तीन ही हैं। गीता में भी लिखा हैं कि :
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ 18॥ 42
अर्थ यह हैं कि ‘मन और इन्द्रियों का विषयों से रोकना, तपस्या, आभ्यन्तर और बाह्य शौच, क्षमा, नम्रता, शास्त्र-ज्ञान और अनुभव रूप (साक्षात्कार रूप) ज्ञान ब्राह्मणों के स्वाभाविक धर्म हैं। इनमें याजन अथवा अध्यापन के तो नाम भी नहीं हैं। पराशर स्मृति के प्रथमाध्याय में भी लिखा हैं कि :
संध्या स्नानं जपो होमो देवतानां च पूजनम्।
आतिथ्यं वैश्वदेवं च षट्कर्माणि दिने दिने॥ 39॥
अर्थात् ‘रात और दिन की सन्धि समय में स्नान, गायत्री को जप, अग्निहोत्र, शिवविष्ण्वादि देवों का पूजन, यथाशक्ति, अतिथि का सत्कार और बलिवैश्यदेव ये छह कर्म ब्राह्मणों को नित्य करने चाहिए। मनुजी अन्त में भी 12वें अध्याय में लिखते हैं :
यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्ताम:।
वेदाभ्यासे शमे च, स्यादात्मज्ञाने च यत्नवान्॥ 92॥
जिसका भाव यह हैं कि ब्राह्मणों के लिए जो बहुत से कर्म बतलाये गये हैं उनका त्याग भी करके वे वेदाभ्यास, चित्तनिरोधा (समाधि) आत्मज्ञान के लिए प्रयत्न करें। इससे स्पष्ट ही हैं, कि मनुजी को वेदाभ्यास प्रभृति कर्मों की ही प्रधानता विवक्षित हैं, जिनके अन्तर्गत संध्या और अग्निहोत्र भी हैं। याज्ञवल्क्यजी ने भी आचाराध्याय मं कह दिया हैं कि :
जपन्नासीत्सावित्रीं प्रत्यगातारकोदयात्॥ 24॥
संध्यां प्राक्प्रातरेवंहि तिष्ठेदासूर्यदर्शनात्।
अग्निकार्यं तत: कुर्यात् सन्ध्ययोरुभयोरपि॥ 25॥
अग्निकार्यं तत: कुर्यात् सन्ध्ययोरुभयोरपि॥ 25॥
अर्थात् ‘सन्ध्या समय पश्चिम मुख बैठ कर तारा के निकलने तक और प्रात: पूर्व मुख बैठकर सूर्योदय पर्यन्त गायत्री जप करे। उसके बाद दोनों सन्धिकाल में अग्निहोत्र करे।’ श्रुतियों में यही अनुशासन (आज्ञा) अन्यत्र भी हैं, जैसा कि शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में लिखा हैं कि :
‘स्वाधयायो ध्येतव्य:’ ‘अहरह: सन्ध्या-
मुपासीत,’ ‘अग्निहोत्रीं जुहूयात्’।
अर्थ यह हैं कि ‘वेद नित्य पढ़ना और सन्ध्या अग्निहोत्र नित्य करना चाहिए।’ इत्यादि शतश: श्रुति स्मृत्यादि प्रमाणों से सिद्ध हैं कि ब्राह्मणों के लिए धार्मर्थक कर्म केवल अध्यायन, सन्ध्यानुष्ठान, अग्निहोत्र और वैश्वदेव आदि ही हैं, न कि अध्यापन (पढ़ाना) और याजन (यज्ञ कराना) आदि भी। याज्ञवल्क्य स्मृति, आचाराध्याय के 118वें श्लोक के व्याख्यान मिताक्षरा में साफ-साफ लिख दिया हैं कि :
तत्रा त्रीणीज्यादीनि धर्मार्थनि त्रीणि प्रतिग्रहादीनि वृत्तयर्थानि। षण्णान्तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका। याजनाध्यापने चैव विशुध्दाच्च प्रतिग्रह: (10/16) इति मनुस्मरणात्, अत इज्यादीन्यवश्यंर् कत्ताव्यानि च प्रतिग्रहादीनि। द्विजातीनामध्यायनमिज्यादानं ब्राह्मणस्याधिका: प्रवचनयाजनप्रतिग्रहा: पूर्वेषु नियम: (10 अ.) इति गौतमस्मरणात्। जिसका अर्थ यह हैं कि ‘छह कर्मों में से यज्ञ, अध्यायन और दान ये तीनों धर्म के लिए और याजन, अध्यापन एवं प्रतिग्रह ये तीनों केवल जीविका (पेट पालने) के लिए हैं, क्योंकि मनुजी ने कहा हैं कि छह कर्मों में से विशुद्ध प्रतिग्रह आदि तो केवल जीविका के निर्मित्त हैं। इसलिए यज्ञ, अध्यायन और दान अवश्य करने चाहिए, न कि प्रतिग्रह वगैरह भी, क्योंकि गौतमस्मृति के दशम अध्याय में लिखा हैं कि द्विज मात्र के लिए यज्ञ, अध्यायन और दान ये तीन कर्म हैं, और ब्राह्मणें के लिए यद्यपि याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह भी हैं, तथापि उनका करना आवश्यक नहीं हैं, किन्तु यज्ञ आदि का ही।’ यह मिताक्षरकार की सम्मति इस विषय में हैं।
हाँ, जीविका के लिए प्रतिग्रह कर सकते हैं। परन्तु सो भी आपत्काल में जब उछ, शिल, कृषि और वाणिज्यादि एक भी न हो सके जैसा कि आगे चलकर विदित होगा। इतने पर भी प्रतिग्रह के बाद प्रायश्चित अवश्य ही करना होगा। क्योंकि मनुस्मृति चतुर्थ अध्याय में लिखा हैं कि :
अतपास्त्वनधीयान: प्रतिग्रहरुचिर्द्विज:।
अम्भस्यश्मप्लवेनेव सह तेनैव मज्जति॥ 190॥
अर्थात् ‘जो ब्राह्मण वेदादि शास्त्रों को पढ़ने और तपस्या करने वाला नहीं हैं वह यदि प्रतिग्रह करे तो प्रतिग्रह के साथ ही उसका नाश वैसे ही हो जाता हैं जैसे पत्थर की नाव चढ़ने वाले के साथ डूब जाती हैं। इसका विशेष विचार फिर करेंगे। एक बात और भी विचारने योग्य हैं। वह यह कि किसी भी प्रसंग में सबसे प्रथम प्रधान वस्तु का ही नाम लिया जाता हैं, जैसे सभा में सभापति का इत्यादि। अब यदि इन षट् कर्मों के बतलाने वाले वाक्यों को देखते हैं तो सभी में प्रथम यजन, अध्यायन और दान के नाम आते हैं, पश्चात् याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह के। इतनी बात अवश्य हैं कि अध्यापन (पढ़ाना) तीन प्रकार के होते हैं। जैसा कि हारीतस्मृति के प्रथम अध्याय में लिखा हैं :
अध्यापनं च त्रिविधां धर्मार्थ मृक्थ कारणात्।
शुश्रूषाकरणं चेति त्रिविधां परिकीर्त्तितम्॥ 18॥
अर्थ यह हैं कि ‘अध्यापन’ तीन प्रकार के होते हैं, (1) धर्म के लिए, (2) सेवा कराने के लिए, (3) धन प्राप्ति के लिए। अत: प्रथम के दो अंशों को लेकर अध्यापन भी याजन (यज्ञ कराने) और प्रतिग्रह की अपेक्षा उत्तम हैं। इसीलिए कहीं-कहीं अध्यापन को भी प्रथम लिख देते हैं। जैसा कि-
अध्यापनमध्यायनं यजनं याजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥-मनु
यदि यज्ञ भी केवल परोपकारार्थ कराया जाये न कि दक्षिणा लेकर, तो वह भी किसी प्रकार अच्छा कहा जा सकता हैं। अतएव कहीं-कहीं एकाध स्थल में उसका नाम भी प्रथम लिया हैं। जैसा कि हारीतस्मृति के प्रथम अध्याय में लिखा हैं :
अध्यापनमध्यायनं याजनं यजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माणीति प्रोच्यते॥ 18॥
परन्तु प्रतिग्रह का नाम तो कहीं भी प्रथम नहीं आया हैं। इसलिए वह महानिकृष्ट हैं। अध्यायन, यजन और दान इन तीनों में से भी अध्यायन (पढ़ना) सर्वोच्च हैं क्योंकि उससे परमात्मा के ज्ञान द्वारा मुक्ति मिल सकती हैं और शास्त्र एवं कर्मों के ज्ञान से यज्ञादि का अनुष्ठान भी हो सकता हैं। इसीलिए यज्ञ उससे मध्यम ठहरा, क्योंकि यह उसका फल हैं। यज्ञ में दान भी होता हैं और जप, हवन आदि भी। अतएव यज्ञ का एक भाग होने के कारण दान यज्ञ से भी मध्यम अर्थात् कनिष्ठ हुआ। इस तरह से ये अध्यायन, यज्ञ और दान उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ धर्म हैं। इसी से पूर्वोक्त श्लोकों में प्रथम अध्यायन, बाद यज्ञ और उसके अनन्तर ही दान का नाम आया हैं। इस प्रकार तीन प्रकार के धर्मों के हो जाने पर अब चौथे प्रकार का धर्म कहाँ से आ सकता हैं? क्योंकि संसार की सभी वस्तुएँ या तो उत्तम या मध्यम, अथवा कनिष्ठ इन तीनों ही प्रकारों की होती हैं। इसलिए जो धर्म होंगे उनका इन्हीं तीन अध्यायन आदि में अन्तर्भाव (मिलाव) करना होगा। परन्तु प्रतिग्रह वगैरह तो इन तीनों में से किसी में भी मिल नहीं सकते। अत: वे सब कर्म धर्म के लिए नहीं हो सकते। अतएव मनु भगवान् ने कहा हैं कि :
वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम्।
वार्ता कर्मैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्वकर्मसु॥ 108॥
इसका तात्पर्य यह हैं कि ”ब्राह्मण के कर्मों में वेदाभ्यास सबसे उत्तम हैं। एवं क्षत्रिय के कर्मों में रक्षा करना और वैश्य के कर्मों में व्यापार सर्वश्रेष्ठ हैं। अर्थात् इस तीन ब्राह्मणादि वर्णों को क्रम से वेदाभ्यास आदि तीनों में विशेष ध्यान देना चाहिए”। अतएव अब इस शंका का भी अवसर न रहा कि यदि ब्राह्मण के भी तीन कर्म हैं और क्षत्रिय, वैश्य के भी तीन ही, तो फिर उनमें भेद ही क्या रहा? क्योंकि यद्यपि तीनों के लिए अध्यायन आदि समान ही धर्म हैं तथापि ब्राह्मण का प्रधान धर्म वेदाभ्यास हैं, क्षत्रियों का तीनों से अतिरिक्त रक्षा ही प्रधान धर्म हैं, एवं वैश्य का व्यापार। क्योंकि यदि क्षत्रिय रक्षक और वैश्य वाणिज्यकर्ता न हो तो विविध उपद्रव और धन की कमी से सब धर्म ही मिट्टी में मिल जाये। इसलिए क्षत्रिय और वैश्यों के लिए इन्हें ही प्रधान कर्म बतलाना बहुत ही युक्तिसंगत हैं और इन प्रधान कर्मों के भेद से ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की परस्पर विलक्षणता हो गयी। दूसरी बात यह हैं कि यदि ये धर्मार्थक कर्म तीनों के समान भी हो जाये तो भी जीविका के कर्म तीनों के भिन्न-भिन्न हैं। अत: उन्हीं के भेद से तीनों का परस्पर भेद हो सकता हैं। क्योंकि ब्राह्मणों के ही लिए शिल, उछादि बतलाये गये हैं, न कि क्षत्रिय और वैश्यों के लिए भी वे जीविकाएँ हैं। बल्कि हमारी समझ में ऐसी शंका करना ही न चाहिए। क्योंकि हम लोग (सनातनधर्मानुयायी) जन्म से ही जाति-भेद मानते हैं, न कि कर्मों से। नहीं तो ब्राह्मण और क्षत्रियों की एकता न हो जाये इस डर से यदि ब्राह्मणों के षट् कर्म अवश्य माने जाये, तो यह पूछ सकते हैं कि अस्तु, यही बात रहे, परन्तु क्षत्रियों और वैश्यों में परस्पर भेद कैसे रहेगा? क्योंकि उन दोनों के लिए तो धार्मिक कर्म अध्यायन, यजन और दान तीन ही हैं। अत: ऐसी शंका करना अनभिज्ञता मात्र हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति के आचाराध्याय में भी लिखा हैं कि :
प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानां परिपालनम्।
कुसीदकृषिवाणिज्यं पाशुपाल्यं विश: स्मृतम्॥ 119॥
अर्थात् ”क्षत्रिय का प्रधान कर्म प्रजारक्षण और वैश्य के प्रधान कर्म सूद पर रुपया देना, कृषि, वाणिज्य एवं पशुपालन हैं”। इसी जगह मिताक्षरा में लिखा हैं कि :
क्षत्रियस्य प्रजापालनं प्रधानं कर्म धर्मार्थं वृत्यर्थं च। वैश्यस्य कुसीदकृषिवाणिज्य पशुपालनानि वृत्यर्थानि कर्माणि।
अर्थात् ”क्षत्रिय का प्रजापालन ही प्रधान कर्म हैं जो धर्म और जीविका दोनों के लिए हैं एवं वैश्य के सूद पर रुपये देने, कृषि, वाणिज्य और पशुपालन प्रधान कर्म हैं। इससे यह भी सूचित होता हैं कि कृषि वाणिज्यादि ब्राह्मणों के अप्रधान कर्म अवश्य हैं, हाँ वे प्रधान नहीं हो सकते यह दूसरी बात हैं। इन वाक्यों तथा गीता के 18वें अध्याय के 42, 43 और 44 श्लोकों में भी लिखे गये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के धर्मों को देखकर मूर्ख से भी मूर्ख को यह शंका नहीं हो सकती कि ”ब्राह्मणों के तीन ही कर्म मानने से क्षत्रिय और वैश्यों से उनका भेद न रह जायेगा।” इसलिए ब्राह्मणों को त्रिकर्मा कहना बहुत ही युक्ति-युक्त हैं, न कि जीविका के कर्मों को मिलाकर षट्कर्मा। क्योंकि ऐसी दशा में शतकर्मा या सहस्रकर्मा क्यों न कहना चाहिए? क्योंकि मनुस्मृति चतुर्थाध्याय के अनुसार, जैसा अभी जीविकार्थक कर्मों के प्रकरण में दिखलायेंगे, शिल, उछ, कृषि, वाणिज्य और सूद पर रुपये देने भी ब्राह्मणों की अनापत्ति काल की जीविकाएँ हैं। बल्कि प्रतिग्रह वगैरह ही आपत्ति काल की जीविकाएँ हैं, जैसा कि वहीं विदित होगा। एवं पुराण, इतिहास तथा पराशर आदि स्मृतियों और शिष्टाचारों द्वारा भी राज्य, कृषि सेनापति के कार्य और युध्दादि भी ब्राह्मणों के कर्म बतलाये जायेगे। यदि जीविका के कर्म भी परस्पर या धर्मार्थक माने जाये, तो स्नान तथा मल-मूत्रादि के त्याग प्रभृति भी उसी में आ जायेगे, जिससे बलात् षट्कर्मा मानने के बदले शत या सहस्र कर्मा मानना ही पड़ जायेगा। अत: यह निर्विवाद सिद्ध हैं कि वास्तव में ब्राह्मण त्रिकर्मा ही होते हैं, जैसे कि आजकल अयाचक (भूमिहार, पश्चिम, तगे या दान-त्यागी, महियाल, नागर, प्राय: कान्यकुब्ज और बहुत से पंक्तिबद्ध सर्यूपारी) ब्राह्मण पाए जाते हैं। अथवा यों कहना चाहिए कि सभी प्रान्तों में किसी-न-किसी नाम या रूप में त्रिकर्मा अथवा अयाचक ब्राह्मण पाए जाते हैं।
यदि षट्कर्मा ही मानने में आग्रह हो तो सच्चे षट्कर्मा क्यों नहीं मानते? जैसे कि अयाचक ब्राह्मण भी पाए जाते हैं। क्योंकि मनुजी ने चतुर्थाध्याय के प्रारम्भ में शिल, उछ, याचित, अयाचित, कृषि और वाणिज्य रूप छह जीविकाओं को ब्राह्मणों के निमित्ता गिनाकर कहा हैं कि :
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्य: प्रवर्त्तते
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रोण जीवति॥ 9॥
अर्थ यह हैं कि ‘इन पूर्वोक्त चतुर्विधा ब्राह्मणों में कोई तो षट्कर्मा होता हैं अर्थात् पूर्वोक्त शिल, उ×छ आदि छह जीविकाएँ करता हैं, कोई प्रथम के शिल आदि तीन ही, कोई दो ही और कोई शिल और उ×छ में से एक ही करता हैं, इस वचन के अनुसार षट्कर्मा भी मानिये, हमें त्रिकर्मा ही मानने में आग्रह नहीं हैं। क्योंकि ये छह कर्म याचक और अयाचक ब्राह्मणों में समान ही हैं, किसी में कुछ भी कमी नहीं हैं।
अथवा पराशरस्मृति में कहे गये सन्ध्या-स्नान आदि छह कर्मों को जिनका वर्णन प्रथम कर चुके हैं जो केवल धर्मार्थक ही हैं, लेकर भी दोनों प्रकार के (अयाचक और याचक) ब्राह्मण षट्कर्मा कहे जा सकते हैं क्योंकि यह नियम भी हैं कि ‘कलौ पाराशरा: स्मृता:’ अर्थात् ”कलियुग में पराशरस्मृति में कहे गये धर्म ही माने जा सकते हैं, और उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘षट्कर्माणि दिने दिने’ अर्थात् सन्ध्या-स्नानादि छह कर्म प्रतिदिन करने चाहिए” ऐसा लिख दिया हैं। इसलिए इन धार्मिक षट् कर्मों को लेकर ही षट्कर्मा मानना बहुत ही उचित होगा जैसा कि दिखला चुके हैं। अत: अयाचक ब्राह्मण त्रिकर्मा या षट्कर्मा दोनों ही कहे जा सकते हैं और, साथ ही, अन्य ब्राह्मण भी। इस विषय का अवशिष्ट विवेचन अगले ग्रन्थ में चलकर होगा। उपसंहार में हम केवल इतना और कह देना चाहते हैं कि जब मनुजी स्वयं लिख देते हैं कि ‘धर्मस्तु दानमध्यायनं यजि:’ (10/79) अर्थात् ‘धर्मार्थक अथवा स्वयं धर्म स्वरूप कर्म तो दान, यज्ञ और अध्यायन (पढ़ना) ये तीन ही हैं, तो फिर इस विषय में विवाद ही क्या हैं? क्या इनमें कुछ ऐसी विशेषता हैं कि क्षत्रियादि के लिए ये धर्म हो न कि ब्राह्मणों के लिए? क्या किसी विचारहीन के केवल कथन मात्र ही से प्रतिग्रह आदि भी अपने वास्तव कलुषित स्वरूप को (जैसा कि सभी जानते और मानते हैं) छिपाकर धर्म बन जायेगे? क्या लोग नहीं जानते हैं कि धर्म के नाम पर प्रतिग्रह लेना केवल फिर से धोने के लिए पंक में पाँव को घुसेड़ना हैं और धर्मशास्त्रकार चिल्ला-चिल्लाकर उन्हें रोकते हैं कि ऐसा न करो? क्या कोई भी विचारवान् और नैष्ठिक ब्राह्मण प्रतिग्रह को उचित समझता हैं?
इस विषय में एक बात और कहकर इस प्रकरण की समाप्ति और जीविकार्थक कर्मों के विचार के प्रकरण का आरम्भ करेंगे। वह यह कि अध्यापन (पढ़ना), याजन (यज्ञ कराना) आदि कर्म काम्य हैं, अर्थात् इच्छा रहने पर ही किये जा सकते हैं। परन्तु अध्यायन (पढ़ना) आदि तो नित्य हैं, अर्थात् उनके करने की इच्छा न रहने पर भी उन्हें करना ही पड़ेगा। इसीलिए अध्यापन आदि करने के लिए शास्त्र बाधित नहीं कर सकता, बल्कि अपनी इच्छा के अनुसार ही लोग उसे कर सकते हैं या नहीं। क्योंकि काम्य कर्मों से यथानुष्ठान-शक्ति का नियम हैं, जिसका तात्पर्य यह हैं कि जिस काम्य कर्म करने की इच्छा हो उसके सांगोपांग अनुष्ठान और प्रायश्चित्त वगैरह करने की शक्ति यदि हो तो उसे करे, नहीं तो उसे न करे। परन्तु नित्य कर्मों को तो अवश्य करना ही होगा। इसलिए उनके विषय में यथाशक्त्यनुष्ठन का नियम हैं; जिसका भाव हैं कि नित्य कर्मों को जीवनपर्यन्त करना आवश्यक हैं। परन्तु जीवन-भर सब अंगों सहित करने की शक्ति नहीं रह सकती क्योंकि जरावस्था में स्नान या प्राणायाम आदि नहीं कर सकते। इसलिए प्रधानकर्म को न छोड़कर उसके करते हुए स्नान प्रभृति उसके अंगों को यथाशक्ति करना चाहिए। इसीलिए यद्यपि नित्य और काम्य दोनों प्रकार के कर्मों के फल होते हैं, तथापि दोनों में भेद होता हैं। इसी बात को श्री पार्थ सारथि मिश्र ने अपने मीमांसा ग्रन्थ ‘न्यायरत्नमाला’ में इस प्रकार लिखा हैं कि :
काम्ये तु निमित्तावाक्यस्य कश्चिद्विरोधो नास्तीत्यंगान्य पेक्षितान्युपसंहियन्ते इति निखिलांग युक्तस्यैव प्रयोग:, नित्ये तु यथोक्तन्यायेनांगानां यथाशत्क्युपसंहार इति॥
तात्पर्य यह हैं कि जब कि काम्यकर्मों के सांगोपांग का ही अनुष्ठान करने में किसी भी निमित्त के साथ कोई विरोध नहीं हैं, (क्योंकि जीवन रूपं निमित्त तो वहाँ हैं ही नहीं, कि जीवन-भर अंगों के न कर सकने से विरोध होगा, और कामना रूप निमित्त तो आवश्यक नहीं हैं, क्योंकि यदि सांगोपांग कर्म को नहीं कर सकते तो कामना को छोड़ भी सकते हैं) इसलिए सभी अपेक्षित अंगों को करना ही पड़ता हैं, न कि उन्हें छोड़कर भी। परन्तु नित्य कर्म तो पूर्वोक्त प्रकार से जीवन-भर सब अंगों सहित लोग नहीं ही कर सकते हैं; अंगों के लिए प्रधान कर्म का भी त्याग उचित भी नहीं हैं और जीवन रूप निमित्त अपरिहार्य हैं। अत: वहाँ यथाशक्ति ही अंग किये जाते हैं। इससे तो स्पष्ट ही हैं कि अध्यापन आदि कर्म उसी दशा में किये जा सकते हैं, जब उनके करने की सामर्थ्य और कामना हो, न कि उनके करने के लिए शास्त्र अवश्य बाधित कर सकते हैं। जैसा कि स्वामी चित्सुखाचार्यजी अपने ‘चित्सुखी’ (तत्त्व प्रदीपिका) ग्रन्थ में स्पष्ट ही लिख दिया हैं कि :
किंच तमध्यायपयीतेति च नायमध्यापने विधिर्वृत्तयर्थत्वेनाध्यापनस्य याजनवत्, प्राप्तत्वात् उक्तं हि षण्णांतु कर्मणामस्य त्रीणिकर्माणि जीविका। याजनाध्यापने चैव विशुध्दाच्च प्रतिग्रह इति, तस्मात् यथैतयान्नाद्यकामं याजयेदित्यादिषु याजनं न विधीयते, किन्त्वेतयान्नाद्यकामो यजेतेति वाक्यार्थस्तथेहाप्यवर्षो ब्राह्मण उपगच्छेत्, सोधीयीतेति वाक्यार्थ: स्वीकार्य इति॥
इसका अर्थ यह हैं कि ‘अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपयीत तमध्यापयीत’ इस श्रुति में उपनयन संस्कार करवाने और पढ़ाने की आज्ञा नहीं हैं, क्योंकि जैसे यज्ञ करवाना जीविका हैं, इसलिए उसका करना लोगों के लिए स्वत: (आप ही आप) सिद्ध हैं, न कि उसके लिए शास्त्रज्ञा की आवश्यकता हैं, वैसे ही अध्यापन (पढ़ाना) भी जीविका के ही लिए हैं, क्योंकि मनुजी ने कहा हैं कि छह कर्मों में से अध्यापन आदि तीन कर्म तो केवल ब्राह्मणों की जीविकाएँ हैं। इसलिए जैसे ‘एतयान्माद्यकामं याजयेत्’ इस श्रुति में यह आज्ञा नहीं हैं कि अन्नादि चाहने वाले से ‘अवेष्टि’ नामक यज्ञ करवावे, क्योंकि यज्ञ करवाना तो बिना कहे ही सिद्ध हैं, किन्तु वहाँ यज्ञ करने की ही आज्ञा हैं कि अन्नादि चाहने वाला ‘अवेष्टि’ नामक यज्ञ करे, यज्ञ करवाने की आज्ञा केवल ऊपर से प्रतीत मात्र ही होती हैं। उसी प्रकार यहाँ भी यही आज्ञा हैं कि 8 वर्ष का ब्राह्मण गुरु के पास जाये और विद्या पढ़े, न कि गुरुओं के लिए पढ़ाने की आज्ञा हैं, वह तो प्रतीत मात्र होती हैं।
इसी ‘चित्सुखी’ ग्रन्थ की टीका ‘नयनप्रसादिनी’ में उसी जगह स्पष्ट शब्दों में लिख दिया हैं कि :
यथाहि न तावद्यथाश्रुति याजनं विधातुं शक्यं वृत्तयर्थ त्वेन तत्रा स्वत: एवप्रवृत्तात्वात्, अतो प्राप्तप्रयोज्यरूपसाक्षात् कर्तृव्यापारयागपरो विधिस्तथेहाप्यन्तो प्राप्तप्रयोज्यमाण वकव्यापारावुपगमनाध्यायने विधीयेते इत्यर्थ:॥
जिसका अर्थ यह हैं कि जैसे ‘अवेष्टि यज्ञ करवाने की आज्ञा नहीं हो सकती, क्योंकि वह तो जीविका हैं, इसलिए बिना कहे ही उसे लोग कर सकते हैं। किन्तु यज्ञ करने की ही वहाँ आज्ञा हैं। ठीक वैसे ही गुरु को अपने पास विद्यार्थी लाने और उसके पढ़ाने की आज्ञा शास्त्रों में नहीं दी गयी हैं। क्योंकि बिना शास्त्राज्ञा के ही गुरु लोग ऐसा करने में जीविका के लिए तत्पर होते हैं, किन्तु विद्यार्थी स्वयं गुरु के पास जाये और पढ़े, यही वेद की आज्ञा हैं। क्योंकि ऐसी आज्ञा के बिना कोई पढ़ नहीं सकता, जबकि हजार शास्त्राज्ञा के होते भी शास्त्र का पढ़ना दु:साध्य हो रहा हैं। पढ़ाना जीविका हैं इसे तो बहुत अच्छी तरह दिखला चुके हैं।
परन्तु यदि कोई यह कहे कि पढ़ाना या यज्ञ करवाना आदि काम्य कर्म नहीं हैं, तो उसके लिए भी ‘चित्सुखाचार्यजी’ ने पूर्वोक्त प्रसंग में ही लिखा हैं कि :
तंत्रा संमाननोत्स जनाचार्यकरणेतिसूत्रोणाचार्यकरणे नयतेरात्मनेपदविधानात्, उपनयीत तमध्यापयीतेतिचोप नयनाध्यापन योरेकप्रयोगतावगमादुपनय पूर्वकाध्यापनसाध्याचार्यत्वप्रतीतौ तत्कामिनो नियोज्यत्वावगमात्। अपि चाध्यायनं नित्यं, ‘योनधीत्य द्विजोवेदानन्यत्रा कुरुते श्रमम्। स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वय’ इत्यादिना करणेप्रत्यवायस्मरणात्, अध्यापनं चानित्यंकाम्यत्वात्।
जिसका भावार्थ यह हैं कि ‘उपनयीत’ इस क्रियापद में जो ‘आत्मनेपद’ संज्ञकप्रत्यय लगा हैं वह ‘संमाननोत्स जनाचार्यकरण ज्ञानभृतिविगणनव्ययेषु निय:। 1। 3। 26′ इस पाणिनीय सूत्रा के अनुसार आचार्यता सम्पादन के अर्थ में हुआ हैं। जिसका तात्पर्य यह हैं कि विद्यार्थी के उपनयन संस्कारपूर्वक पढ़ाने से वह पुरुष उसका आचार्य हो सकता हैं, क्योंकि उपनयन और अध्यापन (पढ़ाना) ये दोनों एक ही पुरुष केर् कर्त्तव्य प्रतीत होते हैं। अत: जिसको गुरु (आचार्य) बनने की इच्छा हो वही शिष्य का उपनयन संस्कार और अध्यापन कर सकता हैं और भी बात हैं कि अध्यायन (पढ़ाना) नित्य कर्म हैं, क्योंकि उसके न करने से मनुस्मृति में यह दोष लिखा हैं कि जो ब्राह्मण वेदों को न पढ़कर दूसरे विषय में परिश्रम करता हैं वह जीता ही सपरिवार शूद्र सदृश हो जाता हैं और नित्य कर्मों के ही न करने में दोष हुआ करता हैं, क्योंकि उनका लक्षण ही यही हैं कि जिनके न करने में दोष हो। परन्तु अध्यापन तो नित्य नहीं हैं, क्योंकि उसे कामना रहने पर ही कर सकतेहैं।
इससे सिद्ध हो गया कि ब्राह्मण के लिए अध्यायन (पढ़ना), यजन (यज्ञ) और दान ही धर्म हैं। उन्हीं का करने वाला श्रेष्ठ समझा जा सकता हैं। प्रतिग्रह, याजन (यज्ञ करवाने) और अध्यापन (पढ़ाने) के लिए शास्त्रों की आज्ञाएँ तो नहीं हैं, हाँ जो चाहे वह जीविका के लिए उन्हें उस दशा में कर सकता हैं जब अन्य कृषि आदि उपाय न हों। इसी से वैसा करने में उत्तम न होकर मध्यम या कनिष्ठ (हीन) ही हो सकता हैं, जैसा कि विदित हो गया और होगा भी कि उनमें प्रायश्चित्त वगैरह के बखेड़े लगे हुए हैं, जिनका कर सकना प्राय: सब प्रतिग्रहियों के लिए असम्भव हैं। और यह भी विदित हो गया कि इन्हीं प्रतिग्रह आदि तीन कर्मों के न करने और करने से दो प्रकार के ब्राह्मण सृष्टिकाल से ही चले आते हैं, एक निवृत्त और दूसरे प्रवृत्त, अथवा अयाचक और याचक। क्योंकि ‘रुचीनां वैचित्रयात्’ अर्थात् ‘सबकी रुचि एक प्रकार की नहीं हो सकती’, इस नियम के अनुसार बहुत से विचारशील और शास्त्र तत्त्व के जानने वाले पुरुष पुरोहिती और प्रतिग्रह वगैरह से अलग होने लगे, जैसी इच्छा प्रथमत: वसिष्ठ और विश्वरूपजी ने भी प्रकट की थी और अब तक भी अलग होते जाते हैं, जिन अयाचकों में ही पश्चिम, भूमिहार, त्यागी, जमींदार आदि ब्राह्मणों को भी समझना चाहिए। इसके विपरीत बहुत से ब्राह्मण लोग विचार और शास्त्र से काम न लेकर लोभ और आलस्यवश उन्हीं पुरोहिती और प्रतिग्रह वगैरह कर्मों में प्रवृत्त हो गये और हो रहे हैं, जिसमें से ही आजकल के भिक्षुक याचक या पुरोहित दलवाले ब्राह्मण हैं।
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(ख) जीविकार्थक कर्म – अब प्रसंगवश इस विषय का विचार करना हम उचित समझते हैं कि ब्राह्मण किस जीविका को किस दशा में कर सकता हैं और साधारणत: कौन-कौन-सी जीविकाएँ श्रेष्ठ हैं।
(ख) जीविकार्थक कर्म – अब प्रसंगवश इस विषय का विचार करना हम उचित समझते हैं कि ब्राह्मण किस जीविका को किस दशा में कर सकता हैं और साधारणत: कौन-कौन-सी जीविकाएँ श्रेष्ठ हैं।
यहाँ पर इस बात के स्मरण रखने से प्रकृत विषय के समझने में सुगमता होगी कि मनुष्य मात्र के, अतएव ब्राह्मण के भी, सभी धर्म दो प्रकार के होते हैं, एक आपत्कालिक और दूसरा अनापत्कालिक। इसका तात्पर्य यह हैं कि कुछ धर्म ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य उसी दशा में कर सकते हैं जब दूसरा कोई भी उचित उपाय न मिले, अर्थात् उनके किये बिना किसी प्रकार भी काम न चल सके। जैसे, यद्यपि सन्ध्या करने के लिए स्नान आदि का करना आवश्यक हैं, तथापि, रोगावस्था में बिना जल स्नान के भी सन्ध्या का करना आपत्कालिक धर्म हैं। दूसरे प्रकार के धर्म वे हैं जो बिना किसी रोक-टोक, दबाव या शर्त के ही सर्वदा किये जा सकते हैं, जैसे अध्यायन (पढ़ना) या सन्ध्यानुष्ठान वगैरह। इन्हें अनापत्कालिक धर्म कहते हैं। बस, इसी तरह जीविका के लिए भी जिन उपायों को शास्त्रों में बताया हैं, उनके भी आपत्कालिक और अनापत्कालिक ये दो विभाग किये गये हैं जो सर्वमान्य मनु भगवान् द्वारा मनुस्मृति के चतुर्थ और दशम अध्यायों में क्रमश: सुस्पष्टरीति से वर्णित हैं। वे चतुर्थ अध्याय के प्रारम्भ में ही लिखते हैं कि :
चतुर्थमायुषोभागमुषित्वाद्यं गुरौ द्विज:।
द्वितीयमायुषोभागंकृतदारो गृहे वसेत्॥ 1॥
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुन:।
या वृत्तिस्तां समास्थायविप्रीजीवेदनापदि॥ 2॥
या वृत्तिस्तां समास्थायविप्रीजीवेदनापदि॥ 2॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ब्राह्मण अपने सम्पूर्ण आयु का प्रथम चतुर्थांश ब्रह्मचर्य आश्रम द्वारा गुरु के पास बिताकर, द्वितीय चतुर्थांश में विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे और ऐसी दशा में जबकि उसके ऊपर किसी प्रकार की आपत्ति या दबाव न हो, अर्थात् ”अनापत्काल में (जैसा कि ऊपर दिखला चुके हैं) ऐसे-ऐसे उपायों द्वारा जीविका करे जिनसे अन्य प्राणियों को या तो पीड़ा ही न हो, या हो भी तो बहुत थोड़ी।” क्योंकि शिल और उ×छ आदि में भी प्राणियों की पीड़ा अनिवार्य हैं। फिर लिखते हैं कि :
यात्रामात्रप्रसिद्धयर्थं स्वै: कर्मभिरगर्हितै:।
अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसंचयम्॥ 3॥
”अर्थात् शरीर यात्रा के लिए ऐसे विहित उपायों द्वारा धन एकत्र करे जिनसे बहुत क्लेश न हो, (क्योंकि प्रतिग्रह आदि लेने में प्रायश्चित्त करने पड़ते हैं, जिनसे शारीरिक क्लेश होता हंा और अपने हाथों से ही हल जोतने में भी) और जिनका धर्म शास्त्रों में निषेधन हो, (क्योंकि अपने हाथों हल जोतकर कृषि करने और प्रतिग्रह इत्यादि का निषेध हैं। जैसा कि विदित होगा)।” प्रथम के दो श्लोकों में जिन उपायों का सामान्य रूप से वर्णन किया हैं उन्हीं को मनु भगवान् इन अगले श्लोकों में विशेष रूप से गिनाते हैं। जैसा कि :
ऋतामृताभ्यां जीवेत्तु मृतेन प्रमृतेन वा।
सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्तया कदाचन॥ 4॥
अर्थ यह हैं कि ”अनापत्काल में ब्राह्मण ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृत नामक उपायों द्वारा शरीर यात्रा करे, परन्तु श्व (श्वान) वृत्ति नामक जीविका का तो कभी भी अवलम्बन न करे।” फिर भी मनुजी ने यह विचारा कि कदाचित् ऋत आदि शब्दों के अर्थ लोग व्याकरण आदि के बल से मनमाना करने लग जाये (जैसी कि कुल्लूकभट्ट प्रभृति टीकाकारों ने फिर भी टाँग अड़ाई हैं), इसलिए अगले श्लोकों में आप ही उन शब्दों के अर्थ बतलाते हुए यह सूचित करते हैं कि वे ऋत और अमृत आदि नाम वैसे ही हैं, जैसे अश्वगन्धा, शालपर्णी मण्डप, ओदनपाकी और गदहपूर्णा वगैरह नाम औषधियों आदि के हैं, न कि यौगिक हैं। अर्थात् उनके अक्षरों से अर्थ निकाले नहीं जा सकते, ऐसा करना नितान्त भूल हैं क्योंकि गद्हपूर्णा का यह अर्थ कभी नहीं हो सकता कि गद्हों से भरी हुई, या मण्डप शब्द का अर्थ ‘माँड़ पीने वाला’ नहीं हो सकता। वे श्लोक ये हैं :
ऋतमु छशिलं ज्ञेयमतृतं स्यादयाचितम्।
मृतं तु याचितं भैक्ष्यं प्रमृतं कर्षणं मतम्॥ 5॥
सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते।
सेवाश्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ 6॥
सेवाश्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ 6॥
तात्पर्य यह हैं कि ‘ऋत नाम उ×छ और शिल वृत्तियों का हैं, (^m×छ: कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्’ इस वृद्ध वचन के अनुसार अन्न विक्रय के स्थान तथा खेतों में जाकर पड़ी हुई बालों और दानों के चुनने को उ×छ और शिल कहते हैं) बिना माँगे यदि कुछ अन्न केवल भोजनार्थ मिल जाये तो उसे अमृत, भ्रमर की तरह द्वार-द्वार पर जाकर माँगने से जो मिले उसे मृत, और कृषि (खेती) को प्रमृत कहते हैं। वाणिज्य अर्थात् व्यापार और उचित सूद पर रुपये देने को सत्यानृत कहते हैं। ये सभी जीविका के उपाय ब्राह्मणों के लिए हैं। परन्तु श्व (श्वान) वृत्ति तो नौकरी का नाम हैं, अत: उसका परित्याग कर देना चाहिए। इन पाँच नामवाली अनापत्कालिक पाँच जीविकाओं में से जिसे चाहे उसे ही ब्राह्मण जब चाहे तभी कर सकता हैं, इनमें से किसी के भी करने से उत्तम या मध्यम नहीं समझा जा सकता। क्योंकि आगे चलकर मनु भगवान् ही स्पष्ट रूप से लिखते हैं :
अतोन्यतमयावृत्या जीवंस्तु स्नातको द्विज:।
स्वर्गायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानिधारयेत्॥ 13, अ. 4॥
अर्थात् ”इसलिए गृहस्थ ब्राह्मण पूर्वोक्त पाँच जीविकाओं में से मनचाहे जिसे करता हुआ (क्योंकि इस श्लोक में ‘अन्यतम’ शब्द का प्रयोग हैं, जो ऐसी जगह बोला जाता हैं जहाँ पर बहुत सी बराबर वस्तुओं में से जिसे दिल चाहे उसे स्वीकार कर सकें। हिन्दी में इसकी जगह ‘इनमें कोई’ ऐसा बोला जाता हैं) स्वर्ग, आयु और यश देने वाले आगे कहे गये व्रतों का पालन करें।” हाँ इतनी बात अवश्य हैं कि जो प्राचीन महर्षियों (क्योंकि ऋषि लोग भी संन्यासी न थे, प्रत्युत गृहस्थ ही थे, कारण सन्तान वाले थे) की तरह उपराम रहना पसन्द करें एवं अहर्निश शास्त्र चिन्ता तथा अरण्य निवास को ही रुचिकर और सुखद समझें, उनके लिए उस दृष्टि से शिल, उ×छ आदि ही श्रेयस्कर (कल्याण साधक या उत्तम) हो सकते हैं, यह दूसरी बात हैं। परन्तु जो संसार में प्रवृत्ता हैं उनके लिए तो सभी बराबर हो सकते हैं और हैं भी।
यहाँ इतना और समझ लेना चाहिए कि प्रवृत्त वाले जो ब्राह्मण कृषि, वाणिज्य आदि करते हैं और जो निवृत्ति वाले केवल उ×छ, शिल वगैरह ही करते हैं उन दोनों में से किसी अंश को लेकर प्रथम श्रेणी के श्रेष्ठ हैं और किसी अंश में द्वितीय श्रेणी के। परन्तु प्रवृत्ति वाले होकर भी केवल शिल, उ×छ करने वाले तो किसी भी गिनती में नहीं हैं। इसीलिए भगवान् मनु ने चतुर्थ अध्याय में ही लिखा हैं कि :
कुसूलधान्यको वा स्यात् कुम्भीधान्यक एव वा।
त्रयहैंहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव वा॥ 7॥
चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम्।
ज्यायान्पर: परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्ताम:॥ 8॥
ज्यायान्पर: परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्ताम:॥ 8॥
याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय में लिखा हैं कि :
कुसल: कुम्भीधान्यो वा त्रयाहिकोश्वस्तनोपि वा।
जीवेद्वापि शिलो×छेन श्रेयानेषां पर: पर:॥ 128॥
सब वाक्यों का तात्पर्य यह हैं कि गृहस्थ ब्राह्मण चार प्रकार के होते हैं, कोई 3 वर्षों तक के लिए बड़े-बड़े कोठों में अन्न एकत्रित रखते हैं, कोई बारह या छह मासों के लिए, कोई तीन दिनों के ही लिए और कोई एक दिन के लिए भी नहीं। इन चारों में से जो एक-दूसरे से बड़े हैं वे श्रेष्ठ हैं। क्योंकि वे धर्म के द्वारा स्वर्ग आदि लोकों या ब्रह्मलोक को प्राप्त कर सकते हैं। इसके दो अभिप्राय हैं। एक तो यह हैं कि 7वें श्लोक में गिनाए हुए ब्राह्मणों के प्रकार 8वें श्लोक की अपेक्षा ज्यों-ज्यों दूर होते गये हैं त्यों-त्यों श्रेष्ठ हैं। अर्थात् एक दिन के लिए भी न रखने वाले से 3 वर्ष वाले। क्योंकि जिसके पास जितना ही अधिक धन होगा वह उतना ही दान और यज्ञ वगैरह अधिक करें स्वर्ग आदि लोकों में जायेगा तथा ज्योतिष्टोम आदि विशाल यज्ञों द्वारा भी वही उन विलक्षण-विलक्षण लोकों को प्राप्त कर सकेगा। क्योंकि लिखा हैं कि :
त्रैवार्षिकाधिकान्नो य: स हि सोम पिवेद्द्विज:।
प्राक्सौमिकी: क्रिया: कुर्याद्यस्यान्नं वार्षिकंभवेत्॥ 124 या.॥
यस्य त्रौवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्ताये।
अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति॥ 7॥ म. अ. 11
त्रौवार्षिकाधिकान्नस्तुपिवेत्सोममतन्द्रित:॥ 16॥ शं. अ. 5
त्रौवार्षिकाधिकान्नस्तुपिवेत्सोममतन्द्रित:॥ 16॥ शं. अ. 5
”जिसका अर्थ यह हैं कि जिस ब्राह्मण के पास 3 वर्षों या उससे अधिक तक के लिए भोजन वगैरह के सामान अन्न आदि हो वह ज्योतिष्टोम यज्ञ करे। परन्तु जिसके पास एक ही वर्ष के लिए हो वह केवल अग्निहोत्र तथा दर्शपूण्रा मास आदि कर्म करे।” यही अर्थ दूसरे और तीसरे महर्षि वचन रूप श्लोकों का भी हैं। दर्श पूर्णमास या ज्योतिष्टम यंज्ञ करने से स्वर्ग आदि लोकों की प्राप्ति होती हैं, इस बात में बहुत सी स्मृतियाँ और दर्श पूर्णमासाभ्यां स्वर्ग कामो यजेत् ‘ज्योष्टोमेन स्वर्ग कामो यजेत्’ अर्थात् ”स्वर्ग की इच्छा करने वाला पुरुष दर्शपूर्ण मास और ज्योतिष्टोम यज्ञ करे” इत्यादि श्रुतियाँ भी प्रमाण हैं। इस प्रकार से बहुत धनी कृषि और वाणिज्य आदि करने वाला गृहस्थ ब्राह्मण ही उत्तम हुआ।
दूसरा अभिप्राय उन पूर्वोक्त वाक्यों का यह हैं कि जो एक के बाद दूसरे उस श्लोक में लिखे हुए हैं वे क्रमश: श्रेष्ठ हैं। अर्थात् 3 वर्ष वालों से छह मास वाले, उनसे तीन दिन वाले और उनसे भी, जिनके पास एक दिन के लिए भी अन्न वगैरह नहीं हैं, वे श्रेष्ठ हैं। इसी अर्थ को कुल्लूकभट्ट नामक टीकाकार ने पसन्द किया हैं। परन्तु जब उनके ऊपर यह संकट आ पड़ा हैं कि ऐसे लोग उन स्वर्ग आदि लोकों को कैसे प्राप्त कर सकते हैं। जिनके प्राप्त करने से ही मनुजी ने इन्हें उत्तम बतलाया हैं? क्योंकि आप जिन्हें श्रेष्ठ बताते हैं वे तो क्रमश: बिलकुल ही धनहीन हैं। तो उन्होंने कहीं से कुछ प्रमाण न देकर (जैसा कि पूर्व के अर्थ में स्वयं मनुजी के वचन ही प्रमाण स्वरूप दिखलाये गये हैं और अन्य ऋषियों के भी) वहाँ पर केवल इतना ही लिख दिया हैं कि ‘वृत्तिसंकोचधार्मेण स्वर्गादिलोकजित्तामो भवति’। जिसका भाव यह हैं कि ”वह जीविका के संकोच रूप धर्म के बल से स्वर्ग आदि लोगों को प्राप्त कर सकता हैं”। परन्तु इनसें तो काम चल सकेगा नहीं; क्योंकि केवल भीख माँगने से स्वर्ग मिलता हैं इस बात में तो भगवान् मनु तथा अन्य महर्षियों की सम्मति कहीं भी नहीं पाई जाती। इसीलिए यह दूसरे अभिप्राय वाला पक्ष दुर्बल और प्रथम ही पक्ष प्रबल अथवा ठीक हैं। यदि दूसरे अभ्रिप्राय को भी मानने में आग्रह हो तो केवल कुल्लूकभट्ट के कथन से काम न चलेगा। हाँ, इतना अवश्य होगा कि जब जीविका का संकोच होते-होते ब्राह्मण चतुर्थ प्रकार का हो जायेगा, अर्थात् उसके पास एक दिन के लिए भी भोजन आदि का सामान न रहेगा, तो जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् के पंचम प्रपाठक के 9वें खण्ड में लिखा हैं कि :
तद्यइत्थं विदुर्येचेमे रण्ये श्रध्दातप इत्यपासते,
ते र्चिषमभिसम्भवन्ति…ब्रह्मगमयति इत्यादि॥
जिसका भावार्थ यह हैं कि ”जो गृहस्थ शास्त्रभ्यासी और पूर्वोक्त पंचाग्नि विद्या के उपासक होते हैं, तथा जो वानप्रस्थ एवं ब्रह्मचारी आदि जंगलों में श्रध्दापूर्वक तप करते हैं, वे अर्चिरादि मार्ग (उत्तरायण) द्वारा क्रमश: ब्रह्मलोक में जाते हैं।”
अथवा जैसा कि शतपथ ब्राह्मण में लिखा हैं कि ‘स घृतकुल्या पितृंस्तर्पयति’ इत्यादि। अर्थात् ”नियमपूर्वक प्रतिदिन वेदादि का अभ्यास करने वाला सभी कर्मों के फल प्राप्त कर लेता हैं,” इसके अनुसार वही प्रथम प्रकार का ब्राह्मण ब्रह्मलोकादि प्राप्त कर सकता हैं, न कि दूसरे और तीसरे भी। इसीलिए यद्यपि इस द्वितीय अभिप्राय के वर्णन में मनुजी के भाव का संकोच अवश्य होता हैं, तथापि हम इस अभिप्राय को भी स्वीकार कर लेने में कोई बाधा उपस्थित नहीं करते। अत: सिद्ध हो गया कि कृषि आदि के करने वाले भी ब्राह्मण न करने वालों से किसी प्रकार से हीन नहीं हैं। किन्तु दोनों समान हैं। उ×छ, शिल आदि करने वाले विशेष रूप से शास्त्रभ्यास और उसके द्वारा उत्तम-उत्तम फल प्राप्त कर सकते हैं यह दूसरी बात हैं। एतावता वह जीविका मन्त्रदि महर्षियों की दृष्टि में मध्यम नहीं हैं।
जब यह विचार उठा कि पूर्वोक्त चतुर्विध ब्राह्मण किन-किन उपायों द्वारा अन्न संग्रह कर सकते हैं, तो मनुजी स्वयं उत्तर देते हैं कि :
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्य: प्रवर्त्तते।
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति॥ 9॥
इसका अर्थ मेधातिथि ने ऐसा लिखा हैं कि :
कुसूलधान्यादीनां मध्यादेक: कुसूलधान्यक: प्रकृतैरु×छशिलायाचितया- चितकृषिवाणिज्यै: षट्कर्मा भवति षड्भिर्जीवति। अन्योद्वितीय: कुम्भीधान्यक: कृषिवाणिज्ययोर्निन्दितत्वात् तत्तयाग उ×छ शिलायाचितयाचितानां मध्यादिच्छातास्त्रिभरिर्वत्ताते। एकस्त्रयहैंहिको याचित लाभं विहायो×छशिलायाचितानां मध्यादिच्छया द्वाभ्यांर् वत्ताते। चतुर्थ: पुरनश्वस्तनिको ब्रह्मसत्रोण जीवति। ब्रह्मसत्रांशिलो×छयोरन्यतरावृत्ति- र्ब्रह्मणोब्राह्मणस्यसततभवत्वात्सत्राम्।
इसका मर्मानुवाद यह हैं कि :
”कुसूलधान्यादि संज्ञक चार प्रकार के ब्राह्मणों में से कुसूलधान्यक पूर्वोक्त उ×छ, शिल, अयाचित, याचित, कृषि और वाणिज्य से जीविका करता हुआ षट्कर्मा कहलाता हैं। कुम्भी धान्यक कृषि और वाणिज्य को छोड़कर शेष चार में से तीन ही करता हैं, क्योंकि अपने हाथों उनके करने का निषेध हैं (और अन्य द्वारा करवाने में पराधीनता होती और द्रव्य व्यय होता हैं) जैसा कि आगे विदित होगा। तीसरा त्रयहैंहिक नाम वाला याचित को अच्छा न समझ अवशिष्ट तीन में से दो ही करता हैं और अश्वस्तनिक नाम का तो केवल शिल अथवा उ×छ करता हैं, जिनका नाम ब्रह्मसत्रा हैं, क्योंकि वे ब्रह्म अर्थात् ब्राह्मण के लिए सतत (सदा) होते हैं। यह मेधातिथि का ही अर्थ यहाँ पर उचित हैं। क्योंकि इस श्लोक के अन्त में जब उनके मत से शिल, उ×छ का वर्णन आया हैं, तभी अगले श्लोक के साथ संगति (सम्बन्ध) भी होती हैं। कारण उस श्लोक में भी शिल, उ×छ का नाम लेते हुए उसके साथ कुछ विशेष बातें कही गई हैं, जैसाकि :
वर्तयंश्च शिलो×छाभ्यामग्निहोत्रापरायण:।
इष्टी: पार्वायनान्तीया: केवल निर्वपेत्सदा॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ”शिल, उ×छ वाले के पास बहुत धन न होने से वह बडे-बड़े यज्ञ नहीं कर सकता। इसलिए वह केवल अग्निहोत्र और दर्श पूर्णमास तथा आग्रायण यज्ञ करे।”
पूर्वोक्त षट्कर्मैको इत्यादि श्लोक के अर्थ में कुल्लूकभट्ट ने जो याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह का नाम लिया हैं वह उनका अकाण्डताण्डव मात्र हैं। क्योंकि याजन आदि का तो चतुर्थ अध्याय में प्रसंग ही नहीं हैं। उनकी यह आशा कि ”अद्रोहेणैव इत्यादि श्लोक से इनकी सिद्धि हो सकती हैं, निराशा मात्र हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि इस ‘अद्रोहेणैव’ श्लोक में याजन आदि का भी सामान्य रूप से संग्रह हैं। यदि ऐसी बात न होती और केवल आगे कही हुई मात्र जीविकाओं का सामान्य रूप से इस श्लोक में कथन होता तो फिर इस श्लोक की आवश्यकता ही क्या थी? परन्तु विचारने की बात तो यह हैं कि यदि इस युक्ति से इस श्लोक से ऋत आदि से भिन्न याजन आदि की सिद्धि मानी जाये तो इससे अगले ‘यात्रामात्र प्रसिद्धयर्थ’ इस श्लोक से भी किसी और जीविका की सिद्धि होनी चाहिए। परन्तु इस श्लोक में तो वे भी यही मानते हैं कि आगे कहे हुए उपायों का साधारण रूप से कथन हैं।
अतएव टीका में आप ही लिखते हैं कि ‘कै:कर्मभिरित्यत्राहऋतामृताभ्यामिति।’ अर्थात् पूर्व श्लोकों में जो ‘कर्मभि’ यह पद पड़ा हैं उससे किन-किन कर्मों को लेना चाहिए इस तात्पर्य से मनुजी ‘ऋतामृताभ्यां’ यह अलग श्लोक पढ़ते हैं। इससे स्पष्ट हैं कि ‘अद्रोहेणैव’ इस श्लोक में भी केवल ऋत आदि का सामान्य रूप से कथन करते हुए यह शिक्षा दी गयी हैं कि प्राणियों की पीड़ा का ध्यान सर्वदा रखना चाहिए और ‘यात्रामात्र’ इस श्लोक में ‘अगर्हितै:’ यह विशेषण देकर निन्दित अर्थात् अपने हाथों हल जोतकर खेती करने आदि को मना किया हैं। बस, इतनी ही विशेषता इन दोनों श्लोकों के पृथक् बनाने में हैं। यह भी स्मरण रखना चाहिए कि शास्त्रकारों का यह नियम सर्वदा रहता हैं कि प्रथम सामान्य रूप से वस्तु को कहते हैं फिर विशेष रूप से। क्योंकि सामान्य ज्ञान बिना उसके विशेष की जिज्ञासा ही नहीं होती। जो आम को ही नहीं जानता वह कभी भी यह प्रश्न नहीं कर सकता कि वे कितने प्रकार के होते हैं। इसीलिए सृष्टि प्रकरण में प्रथम सामान्य रूप से यह कह दिया हैं कि :
मांवित्तास्य सर्वस्यस्रष्टारं द्विजसत्तामा:। 1 अ., 33, म.।
अर्थात् ”मुझे इस सम्पूर्ण सृष्टि का कर्ता जानो।” फिर उसी बात को विशेष रूप से कहने लगे कि ‘अहं प्रजा: सिसृक्षुस्तु’ इत्यादि। अर्थात् ‘मैं सृष्टि की इच्छा से’ इत्यादि। इसी प्रकार से न्याय आदि दर्शनों में प्रथम द्रव्य, गुण आदि पदार्थों को सामान्य रूप से कहकर फिर द्रव्य आदि के विशेष पृथ्वी और जल आदि को कहा हैं, न कि प्रथम सामान्यतया द्रव्य कहने से पृथ्वी आदि से भिन्न ही कोई वस्तु समझी जाती हैं।
दूसरी बात यह हैं कि अध्यापन आदि आपद्धर्म हैं। क्योंकि मनुस्मृति भर में दो ही जगह इनके नाम आये हैं, प्रथम और दशम अध्यायों में। उनमें भी प्रथम अध्याय में तो उनके करने की आज्ञा नहीं हैं, किन्तु उत्पत्ति प्रकरण होने से उनकी उत्पत्ति मात्र लिख दी गयी हैं। इसीलिए आज्ञावाचक शब्द का प्रयोग भी नहीं हैं, किन्तु केवल उनको उत्पन्न कर दिया ऐसा लिखा हैं। जैसा कि :
अध्यापनमध्यायनं याजनं यजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥ 1। 8॥
अर्थात् ‘अध्यापन आदि षट्कर्मों को उत्पन्न कर दिया।’ यही बात इस श्लोक की टीका में कुल्लूकभट्ट ने भी लिखी हैं, जैसा कि-
अध्यापनादीनामिह सृष्टिप्रकरणेसृष्टिविशेषतया
भिधानं विधिस्तेषामुत्तारत्रा भविष्यति॥
अर्थात् ‘इस सृष्टि प्रकरण में सृष्टि विशेष होने से ही अध्यापन आदि का कथन किया गया हैं, उनके करने की विधि तो आगे चलकर दसवें अध्याय में होगी। पुन: दशम अध्याय आपद्धर्म प्रकरण में इनके नाम लिये हैं और वहाँ पूर्व के ही श्लोक में आज्ञा दे दी हैं कि
ते सम्यगुपजीवेयु: षट्कर्माणि यथाक्रमम्। 10। 74।
अर्थात् ‘वे ब्राह्मण आगे कहे हुए षट्कर्मों द्वारा जीवें। तदनन्तर 75वें श्लोक में उन कर्मों के गिना लेने पर जब यह शंका हुई कि यज्ञ, अध्यायन और दान ये तीन क्यों कर जीविकायें हो सकती हैं? क्या इन्हें भी आपत्ति काल में ही करना चाहिए? तो ‘षण्णांतुकर्मणामस्य’ इस 76वें श्लोक में दिखला दिया कि तीन ही कर्म जीविकाएँ हैं और उन्हें ही आपत्काल में करना चाहिए। शेष तीन तो धर्मार्थक कर्म नित्य के हैं (जैसा प्रथम ही कह चुके हैं)। परन्तु जबकि उत्पत्ति प्रकरण में इन छहों को साथ ही इसी श्लोक में पढ़ दिया था, अत: उसी श्लोक को यहाँ भी पढ़ मात्र दिया हैं, न कि छहों को ही आपत्तिकाल में ही करने में तात्पर्य हैं। इसके अतिरिक्त चौथे ही अध्याय में मनु भगवान् लिखते हैं कि :
राजतो धनमन्विच्छेत् संसीदन् स्नातक: क्षुधा।
याज्यान्तेवासिनोर्वापि न त्वन्यत इतिस्थिति:॥ 33॥
अर्थ यह हैं कि ”जब ब्राह्मण क्षुधातुर हो तभी राजा के धन का प्रतिग्रह करे अथवा पढ़ा और यज्ञ कराकर जीविका (धनप्राप्ति) क़रे और आपत्तिकाल में भी जब तक इन तीन उपायों से धन प्राप्त कर सके तब तक अन्यों से न करे।” यद्यपि चतुर्थ अध्याय आप धर्मों का प्रकरण नहीं हैं, तथापि इस श्लोक का तो स्पष्ट रूप से ही अर्थ हैं, और यह स्नातक के व्रत का प्रकरण था, इसीलिए व्रत के अन्तर्गत होने से यह बात भी यहाँ कहनी पड़ी। इसीलिए अगले श्लोक में स्पष्ट कह देते हैं कि यह आपद्धर्म हैं। क्योंकि लिखते हैं कि :
न सीदेत् स्नातको विप्र: क्षुधा शक्त: कथंचन।
न जीणमलवद्वासा भवेच्च विभवे सति॥ 34॥
अर्थात् ”जब तक सामर्थ्य रहे तब तक गृहस्थ ब्राह्मण भूखों न मरे और धन रहने पर पुराने एवं मैले वस्त्रा न पहने।” इससे तो स्पष्ट ही हैं कि तभी भूखों मरेगा जब कोई दूसरा उपाय न हो और जब यह बात हुई तो उसके ऊपर आपत्ति आ गयी। इसलिए उस दशा में याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह से जीविका करेगा। इसी तरह जब तक इन तीनों उपायों से धन मिलेगा तब तक और उपाय न करेगा। परन्तु इनके भी न होने पर दशम अध्याय में लिख दिया हैं कि ‘सर्वत: प्रतिग्रह्णीयात्’ अर्थात् ‘सभी से प्रतिग्रह करे’ और क्षत्रिय एवं वैश्य कर्मों को भी करने की आज्ञा दे दी गयी हैं। इसीलिए वहाँ पर जो अन्य का निषेध किया हंर वह तीन उपायों के होने की दशा में हैं, न कि सदा के लिए। अत: ‘सर्वत: प्रतिगृह्णीयात्’ के साथ इसका कोई भी विरोध नहीं हैं।
इसके अतिरिक्त अध्याय के अन्त में भी लिखा हैं कि :
एते चतुर्णां वर्णानामापद्धर्मा: प्रकीर्त्तिता:।
यान् सम्यगनुतिष्ठन्तो व्रजन्ति परमां गतिम्॥ 10। 130
जिसका तात्पर्य यह हैं कि ”इस अध्याय में पूर्वोक्त चारों वर्णों के आपद्धर्म कहे गये हैं, जिनको अच्छी तरह से करने वाले ज्ञान द्वारा मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।” यदि मनुजी को यह विदित होता कि अध्यापन आदि अनापत्तिकाल के धर्म हैं, तो चौथे अध्याय में इनके नाम क्यों न लेते? जैसा कि कृषि आदि को कहा हैं। इससे तो स्पष्ट ही हैं कि वे धर्म ब्राह्मणों के लिए आपत्तिकाल में ही हो सकते हैं। हाँ, जिन क्षत्रिय आदि के किसी भी धर्म को प्रथम नहीं कहा हैं उनके प्रजापालनादि धर्म जो दशम अध्याय में कहे गये हैं उनको यदि अनापत्तिकालिक मान ले और उनका यह कथन प्रसंगवश कहे तो उचित भी हैं। परन्तु ब्राह्मण धर्मों के विषय में यह बात नितान्त असम्भव हैं, क्योंकि उनके मुख्य कर्मों को चौथे अध्याय में ही कह चुके हैं। यदि प्रसंगवश यहाँ कहना भी माने तो फिर सभी को क्यों न गिनाया? किन्तु जिन्हें कह चुके थे उन्हें कहा ही नहीं, बल्कि विलक्षण कर्मों को ही कहा। इससे इनके आपद्धर्म होने में कोई भी आपत्ति नहीं की जा सकती। याज्ञवल्क्यजी भी इस विषय में उदासीन हैं। क्योंकि उन्होंने सामान्यत: इन धर्मों को गिना भर दिया हैं, उन्हें आपद् या अनापद्धर्म नहीं कहा हैं। प्रत्युत प्रायश्चित्तध्याय के 35वें श्लोक में लिखते हैं कि :
क्षात्रेण कर्मणा जीवेद्विशां वाप्यापदिद्विज:।
अर्थात् ”आपत्तिकाल में ब्राह्मण क्षत्रियों और वैश्यों के कर्मों द्वारा भी जीयें। इस जगह ‘भी’ के अर्थ में जो ‘अपि’ शब्द हैं उससे अनुक्त याजन आदि का भी समुच्चय उनको इष्ट हैं, जैसी कि रीति स्मृतियों में सर्वत्रा ही हैं। अत: जब तक कृषि आदि हो सके तब तक याजन आदि से जीविका ब्राह्मण न करे। क्योंकि अनापत्तिकाल में आपत्तिकालिक जीविका का निषेध मनुजी ने 11वें अध्याय के 28 और 30 श्लोकों में किया हैं। यदि हम ‘तुष्यतु दुर्जन’ न्याय से यह भी मान ले कि याजन आदि को आपत्तिकाल से भिन्न काल में भी कर सकते हैं, तो भी कृषि वाणिज्यादि की तुलना ये कभी कर ही नहीं सकते। क्योंकि इनका निषेध मनु आदि महर्षि बहुत ही करते हैं, जैसा कि उनके ‘अतपास्त्वनधीयान:’ और ‘प्रतिग्रह समर्थोपि’ इत्यादि श्लोकों का अर्थ करते हुए दिखला चुके हैं।”
‘प्रतिग्रह समर्थोपि’ इस श्लोक में एक और विचित्रता हैं। वह यह कि जो प्रतिग्रह में समर्थ भी हो यह भी उसका नाम तक न ले, इस कथन से स्पष्ट हैं कि प्रतिग्रहादि का करना आवश्यक नहीं हैं। क्योंकि आवश्यक और नित्य कर्मों में सामर्थ्य नहीं देखते, बल्कि उनके न करने से पातक होता हैं। हाँ, काम्य कर्मों में सामर्थ्य की आवश्यकता हैं जैसा कि प्रथम लिख चुके हैं। इसलिए प्रतिग्रह करना शास्त्र प्रेरित न होकर अपनी इच्छानुसार हैं, चाहे करे या न करे। परन्तु यदि करे तो उससे होने वाले पापों के प्रायश्चित की सामर्थ्य होनी चाहिए। इसलिए जो इस प्रकार की तप आदि सामर्थ्य से हीन हो वह तो इच्छा होने पर भी नहीं कर सकता। सारांश यह हैं कि ‘प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम्’ अर्थात् कीचड़ में पाँव डालकर धोने से उसका न डालना ही उत्तम हैं, ”इस न्यायानुसार प्रतिग्रहादि का न करना ही अच्छा हैं। अतएव पार्थ सारथि मिश्रजी ने कुमारिल स्वामी रचित मीमांसा दर्शन वाक्तविक की टुप्टीका की टीका तन्त्ररत्न के चतुर्थाध्याय के द्वितीयाधिकरण के ‘यस्मिन्प्रीति: पुरुषस्य तस्य लिप्सार्थलक्षणा’ इस सूत्र में लिखा हैं कि, किमिदानीं प्रतिग्रह: प्रत्यवायक्षयकर:? यद्ये यमजस्त्रामेव यथाशक्ति प्रतिग्रहीतव्यं स्यात्, तन्न, प्रतिग्रहसमर्थोपि प्रसंगं तत्रा वर्जयेदितिप्रतिषेधात्, तेन दायशिलो×छायाचिताभावे यथा कथंचिद् द्रव्योपादानेवश्वम्भाविनि प्राप्ते पतिग्रहादिनैव कुर्वतोदृष्टसिद्धिरिति कल्प्यते।”
जिसका भावार्थ यह हैं, ”इस ग्रन्थ में प्रथम यह विचार हो चुका हैं कि जैसे सन्ध्यादि के न करने से जो पाप होते हैं वे उनके करने से होते ही नहीं हैं। उसी तरह से अन्य अविहित उपायों से द्रव्यार्जन में जो पाप हो सकते हैं वे प्रतिग्रहादि करने से उत्पन्न ही नहीं होते। इसी पर यह शंका उठी कि तो क्या अब प्रतिग्रह को पाप का नाशक समझना चाहिए? यदि ऐसी बात हो तो नित्य जहाँ तक हो सके अवश्य प्रतिग्रह करना चाहिए। इसका उत्तर देते हैं कि यह बात नहीं हैं, क्योंकि ‘प्रतिग्रह समर्थोपि’ इस वाक्य द्वारा मनुजी ने उसका निषेध किया हैं। इसलिए पूर्व कथन का तात्पर्य यह हैं कि जब ऐसी आपत्ति का समय आ जाये कि दायभाग (पितादि की जमींदारी या धन आदि) शिल, उ×छ और अयाचितादि कोई भी उपाय धनप्राप्ति के हो न सके और किसी भी प्रकार से धानार्जन अत्यन्तावश्क हो तो यदि प्रतिग्रहादि द्वारा प्राप्त किया जाये तभी उससे यज्ञादि करने से अदृष्ट (पुण्य) हो सकता हैं।” क्या इस कथन से यह स्पष्ट नहीं हैं कि प्रतिग्रहादि नहीं करने चाहिए, क्योंकि वे आपत्तिकाल के धर्म हैं इत्यादि? इस विषय में गौतमस्मृति और मितक्षराकार की सम्मति प्रथम ही दिखला चुके हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति आचाराध्याय में लिखा हैं कि :
विद्यातपोभ्यां हीनेन नतु ग्राह्य: प्रतिग्रह:।
गृह्णन्प्रदातारमधो नयत्यात्मानमेव च॥ 202॥
प्रतिग्रहसमर्थोपि नादत्ता य: प्रतिग्रहम्।
ये लोकादानशीलानांसतानाप्नोतिपुष्कलान्॥ 213॥
ये लोकादानशीलानांसतानाप्नोतिपुष्कलान्॥ 213॥
अर्थ यह हैं कि ”जो विद्या और तप रहित हो वह कभी न प्रतिग्रह करे, क्योंकि ऐसा करने से अपने आप और दाता दोनों को नरक में ले जाता हैं। जो प्रतिग्रह करने में सामर्थ्यवान होकर भी उसे नहीं करता वह उन बड़े-बड़े लोकों में जाता हैं जिनमें दान वाले जाया करते हैं।” इसका तात्पर्य स्पष्ट ही हैं। लघुविष्णुस्मृति में लिखा हैं कि :
प्रतिग्रहं न गृहृणीयात्परेषांकिंचिदात्मवान्।
दाता चैव भवेन्नित्यं श्रद्दधान: प्रियंवद:॥ 8। अ. 3॥
अर्थात् ”विचारशील और आत्मज्ञानी किसी का प्रतिग्रह न करे और प्रिय वचन तथा श्रध्दापूर्वक दूसरों को नित्य ही कुछ दे।” अत्रिस्मृति में भी यही लिखा हैं कि:
पावका इव दीपयन्ते जपहोमैर्द्विजोत्तामा:।
प्रतिग्रहेण नश्यन्ति वारिणा इव पावक:॥ 141॥
तान्प्रतिग्रहजान्दोषाप्राणायामैद्विजोत्तामा:।
नाशयन्ति हि विद्वांसो वायुर्मेघानिबाम्बरे॥ 142॥
नाशयन्ति हि विद्वांसो वायुर्मेघानिबाम्बरे॥ 142॥
भावार्थ यह हैं कि श्रेष्ठ ब्राह्मण जप और अग्निहोत्रादि करने से अग्निवत् तेजस्वी हुआ करते हैं। परन्तु प्रतिग्रह से ऐसे निस्तेज हो जाते हैं जैसे पानी से अग्नि। इसलिए कदाचित् प्रतिग्रह कर लेने से जो पाप हो जाते हैं उनका नाश प्राणायाम द्वारा विद्वान् ब्राह्मण ऐसे ही कर डालते हैं जैसे प्रचण्ड वायु आकाश में रहने वाले बादलों का नाश कर देता हैं। श्रीमद्भागवत में भी प्रसंगवश 11वें स्कन्धा के 17वें अध्याय में लिखा हैं कि :
प्रतिग्रहं मन्यमानस्तपस्तेजोयशोनुदम्।
अन्याभ्यामेवजीवेतशिलैर्वादोषदृक्तयो:॥ 41॥
सीदन्विप्रोवणिग्वृत्तयापण्यैरेवापदं तरेत्।
खड्गेनवापदामन्तो नश्ववृत्तया कदाचन॥ 47॥
खड्गेनवापदामन्तो नश्ववृत्तया कदाचन॥ 47॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ”आपत्तिकाल में भी प्रतिग्रह को तप, तेज और यश का नाशक समझ ब्राह्मण याजन और अध्यापन से ही जीविका करे, अथवा उनको भी दुष्ट समझकर शिल आदि वृत्तियों से ही शरीर यात्रा करे और वाण्श्निाज्यवृत्ति से पदार्थों को बेचकर क्षत्रिय धर्म से तलवार लेकर अर्थात् युद्ध करके भी जीविका करे, परन्तु नौकरी कभी न करें।” जब विश्वरूप को देवताओं ने बृहस्पति के रुष्ट होने पर अपनी पुरोहिती करने को कहा तो उन्होंने उसकी बहुत ही निन्दा की और कहा कि :
अकिंचनानां हि धनं शिलो×छनं तेनेह नरिर्वत्तात साधुसत्क्रिय:। कथं विगर्ह्यं तु करोम्यधीश्वरा: पौराधासं हृष्यति येन दुर्मति:॥ श्रीमद्भागवत। 6। 7। 36
अर्थ यह हैं कि ”हे देवगण! दरिद्र ब्राह्मण के भी धन शिल और उ×छादि ही हैं, जिनसे मैं अच्छी तरह से अपने शरीर का निर्वाह करता हूँ, इसलिए पुरोहिती क्यों करूँ? क्योंकि उससे तो केवल मूर्ख लोग ही प्रसन्न होते हैं। अध्यात्मरामायण के अयोध्याकाण्ड में वसिष्ठजी ने रामजी के प्रति कहा हैं कि ‘पौरोहित्यमहं जानेविगर्ह्य द्ष्यजीवनम्।’ 2। 28। जिसका अर्थ यह हैं कि मैं पुरोहिती को धर्मशास्त्रनिन्दित और जीवन को दूषित करने वाली समझता हूँ।” जिसको गोस्वामी तुलसीदासजी ने स्पष्ट कर दिया हैं कि उपरोहिती कर्म अति मन्दा। वेद पुराण स्मृति कर निन्दा॥ वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड के छठें सर्ग में अयोध्यावासी तथा रामराज्यवासी ब्राह्मणों के आचारों का वर्णन करते हुए महर्षि लिखते हैं कि :
स्वकर्मनिरतानित्यं ब्राह्मणाविजितेन्द्रिया:।
दानाध्यायन शीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ”जितेन्द्रिय ब्राह्मण लोग अपने-अपने धर्मों में सदा स्थित होकर दान और अध्यायनादि करते और प्रतिग्रह नहीं लेते हैं। इसीलिए मनुजी ने दशमध्याय में लिखा हैं कि :
प्रतिग्रहाद्याजनाद्वा तथैवाध्यपनादपि।
प्रतिग्रह: प्रत्यवर: प्रेत्य विप्रस्य गर्वित:॥ 109॥
जपहोमैरपैत्येनो याजनाध्यापनै: कृतम्।
प्रतिग्रहनिमित्तां तु त्यागेन तपसैव च॥ 111॥
प्रतिग्रहनिमित्तां तु त्यागेन तपसैव च॥ 111॥
अर्थ यह हैं कि इन ”याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह तीनों में से प्रतिग्रह अत्यन्त ही निन्दित और परलोक में ब्राह्मण के लिए दु:खद हैं। याजन और अध्यापन से जो पाप होते हैं वे जप और अग्निहोत्रदि द्वारा निवृत्त हो जाते हैं। परन्तु प्रतिग्रह के पाप तो उस द्रव्य के त्यागने और कृ×छादिरूप तप करने से ही निवृत्त होते हैं।” इससे यह स्पष्ट हैं कि यदि सामान्य रीति से ये शास्त्रीय धर्म होते तो जैसे शिल, उ×छादि करने से पाप नहीं लिखा, वैसे इनके करने से भी पाप न लिखते; क्योंकि शास्त्रविहित कार्य करने में पाप हो ही नहीं सकते। यदि कोई ऐसा अनुचित आग्रह करे कि सामान्य प्रतिग्रह से होने वाले पापों का वर्णन इन श्लोकों में नहीं हैं, किन्तु निन्दित प्रतिग्रह की ही हीनता यहाँ दिखलाई गयी हैं, तो उसको एक तो यह विचारना चाहिए कि इन श्लोकों में प्रतिग्रह मात्र लिखा हैं। दूसरे जब मनुजी यह भी प्रथम ही इसी अध्याय में कह चुके हैं कि ‘विशुध्दाच्च प्रतिग्रह:।’ अर्थात् शुद्ध प्रतिग्रह करना चाहिए। तो फिर अनुचित प्रतिग्रह का प्रसंग ही क्या हैं? और ‘प्रतिग्रहसमर्थोपि’ इत्यादि वाक्यों द्वारा सभी प्रतिग्रहों का निषेध किया हैं, जैसा कि अभी पार्थसारथि मिश्रादि की सम्मति इस विषय में दिखला चुके हैं। वाल्मीकि रामायण में जो उस समय के ब्राह्मणों का आचार दिखलाया गया हैं वहाँ जब यह लिखा हैं कि वे अपने कर्मों में स्थित हैं, तो फिर असत् प्रतिग्रह कैसे कर सकते थे? अत: सामान्य रूप से सभी प्रकार के प्रतिग्रह वे लोग भी नहीं करते थे। मत्स्यपुराण के 111वें अध्याय में युधिष्ठिर के प्रति कृष्णजी का उपदेश हैं कि :
प्रतिग्रहादुपावृत्ता: सन्तुष्टो नियत: शुचि:।
अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते॥ 10॥
अर्थात् ”जो प्रतिग्रह से रहित, सन्तोषी नियमी, पवित्र और अभिमानशून्य हो वह सम्पूर्ण तीर्थ स्नानादि के फलों को प्राप्त कर लेता हैं।” स्कन्दपुराणान्तर्गत ब्रह्मखण्ड के धर्मारण्यमहात्म्य प्रकरण में वाडवों (ब्राह्मणों) के आचार इस प्रकार से वर्णित हैं:
चा. उ.।
पूर्वंहिवृत्तिमस्माकंरामोवैदत्तावान् द्विजा:।
चातुर्विद्या महासत्त्वा: स्वधर्मप्रतिपालका:॥ 141॥
याजनाध्यापनायुक्ता: काजेशेन विनिर्मिता:।
दानं दत्त्वा तु रामेण उक्तं हि भवतां पुन:॥ 142॥
स्थानं त्यक्वा न गंतव्यमितं नियम: कृत:॥ 149॥
त्यक्तप्रतिग्रहा: शान्ता: सत्यव्रतपरायणा।
संध्यामुपासते नित्यं त्रिकालं चैकमानसा:॥ 150।36।
संध्यामुपासते नित्यं त्रिकालं चैकमानसा:॥ 150।36।
जिसका भावार्थ यह हैं कि ”उन्हीं ब्राह्मणों में से चारों वेदों के ज्ञाता एक ने कहा कि हे ब्राह्मणो! रामजी ने प्रथम ही हम लोगों के लिए वृत्ति नियत कर दी हैं और हम लोग चारों वेदों के ज्ञाता और अपने धर्म के पालक हैं। याजन और अध्यापन नहीं करते और हम लोगों को यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने स्थापित किया हैं इत्यादि। ‘वहाँ रहने वाले वाडव प्रतिग्रहादि से रहित और शान्त थे और त्रिकाल सन्ध्या एकाग्रचित्ता होकर करते थे।”
यदि हम अध्यापनादि के स्वरूपों का विचार करते हैं तो उन ब्राह्मणों का इनसे पृथक् रहना और स्मृतियों के निषेध ये दोनों बहुत ही उचित प्रतीत होते हैं। क्योंकि जो दान देने वाला होता हैं वह, जैसे बच्चे को गुड़ खिलाकर कर्णच्छेद कराते हैं वैसे ही, दान द्वारा अपने पातक को द्वितीय व्यक्ति के ऊपर रखता हैं। या यों कहना चाहिए कि जैसे तृण खिलाकर गौ दुही जाती हैं वैसे ही वह दान द्वारा ब्राह्मण का तप दुह लेता हैं। क्योंकि जैसे प्रज्वलित अग्नि तृण का नाश कर आप शान्त होती हैं वैसे ही ब्राह्मण की तपरूप दाता के पातक को भस्मीभूत करके आप भी समाप्त हो जाती हैं। इसलिए यदि दानग्राही तपस्वी न होगा तो दाता का दान व्यर्थ हो जायेगा और ग्रहण करने वाला तो पतित होगा ही, जैसा कि प्रथम मन्वादि के वाक्यों द्वारा दिखला चुके हैं। यदि दान अपने पातक को दूसरे के सिर मढ़ने के लिए नहीं होता हैं तो और कौन किस काम के लिए होता हैं? यदि ऐसा नहीं, तो ब्रह्महत्यादि का प्रतिग्रह करने में लोग डरते क्यों हैं? और जब अन्न पर ही बुद्धि निर्भर हैं, तो फिर जैसा अन्न होगा वैसी ही बुद्धि बनेगी, क्योंकि छान्दोग्योपनिषद् के षष्ठ प्रपाठक में लिखा हैं कि ‘अन्नमशितं त्रोधा विधीयते यदणिष्ठं तन्मनो भवति’ अर्थात् ‘भोजन किये गये अन्न के स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर तीन अंशों में से सूक्ष्मतर अंश से मन (बुद्धि) बनता हैं। इसीलिए महाभारतादि ग्रन्थों में चोरी का अन्न भक्षण करने से महात्माओं की भी बुद्धियों के विकृत हो जाने का वर्णन प्राय: आया करता हैं। इसीलिए शिष्य अथवा यज्ञकर्ता अध्यापन और याजन के बदले जो दक्षिणा देगा वह यद्यपि मजदूरी ठहरी तथापि अपनी बुद्धि पर उसका प्रभाव अवश्य आयेगा। वह अन्न या द्रव्य उसने उत्तम रीति से ही कमाया हैं, यह कभी हो ही नहीं सकता। क्योंकि मनुष्य की स्वभाव सिद्ध विपरीत प्रवृत्तियों का बदल जाना एकदम असम्भव हैं। इसीलिए मनुजी ने श्राद्ध प्रकरण में :
याजयन्तिचयेपूगांस्तांश्च श्राद्धेनभोजयेत्। 3। 151।
भृतकाध्यापकोयश्च भृतकाध्यापितस्तथा॥ 3। 156।
अर्थात् ”जो बहुतों के यज्ञ कराने वाले, वेतन लेकर पढ़ाने और पढ़ने वाले हैं उनको श्राद्ध में न खिलावें।” इन वाक्यों द्वारा ऐसों को श्राद्ध में निन्दित ठहराया हैं। ऐसे ही याज्ञवल्क्यादि ने भी कहा हैं। इसीलिए याजनादि अगतिक गति और आपद्धर्म कहलाते हैं जिनका वाडवों (ब्राह्मणों) ने साम्प्रतिक पश्चिम, त्यागी, महियाल, भूमिहार ब्राह्मणों की तरह सर्वथा परित्याग या निरादर किया था। क्योंकि जैसा कि आगे विदित होगा कि वे भी इन्हीं लोगों की तरह बड़े-बड़े भूम्यधिपति (जमींदार)थे।
हाँ, इस बात में कोई विवाद या शंका नहीं हैं कि याजन और अध्यापन ये दोनों, जैसा कि प्रथम ‘अध्यापनं च त्रिविधां’ इस श्लोक में कह चुके हैं, यदि केवल परोपकारबुद्धि से किये जाये जैसा कि प्राचीन ऋषि, महर्षि दयार्द्रचित्ता होकर किया करते थे और किसी-किसी स्थान में आज भी देख सकते हैं, तो बहुत ही उत्तम और अवश्य कर्त्तव्य हैं, जिन्हें अयाचक और याचक दोनों प्रकार के ब्राह्मण करें और तद्द्वारा प्राप्त दक्षिणा न लेकर उसे भी यदि परोपकार और अनाथपालनादि में व्यय करा दिया जाये और सर्वसाधारण का जिसमें उपकार हो सके ऐसे कार्य उससे करवा दिये जाये, जैसे कि ब्रह्मचर्याश्रम, गोशालाएँ, धर्मशालाएँ और औषधालय आदि तो दक्षिणा सहित होने से यज्ञादि भी पूर्ण हो जाये, क्योंकि सम्भवत: लोगों की यह धारणा हो कि भगवान् कृष्ण ने गीता में ‘मन्त्रहीनमदक्षिणम्’ अर्थात् ”मन्त्र और दक्षिणाहीन यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं” इत्यादि वाक्यों द्वारा दक्षिणा बिना सद्यज्ञसिद्धि का निषेध किया हैं, तो वह भी धारणा पूरी हो जाये और कार्य भी चला जाये, जिससे करने वाले निष्कलंक ही रह जाये।
वस्तुत: तो गीता में जो यज्ञों की दक्षिणा का वर्णन हैं उसका तात्पर्य यह हैं कि सामान्य रीति से यज्ञादि में ऋत्विज वगैरह दक्षिणा ही के लोभ से आते हैं। क्योंकि यदि यह बात न होती तो मीमांसा दर्शन के प्रथमाध्याय के तृतीय पाद के तृतीय अधिकरण में ‘हेतुदर्शनाच्च’ इस सूत्रा पर भाष्यकार श्रीशबरस्वामी तथा माधावाचार्य ‘वैसर्जनहोमीयं वासोधवर्युर्गृह्णति’ अर्थात् ”वैसर्जनहोम सम्बन्धी वस्त्रा को अधवर्यु नाम का ऋत्विक् लेता हैं।” इस स्मृति को अप्रामाणिक ठहराते हुए यह कभी न कहते कि :
कदाचित्कश्चिदधवर्युर्लोभादेतद्वासा जग्राह, तन्मूलैवैपास्मृतिरित्यपि कल्पना संभवति
दृष्टानुसारिणी चैषा कल्पना, दक्षिणयापरिक्रीतानामृत्विजां लोभदर्शनात्॥
अर्थात् कभी किसी अधवर्यु ने लोभ से इस वस्त्र को ले लिया होगा, तन्मूलक ही यह स्मृति भी बन गयी होगी यह भी कल्पना हो सकती हैं, और यह कल्पना प्रत्पक्षानुसारिणी भी हैं। क्योंकि दक्षिणा देकर लाये गये ऋत्विजों को लोभ होता रहता हैं। और इस अधिकरण की आवश्यकता भी न होती। इसलिए यदि यजमान के लिए यज्ञ में दक्षिणा की आज्ञा न हो तो बेचारों की मजदूरी ही मारी जाये और धर्म के बदले वहाँ अधर्म ही होने लग जाये। इसीलिए यज्ञ प्रकरण में सर्वत्रा ही दक्षिणा पर जोर दिया गया हैं। परन्तु यदि यज्ञ कराने वाला धर्म प्रिय और निर्लोभ हो, जैसाकि पूर्व कह चुके हैं, तो उनके लिए दक्षिणा की कोई आवश्यकता नहीं हैं। हाँ, यज्ञ कराने वाला दक्षिणार्थ संगृहीत द्रव्य का उन ऋत्विजों की अनुमति से सद्वयय कर सकता हैं। इनसे यह शंका भी निर्मूल हो गयी कि यदि याजन आदि छोड़ दिये जाये तो फिर सब यज्ञ और अध्यायनादि का लोप ही हो जायेगा। जो कथा स्कन्द पुराण के नाम से अनादि पुरवासी ब्राह्मणों के विषय में ‘ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड’ नामक ग्रन्थ में दी गयी हैं और जिसकी सविस्तार समालोचना प्रसंगवश यदि हो सका तो आगे करेंगे, वह भी इस बात को पुष्ट कर रही हैं कि यज्ञ में दक्षिणादि लेने में विचारशील ब्राह्मणों की प्रवृत्ति न करते थे। अतएव यद्यपि दूसरे बहुत से ब्राह्मणों ने दक्षिणा सहर्ष स्वीकार की, परन्तु वाडवों (ब्राह्मणों) ने उससे साफ इन्कार किया।
इस स्थान पर इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक होगा कि जो लोग इस बात के कहने वाले और साथ ही पाण्डित्य का दम भरने वाले हैं कि यदि सभी ब्राह्मण प्रतिग्रह से रहित हो जाये तो फिर दान लेने वाला कौन होगा? फलत: दान रूप धर्म का ही लोप हो जायेगा। उनको यह विचारना चाहिए कि प्रथमत: तो यह कहा ही नहीं जाता हैं कि कोई भी दान लेगा ही नहीं, बल्कि हमारा तो यह कथन हैं कि जो विद्या और तपोबल सम्पन्न होने से दान लेने में समर्थ हो वह अपनी इच्छानुसार उसे ले सकता हैं, न कि गायत्री तक का भी नाम न जानकर धर्म भ्रष्ट और पतित शूद्रादि के प्रतिग्रह से ही पेट पालने वाला दान का कभी भी अधिकारी हो सकता हैं। हम केवल यही चाहते हैं कि पात्रपात्रा के विचार बिना ही जैसी अन्धापरम्परा आज चल पड़ी हैं वह एकदम शास्त्रविरुद्ध होने से सर्वथा अनादरणीय हैं। दूसरी बात यह हैं कि केवल द्रव्य और अन्नादि के ही दान तो शास्त्रों में हैं नहीं, जिससे दानग्राही के न रहने से दान क्रिया का लोप हो जायेगा। क्या विद्या और सदुपदेशादि के दानों का लोप होने का भी कोई भय हो सकता हैं? तीसरी बात यह हैं कि यदि दान के योग्य ब्राह्मण न हो तो उन्हें लेने का अधिकार क्या बलात् हो जायेगा? ऐसी दशा में दान के पदार्थों को अन्य सदुपयोगों में लगा सकते हैं जिनकी नितान्त आवश्यकता हैं। देखते हैं कि लोग गोशालाएँ और ब्रह्मचर्याश्रम के लिए चिल्लाते रह जाते हैं, पर कुछ होता नहीं। यदि दान के सभी पदार्थ ऐसे कार्यों में लगा दिये जाये तो क्या कोई अनुचित कार्य होगा? क्या इससे भी बढ़कर कोई दान के लिए अवसर मिल सकता हैं? मैं तो समझता हूँ कि जैसे अयाचक ब्राह्मण समाज के लोग दान ग्रहण के निकट उसे निन्दित समझ कर नहीं जाते और शास्त्रोक्त कृष्यादि द्वारा अपनी जीविका करते हैं, वैसे ही यदि इतर (याचक) ब्राह्मण भी (क्योंकि वे भी तो कृषि इत्यादि करते ही हैं) करने लग जाये तो भारतवर्ष की गोहत्या बिना प्रयत्न उसी द्रव्य से बन्द हो जाये। जिन द्रव्यों से वे अपना पेट पालते हैं उन्हीं से इस पुण्यभूमि में सरस्वती की पावन धारा अनवरत प्रवाहित होकर इस भूमि के सब कल्मषों को दूर कर दे और गोरक्षा द्वारा देश की निर्धनता और व्याधियों का भी विलय हो जाये। इसीलिए अग्निपुराण में लिखा हैं कि :
दैंवे कर्मणि पित्रये च ब्राह्मणो नैव लभ्यते।
तदन्नं तु गवे दद्यादथवा निक्षिपेज्जले॥
अर्थात् ”यदि देव और पितृ कर्म में योग्य ब्राह्मण न मिलें तो उस अन्न का द्रव्य गो निमित्त प्रदान कर दे, अथवा जल में फेंक दे।” किं बहुना, जिस दानग्रहण से स्कन्दपुराण के ब्रह्मोत्तर खण्ड के छठे अध्याय में किसी ब्रह्मणी के पुत्र की दरिद्रता शाण्डिल्य ऋषि ने दिखलाई हैं, जैसा कि :
एष ते तनय: पूर्वजन्मनि ब्राह्मणोत्ताम:।
प्रतिग्रहैंर्वयो निन्ये न यज्ञाद्यै: सुकर्मभि:॥ 80॥
अतो दारिद्रयमानपन्न: पुत्रस्ते द्विजभामिनि।
तद्दोषपरिहारार्थ शरणं यातु शंकरम्॥ 81॥
तद्दोषपरिहारार्थ शरणं यातु शंकरम्॥ 81॥
अर्थ यह हैं कि ”महर्षि शाण्डिल्य ने उस ब्राह्मणी से कहा कि हे द्विजभामिनि! यह तेरा पुत्र पूर्व जन्म में बहुत उत्तम ब्राह्मण था, परन्तु यज्ञादि न करके केवल प्रतिग्रह से ही जन्म बिताता था, इसलिए इस जन्म से दरिद्र हो गया हैं। अत: इस दोष की निवृत्ति के लिए महादेवजी की शरण जाये।” और जिस प्रतिग्रह से अग्निहोत्र ब्राह्मण को भी श्मशान काष्ठ तुल्य अपवित्र मत्स्यपुराण के 204 अध्याय में ठहराया हैं, जैसा कि :
अहिताग्निर्द्विजो यस्तु तद्देयं तस्य पार्थिव:॥ 3॥
तत्प्रतिग्रहविद्विद्वानाहिताग्निर्द्विजोत्ताम:।
स्नातो वस्त्रायुगाच्छन्न: स्वशक्त्या चाप्यलंकृत:॥ 20॥
अनेन विधिना दत्वा यथावत्कृष्णमार्गकम्।
न स्पृश्योसौ द्विजो राजन् चितियूपसमो हि स:॥ 23॥
तं दाने श्राद्धकाले च दूरत: परिवर्जयेत्।
स्वगृहात्प्रेष्य तं विप्रं मंगलस्नानमाचरेत्॥ 24॥
स्वगृहात्प्रेष्य तं विप्रं मंगलस्नानमाचरेत्॥ 24॥
भावार्थ यह हैं कि ”हे राजन! जो ब्राह्मण अग्निहोत्री हो उसे ही कृष्ण मृग का चर्म देना चाहिए। प्रतिग्रह को जाननेवाला वह विद्वान्, अग्निहोत्री ब्राह्मण स्नान करके दो वस्त्रों के साथ-साथ यथाशक्ति भूषण धारण किया हो। इस प्रकार से उसको विधिवत् कृष्ण मृगचर्म देकर उसे स्पर्श न करे क्योंकि वह उस समय चिता के काष्ठ के सदृश हो जाता हैं। इसलिए उस ब्राह्मण को दान और श्राद्धकाल में दूर से ही त्याग दे और अपने घर से उसे बिदा करके मंगल स्नान करे।” ऐसे प्रतिग्रह से सर्वथा दूर रहकर कृषि वाणिज्यादि द्वारा जीवन बिताने में ही कल्याण हैं।
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(ग) कृषि- अब ब्राह्मण की प्रशस्त जीविका कृषि का विशेषरूप से विचार करते हैं क्योंकि आजकल अज्ञान, स्वार्थन्धाता और अकारण परद्वेष एवं परोत्कर्षा-सहिष्णुतामूलक बहुत सी कुशंकाएँ इस विषय में हुआ करती हैं। यह स्मरण रखना चाहिए कि कृषि-वाणिज्य और एकनिर्दिष्ट ब्याज पर रुपये देने ये तीनों अथवा प्रथम के दो ही दो प्रकार के होते हैं-(1) स्वयंकृत अर्थात् अपने हाथों से किये गये, और (2) अस्वयंकृत अर्थात् भृत्यादि अन्य पुरुष द्वारा कराये गये। जैसा दिखला चुके हैं, उनमें से प्रथम अर्थात् स्वयंकृत तो आपत्तिकाल में ब्राह्मण द्वारा किये जा सकते हैं। परन्तु क्षत्रियादि उन्हें अनापत्ति काल में भी कर सकते हैं। जिनका वर्णन ब्राह्मण के आपद्धर्म प्रकरण नामक मनुस्मृति के दशम अध्याय के 82, 83 और 84 श्लोकों में हैं। परन्तु दूसरे प्रकार के अर्थात् अस्वयंकृत कृषि आदि को ब्राह्मण अनापत्तिकाल में करे, जिनका वर्णन अनापत्कालिक ब्राह्मण धर्म प्रकरण नामक मनुस्मृति के चतुर्थाध्याय में किया गया हैं; जैसा कि प्रथम दिखला चुके हैं। इस विषय में गौतमस्मृति की सम्मति देते हुए कुल्लूकभट्ट मनुस्मृति के चतुर्थाध्याय के छठे श्लोक की टीका में लिखते हैं कि:
(ग) कृषि- अब ब्राह्मण की प्रशस्त जीविका कृषि का विशेषरूप से विचार करते हैं क्योंकि आजकल अज्ञान, स्वार्थन्धाता और अकारण परद्वेष एवं परोत्कर्षा-सहिष्णुतामूलक बहुत सी कुशंकाएँ इस विषय में हुआ करती हैं। यह स्मरण रखना चाहिए कि कृषि-वाणिज्य और एकनिर्दिष्ट ब्याज पर रुपये देने ये तीनों अथवा प्रथम के दो ही दो प्रकार के होते हैं-(1) स्वयंकृत अर्थात् अपने हाथों से किये गये, और (2) अस्वयंकृत अर्थात् भृत्यादि अन्य पुरुष द्वारा कराये गये। जैसा दिखला चुके हैं, उनमें से प्रथम अर्थात् स्वयंकृत तो आपत्तिकाल में ब्राह्मण द्वारा किये जा सकते हैं। परन्तु क्षत्रियादि उन्हें अनापत्ति काल में भी कर सकते हैं। जिनका वर्णन ब्राह्मण के आपद्धर्म प्रकरण नामक मनुस्मृति के दशम अध्याय के 82, 83 और 84 श्लोकों में हैं। परन्तु दूसरे प्रकार के अर्थात् अस्वयंकृत कृषि आदि को ब्राह्मण अनापत्तिकाल में करे, जिनका वर्णन अनापत्कालिक ब्राह्मण धर्म प्रकरण नामक मनुस्मृति के चतुर्थाध्याय में किया गया हैं; जैसा कि प्रथम दिखला चुके हैं। इस विषय में गौतमस्मृति की सम्मति देते हुए कुल्लूकभट्ट मनुस्मृति के चतुर्थाध्याय के छठे श्लोक की टीका में लिखते हैं कि:
तेनचैवापि जीव्यतइतिचशब्देनवाणिज्यसमशिष्टत्वात्कुसी दमपि गृह्यतेपूर्वश्लोकोक्ता कृषिरेतच्छलोकोक्ते च कृषिवाणिज्ये-अनापदीत्यनुवृत्तोरस्वयंकृतान्येतानिबोद्धव्यानि, यथाह गौतम: कृषिवाणिज्ये स्वयं चाकृते कुसीदं च॥
अर्थ यह हैं कि ”इस श्लोक में पठित ‘तेन चैव’ इस च शब्द से वाणिज्य के साथी सूद का समुच्चय होता हैं। परन्तु जबकि इन सभी श्लोकों में आदि के श्लोक से ‘अनापदि’ इस पद का सम्बन्ध हैं, जिसका तात्पर्य यह हैं कि ये जीविकाएँ अनापत्तिकालिक हैं। इसलिए पूर्व प्रदर्शित श्लोकोक्त कृषि और इस श्लोक में पठित वाणिज्य और वृद्धि (सूद) ये तीनों यहाँ पर अनापत्ति प्रकरण में अस्वयं कृत ही लिये जाते हैं, जैसा कि गौतमस्मृति में कहा हैं कि अस्वयंकृत कृषि, वाणिज्य और वृद्धि (सूद) भी ब्राह्मण के धर्म हैं।” इसलिए जहाँ कहीं भी ब्राह्मण के लिए कृषि का विधान हो और स्पष्ट लिखा न हो वहाँ अनापत्ति काल में अस्वयंकृत को ही जानना चाहिए, न कि स्वयंकृत को। और जहाँ उसके ही लिए कृषि का निषेध हो, परन्तु स्पष्ट रूप से व्यवस्था न की गयी हो वहाँ पर सभी जगह केवल स्वयंकृत कृषि आदि का निषेध समझना चाहिए। यही कारण हैं कि लोग विधि निषेध वाक्यों का तात्पर्य न समझकर कहने लग गये और लग जाते हैं कि ब्राह्मण के लिए कृषि का निषेध हैं। हालाँकि, वे भी स्वयं ब्राह्मणता का दम भरते हुए वही कर्म करते हैं। परन्तु इसमें उनका दोष ही क्या हैं? क्योंकि वे विवेकहीन तथा अकारण परछिद्रान्वेषी बन गये हैं। इसलिए ”अर्थात् मूर्ख लोग शास्त्र के तात्पर्य को न समझ अनाप-सनाप बका करते हैं”, ‘अज्ञात्वा शास्त्रहृदयं मूढो वक्त्यन्थान्यथा, ”अर्थात् मूर्ख लोग शास्त्र के तात्पर्य को न समझ अनाप-शनाप बका करते हैं”, इस न्याय के ही वे लोग दृष्टान्त हो रहे हैं। मनुस्मृति के दशम अध्याय के, ‘कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्यजीविकाम्’ अर्थात् आपत्तिकाल में ब्राह्मण कृषि और गोरक्षा करके वैश्यवृत्ति से भी जीविका करें। इस 82वें श्लोक में भी कुल्लूकभट्ट ने स्पष्ट लिख दिया हैं कि-
कृषिगोक्षग्रहणंवाणिज्यप्रदर्शनार्थतयाचविक्रेयाणि वक्ष्यति। स्वयंकृतं चेदं कृष्यादि ब्राह्मणापद्वृत्तिरस्वयं कृतस्यऋतामृताभ्यां जीवेतेत्यनापद्येव विहितत्वात्॥
भाव यह हैं कि ‘इस श्लोक में कृषि, गोरक्षा पद से वाणिज्य को भी समझना चाहिए, इसीलिए ब्राह्मण के बेचने योग्य पदार्थों का आगे वर्णन करेंगे। स्वयंकृत ही कृष्यादि आपत्तिकाल में ब्राह्मण की जीविकाएँ हैं; क्योंकि अस्वयंकृत कृष्यादि का तो विधान अनापत्तिकाल में ‘ऋतामृताभ्यां’ इत्यादि वाक्यों द्वारा चतुर्थाध्याय में कर आये हैं। पराशरस्मृति से भी स्पष्टतया यही प्रतीत होता हैं। क्योंकि वहाँ लिखा हैं कि-
षट्कर्मसहितो विप्र: कृषिकर्म च कारयेत्। 2। 2।
हीनांगं व्याधितं क्लीबंवृषं विप्रो न वाहयेत्॥ 3॥
अर्थात् ”पूर्वोक्त संध्यास्नानादि षट्कर्म करने वाला ब्राह्मण जीविका के लिए कृषिकर्म करवावे। परन्तु रोगी, हाथ या पाँव आदि अंगों से रहित, लँगड़े और नपुंसक बैलों को हल में न जुतवावे।” इस श्लोक में करवावे और जुतवावे इस अर्थवाले ‘कार्यरत’ और ‘वाहयेत्’ शब्दों का प्रयोग करते हुए उन्होंने ब्राह्मण के लिए अस्वयंकृत कृषि का ही विधान किया हैं। इसीलिए आगे चलकर उन्होंने स्वयंकृत कृषि का अनापत्ति में निषेध किया हैं। जैसा कि :
ब्राह्मणश्चेत्कृषिं कुर्यात्तान्महादोषमाप्नुयात्॥ 8॥
संवत्सरेण यत्पापं मत्स्यघाती द्धमात्नुयात्।
अयोमुखेन काष्ठने तदेकाहेन लांगली॥ 11॥
पाशकोमत्स्नघाती च व्याधा: शकुनिकस्तथा।
अदाताकर्षकश्चैव पंचैते समभागिन: ॥ 13॥ 2॥
अर्थ यह हैं कि ”ब्राह्मण अपने हाथों से हल जोतकर कृषि करे तो महापापी हो जाता हैं। मछलियाँ मारनेवाला 1 वर्ष में जितने पाप का भागी होता हैं, उतने ही का हल जोतने वाला एक ही दिन में होता हैं। फन्दे से जन्तुओं को पकड़नेवाला, मत्स्यघाती, बहेलिया, चिड़ीमार और कृपण होकर अपने हाथ खेती करने वाला ये पाँचों बराबर हैं।” आगे चलकर जो लिखते हैं कि :
वृक्षंछित्वामहींभित्त्वाहत्वा च कृमिकीटकान्।
कर्षक: खलयज्ञेन सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ 16॥
अर्थात् ”अपने हाथ से खेती करने वाला, वृक्षों को काट, पृथ्वी को फार और कृमि, कीटों को मारकर खलयज्ञ नामक कर्म करने से पवित्र होता हैं।’ और अन्यत्रा भी जो स्मृति और पुराणों में कृषक को प्रायश्चित्त लिखे गये हैं, और कृषि की निन्दा की गयी हैं वे सभी अपने हाथ से हल जोतने वाले के ही लिए लिखे गये हैं। क्योंकि अस्वयंकृत कृषि को जब शास्त्र ही करने को कहता हैं तो उसमें दोष कहाँ हो सकता हैं? नहीं तो फिर यज्ञादि में भी अवश्य अनेक प्रकार से हिंसाओं के होने के कारण वहाँ भी प्रायश्चित्त करना चाहिए। यदि यज्ञ में भी हिंसादिजन्य पापों के लिए कोई प्रायश्चित्त माना जाये तो फिर अस्वयंकृत कृषि आदि में भी मानने में कोई दोष नहीं हैं। क्योंकि जैसे उस प्रायश्चित्त मात्र के करने से यज्ञ निषिद्ध या अधर्म नहीं समझा जाता, वैसे ही कृषि आदि की भी उस प्रायश्चित्त से निषिद्ध नहीं हो सकते। बल्कि जब पराशर स्मृति के द्वितीय अध्याय भर में, केवल अन्त के श्लोकों को छोड़कर(क्योंकि वहाँ क्षत्रियादि के लिए कृषि का वर्णन हैं) ब्राह्मण के लिए कृषि का वर्णन हैं और अन्त में यह भी लिखा हुआ हैं कि ‘चतुर्णामपिवर्णानामेषधर्म: सनातन:।’ अर्थात् ‘चारों वर्णों के यथोक्त कृषि आदि सनातन धर्म हैं’ और मध्य में यहाँ तक लिखा हैं कि:
स्वयंकृष्टे तथा क्षेत्रो धान्यैश्च स्वयमर्जितै:॥
निर्वपेत्पंच यज्ञांश्च क्रतुदीक्षां च कारयेत्॥ 6॥
अर्थात् ”ब्राह्मण अपने से जुतवाये हुए क्षेत्र में स्वयं उपार्जित अन्नों द्वारा पंच यज्ञ और बड़े-बड़े यज्ञ करे या करवावे।” क्योंकि क्षत्रियादि के लिए आगे चलकर लिखा हुआ हैं कि :
क्षत्रियो पि कृषिं कृत्वा देवान्विप्रांश्च पूजयेत्।
वैश्य:शूद्रस्तथाकुर्यात् कृषिवाणिज्य शिल्पकम्॥ 18॥
अर्थात् ”क्षत्रिय भी खेती करके देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करे। इसी प्रकार वैश्य और शूद्र भी कृषि, वाणिज्य और शिल्पादि का व्यवसाय करें।” तो फिर यह कहना कि ब्राह्मण के लिए कृषि निन्दित हैं, सरासर भूल हैं। हाँ, ‘अनापत्तिकाल’ में स्वयंकृता कृषि अर्थात् अपने हाथों हल जोतना और अपने हाथ से वाणिज्य करना निन्दित हैं और उसके करने से ब्राह्मण पाप का भागी अवश्य हो जाता हैं। परन्तु इस समय प्राय: याचक ब्राह्मण दल में ऐसी बहुत जगहें पाई जाती हैं। क्योंकि मैंने अपनी आँखों और कानों कानपुर के पास वाजपेयी प्रभृति उच्च श्रेणी के कान्यकुब्जों को हल जोतते देखा और सुना हैं। यही दशा मथुरा के आसपास और गौड़ों के देश, पंजाब एवं गुजरात में भी पाई जाती हैं। परन्तु कोई भी कान्यकुब्जों या गौड़ों आदि से इसका नाम भी नहीं लेते। केवल अयाचक ब्राह्मणों में मिथ्या दोषारोपण और इन्हें नीचा दिखाने का यत्न करना यही सभी का प्रधान उद्देश्य हो रहा हैं। परन्तु ईश्वरानुग्रह से, चाहे अन्य ब्राह्मणों या अन्य वर्णों में अब तक जो कुछ भी हो गया हैं लेकिन, इस अयाचक ब्राह्मण दल का एक बच्चा भी भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक, जहाँ तक किसी-न-किसी रूप में इनकी सत्ता हैं, अपने हाथों हल जोतने का नाम भी नहीं जानता। और यदि कहीं जानता भी होगा तो याचक दलवाले ब्राह्मणों के ही संग थे। कारण, वही गुरु, पुरोहित और उपदेशक हैं। अत: अभी तक इन ब्राह्मणों की इस शुद्धता में, जो सभी अन्य ब्राह्मणों से बढ़कर हैं, कोई कलंक सम्भावित नहीं हैं। इतर ब्राह्मण तो चाहे ऐसा करने से भले ही दोष के पात्र बन गये हैं अथवा नहीं। क्योंकि लिखा हैं कि :
आपत्कल्पेन यो धर्मं कुरुतेनापदि द्विज:।
स नाप्नोति फलं तस्य परत्रोति विचारितम्॥ 28॥
प्रभु: प्रथमकल्पस्य योनुकल्पेनर् वत्ताते।
न सा परायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम्॥ 30॥म 11।
अर्थ यह हैं कि ”जो ब्राह्मणादि आपत्ति के धर्म को अनापत्ति में करते हैं उन्हें उसका फल परलोक में नहीं मिलता। जो अनापत्ति के धर्मों के करने में समर्थ होकर भी आपत्ति धर्म करता हैं उसे पारलौकिक फल से वंचित रहना पड़ता हैं।” यदि किसी प्रकार से हलवाहे आदि की सामर्थ्य या प्राप्ति न होने से उनके लिए यह भी आपत्तिकाल मान लिया जाये तो किसी तरह गुजारा हो सकता हैं। परन्तु ऐसे कर्मों का जहाँ तक हो सके, त्याग ही श्रेयस्कर हैं।
इस प्रकार से ब्राह्मण के लिए जब कृषि मन्वादि वाक्यों द्वारा सनातन धर्म सिद्ध हो गयी और विशेषकर आजकल जब वेदादि का अभ्यास छोड़ने से प्रतिग्रह की योग्यता न रह गयी अथवा रहने पर भी अनापत्तिकालिक जीविका का संघटन बना हुआ हैं। ऐसी दशा में प्रतिग्रह का अधिकार ही न रहने से जैसा कि अभी कह चुके हैं, कृषि करना बहुत उत्तम जीविका ठहरी। तो मनुस्मृति के दशमध्याय में वा अन्यत्रा जो कृषि का निषेध प्रतीत होता हैं अथवा उसकी निन्दा मात्र प्रतीत होती हैं वह केवल, जैसा कि प्रथम कह चुके हैं, स्वयंकृता कृषि की निन्दा हैं। क्योंकि दशमध्याय आपद्धर्म प्रकरण हैं। इसलिए पूर्वोक्त व्यवस्थानुसार स्वयंकृत कृषि आदि का ही प्रकरण हैं। क्योंकि अस्वयंकृत कृष्यादि को अनापद्धर्म प्रकरण चतुर्थ अध्याय में मनुजी स्वयं ही कह चुके हैं। परन्तु कोई ऐसा न विचार ले, जैसा कि आजकल के बहुतेरे नवशिक्षितों का विचार हो रहा हैं, कि सर्वदा ही अपने हाथ से ब्राह्मण को हल जोतने में कोई हर्ज नहीं हैं” इसलिए मनुजी उस कृषि को निन्दित और अगतिक गति ठहराते हुए केवल आपत्ति में ही उसे करने की आज्ञा देते हैं। क्योंकि प्रथम यह कहते हैं कि :
उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथंस्यादिति चेद्भवेत्।
कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम्॥मनु ।अ 10॥ 82॥॥
अर्थात् ”यदि यह संशय हो कि आपत्ति में अपनी वृत्ति और क्षत्रिय की भी विशेष वृत्ति न मिल सके तो ब्राह्मण कैसे जीवे? तो उसका समाधान यह हैं कि वैश्य वृत्ति अर्थात् अपने हाथों हल जोतकर कृषि और गोरक्षा एवं वाणिज्य द्वारा जीविका करे”। यदि सामान्यत: सभी प्रकार की कृषि वैश्य के ही लिए होती तो यह क्यों कहते कि वैश्य की वृत्ति रूप जो कृषि और गोरक्षा हैं उनसे जीवे? क्योंकि आप तो सभी को एक-सी ही मानते हैं। परन्तु हमारे मत से तो खेती दूसरे द्वारा कराना ब्राह्मण का भी कर्म हैं। इसलिए वैश्य की वृत्ति रूप खेती कहने से अपने हाथों वाली ही ली जायेगी और वही आपद्धर्म हैं। अब अगले श्लोकों में पूर्वोक्त इस कृषि में से भी विशेष प्रकार की कृषि करने को कहते हैं। क्योंकि लिखते हैं कि :
वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मण: क्षत्रियोपि वा।
हिंसाप्रायां पराधीनां कृष्रिं यत्नेन वर्जयेत्॥ मनु. अ. 10॥ 83॥
तात्पर्य यह हैं कि ”अपने हाथ से खेती करके जीने वाले ब्राह्मणादि भी उस कृषि का बहुत यत्न से परित्याग करे जिसमें बहुत ही हिंसा की सम्भावना हो, अथवा जमीन इत्यादि भी अपनी न होने से सभी प्रकार से पराधीनता ही हो। क्योंकि मनुजी प्रथम भी कह चुके हैं कि :
यद्यत्परवशं कर्म तत्ताद्यत्नेन वर्जयेत्।
यद्यदात्मवशंतुस्यात्तात्तात्सेवेत यत्नत:॥मनु.।अ. 4 159॥
अर्थात् ”जो जो काम एकदम पराधीन हो उनका यत्नपूर्वक त्याग और जो स्वाधीन हो उनका सेवन करे। इसके बाद ही लिखते हैं कि :
कृषिं साध्विति मन्यन्तेसा वृत्ति: सद्विगर्हिता।
भूमिं भूमिशयांश्चैव हन्तिकाष्ठमयोमुखम्॥मनु ।अ 10॥ 84॥
इसलिए इसका प्रकरणवश उचित अर्थ यही हैं कि बहुत लोग ऐसा समझते हैं कि स्वयं अर्थात् ”अपने हाथ से हल जोतकर कृषि करना सर्वदा ही उत्तम हैं। परन्तु ऐसी वृत्ति की आपत्तिकाल से भिन्न काल में सत्पुरुष लोग निन्दा करते हैं, क्योंकि फलसहित जो हल का भाग हैं वह भूमि का विदारण और उसमें रहने वाले जीवों का नाश करता हैं। अत: अपने हाथ से हल जोतने वाला हिंसक हो जायेगा।’ यही बात पराशरस्मृति में भी प्रथम दिखला चुके हैं। यदि ऐसा अर्थ न मानोगे तो मनुजी की इस सामान्य निन्दा से सभी के लिए कृषि निन्दित समझी जायेगी, क्योंकि इसमें किसी ब्राह्मण आदि का नाम नहीं हैं। ऐसी दशा में जो गीता और मनुस्मृत्यादि ग्रन्थों में सामान्य रूप से लिखा हैं कि:
कृषिगौरक्ष्याणिज्यंवैश्यकर्म स्वभावजम्। गीता॥ 18। 44
शात्रास्त्राभृत्त्वं क्षत्रास्य वणिक्पशुकृषिर्विश: मनु.। 79। ॥ 10॥
अर्थात् ”कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य ये कर्म वैश्यों के स्वाभाविक हैं। शस्त्रा और अस्त्रा धारण करना क्षत्रिय की जीविका हैं और वाणिज्य, कृषि तथा पशुपालन वैश्य की।” इन सबों का तात्पर्य यह हैं कि स्वयंकृत (अपने हाथ से किये गये) कृषि, वाणिज्य और पशुपालन वैश्यों की स्वाभाविक जीविकाएँ हैं, परन्तु अस्वयंकृत कृष्यादि तो ब्राह्मण की भी जीविकाएँ हैं। नहीं तो उन्हीं मनुस्मृति आदि ग्रन्थों का पूर्वापर अथवा परस्पर विरोध होगा।
एक बात और ध्यान देने की हैं जैसे ब्राह्मणत्व, ब्राह्मणता या ब्राह्मणण्य यह ब्राह्मण का असाधारण कर्म हैं, अर्थात् ऐसा धर्म हैं जो उसे छोड़कर अन्यत्रा नहीं पाया जा सकता। ऐसी ही क्षत्रियत्वादि की भी दशा जाननी चाहिए। इसी प्रकार यदि कृषि भी करना केवल वैश्य (वणिक्) का ही असाधारण कर्म होता तो वाणिज्य कहने में ही उसका भी बोध हो जाता, क्योंकि त्व, तल और ष्य प्रत्यय जिन शब्दों के आगे लगते हैं उनके प्रतिपाद्य अर्थों के असाधारण धर्मों और कर्मों को कहते हैं। जैसे ष्य प्रत्ययान्त काव्य शब्द कवि के ही असाधारण कर्म (क्रिया) को कहता हैं। इसमें पाणिनि महर्षिजी के ‘तस्यभावस्त्वतलौ’ (5। 1। 119) गुणवचनब्राह्मणादिभ्य: कर्मणि च’ (5। 1। 124) ये दोनों सूत्र प्रमाण हैं और फिर ‘कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यम्’ इस वाक्य में वाणिज्य से पृथक् कृषि और गोरक्षादि के कथन की आवश्यकता न होती, क्योंकि वाणिज्य शब्द भी ष्य प्रत्ययान्त हैं। इससे स्पष्ट हैं कि कृष्यादि वैश्य के असाधारण धर्म नहीं हैं, किन्तु ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यादि के साधारण धर्म हैं अर्थात् उन्हें सभी कर सकते हैं। बृहस्पतिस्मृति के प्रारम्भ के बीसों श्लोकों में भूमिदान की बहुत ही प्रशंसा की गयी हैं, जैसा कि :
सुवर्णंरजतं वस्त्रां मणिं रत्नं च वासव।
सर्वमेव भवेद्दत्तां वसुधां य: प्रयच्छति॥ 5॥
अर्थात् ”हे इन्द्र! सोना, चाँदी, वस्त्र, मणि और रत्न इन सभी के दान का फल भूमिदान से प्राप्त होता हैं’ इत्यादि और इस भूमिदान का पात्र ब्राह्मण ही हो सकता हैं। बल्कि इस बात को उसी जगह लिख भी दिया हैं कि :
विप्राय दद्याच्च गुणान्विताय तपोनियुक्ताय जितेन्द्रियाय।
यावन्मही तिष्ठतिसागरान्ता तावत्फलंतस्यभवेदनन्तम्॥ 10॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ”गुणवान, तपस्वी और जितेन्द्रिय ब्राह्मण को पृथ्वी दान दे जिसका अनन्त फल जब तक सागर पर्यन्त पृथ्वी स्थित रहेगी तब तक होगा।” अब ब्राह्मण उस पृथ्वी का या तो राजा बने या उसमें कृषि करवावे, तीसरी बात तो हो सकती नहीं। यदि दूसरे को दे देना चाहे सो तो उचित नहीं हैं, क्योंकि याज्ञवल्क्यस्मृति के 317वें श्लोक के ‘पार्थिव:’ इस पद को लेकर मिताक्षरा में लिखा हैं कि ‘अनेनभूपतेरेव भूमिदानेधिकारो न भोगपतेरिति दर्शितम्’। अर्थात् स्मृति के ‘पार्थिव’ पद से यह सूचित किया हैं कि राजा को ही भूमिदान का अधिकार हैं, न कि जिन जमींदारादि को केवल भोग के लिए मिली हैं उनको भी। यदि कुछ द्रव्य उसके बदले लेकर उसे बेचना चाहे तो पृथ्वी बेचने का निषेध हैं, क्योंकि यज्ञवल्क्यादि स्मृतियों में लिखा हैं कि :
मृच्चर्म पुष्पकुतपकेशतक्र विषक्षिती:॥ 37॥
वैश्यवृत्यापिजीवन्नोविक्रीणीतकदाचन॥ 39॥ या. प्रा.।
नित्यंभूमिव्रीहियवाजाव्यश्वर्षभधोन्वन डुहश्चैके। गौ. अ. 7।
अर्थात् ”वैश्यवृत्ति से जीविका करनेवाला भी ब्राह्मण मिट्टी, चमड़ा, फूल, कम्बल, चमर, मट्ठा, विष और पृथ्वी का विक्रय कदापि न करे।” ”सर्वदा ही पृथ्वी, धन, यव, बकरी, भेड़ी, घोड़ा, बैल, धोनु और साँड़ों को बेचना न चाहिए।” यदि वह भी पृथ्वी का दान करे, तो विरोध होगा, क्योंकि वहाँ तो लिखा हुआ हैं कि :
यथाप्सु पतित: शक्र तैलविन्दु: प्रसर्पति।
एवं भूम्या: कृतं दानं शस्ये शस्ये प्ररोहति॥ 1॥ बृह.।
अर्थात् ”हे इन्द्र! जैसे जल में गिरा हुआ तेल फैलता हैं वैसे ही भूमि का दान ज्यों-ज्यों उसमें अन्न उत्पन्न होकर बढ़ता हैं त्यों-त्यों बढ़ता हैं।” इससे तो जिसे प्रथम दी गयी हैं वह कृषि करने के लिए बाध्य हैं। यदि वह दान भी करेगा तो ब्राह्मण को ही करेगा। इसलिए यदि प्रथम ने न की तो दूसरा ही कृषि करेगा। अन्ततोगत्वा जब करेगा तो ब्राह्मण ही। और भी आगे स्पष्टरूप से लिखा हैं कि :
त्रीण्याहुरतिदानानि गाव: पृथ्वीसरस्वती।
तारयंतीह दातारं जपवानपदोहमै:॥ 18॥
अर्थात् ”तीन दान अतिदान कहे जाते हैं यानी गौ, पृथ्वी और विद्या, जो क्रमश: दुहने, बोने और जपने से दाता को तार देते हैं”। इससे तो स्पष्ट ही हैं कि पृथ्वी दानग्राही दाता को उसके फल की प्राप्ति के लिए अवश्य उसमें अन्न बोवे अर्थात् कृषि करे। अग्निपुराण के 113वें अध्याय में लिखा हैं कि :
भूमिं दत्वा सर्वभाक् स्यात्सर्वशस्यप्रोहिणीम्।
ग्रामं वाथ पुरं वापि खेटकं वा ददत्सुखी॥ 9॥
अर्थ यह हैं कि ”सब शस्य से युक्त पृथ्वी का दान देने से सब वस्तुओं का भागी होता हैं और गाँव, टोला अथवा खेटक (खेड़ा) इत्यादि देने से भी सुखी होता हैं।” उसी के 291वें अध्याय में लिखा हैं कि :
संयुक्तहलपंत्तायाख्यं दानं सर्वफलप्रदम्।
पंक्तिर्दशहला प्रोक्ता दारुजा वृषसंयुता॥ 7॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ”संयुक्तहलपंक्ति नाम का दान सब फलों का प्राप्त कराने वाला होता हैं। लकड़ी के दस हल जो बैलों के साथ हो उनका नाम पंक्ति हैं।” भला बैल के साथ हल का दान सिवाय ब्राह्मण के कृषि करने के और किस काम का होगा? अग्निपुराण के ही 125वें अध्याय में लिखा हैं कि :
कृषिगोचरक्ष्वाणिज्यं कुसीदं च द्विचश्चरेत्।
गोरसं गुडलवणलाक्षामांसानि वर्जयेत्॥ 2॥
हलमष्टगवं धार्म्मं षड्गवं जीवितार्थिनाम्।
चतुर्गवं नृशंसानां द्विगवं धर्मघातिनाम्।
ऋतामृताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा।
सत्यानृत्याभ्यामपि वा न श्ववृत्तया कदाचन॥ 5॥
अभिप्राय यह हैं कि ”ब्राह्मण कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य करे, परन्तु गोरस, गुड़, लवण व लाक्षा और मांस की बिक्री न करे। आठ बैलोंवाला हल धर्मयुक्त, छ: बैलों वाला केवल जीने के लिए चार बैलों वाला हत्यारों को और दो बैलों वाला धर्मनाशकों का कहलाता हैं। ऋत्, अमृत, मृत प्रमृत (कृषि) और सत्यानृत (वाणिज्य) से जीविका करे, परन्तु श्ववृत्ति अर्थात् नौकरी से जीविका कभी भी न करे।” मत्स्यपुराण के 280वें अध्याय में पंचलांगलक नाम के दान से भी ब्राह्मण का कृषि करना स्पष्टरूप से सिद्ध हैं। वह इस प्रकार हैं :
अर्थात: संप्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तामम्।
पंचलांगलकं नाम महापातकनाशनम्॥1॥
पुण्यां तिथिमथासाद्य युगादिग्रहणादिकाम्।
भूमिदानं नरो दद्यात्पंचलांगलकान्वितम्॥2॥
खर्वटं खेटकं वापि ग्रामं वा शस्यशालिनम्।
नरिवत्तानशतं वापि तदर्ध्दं वापि शक्तित:॥3॥
सारदारुमयान्कृत्वा हलान्पंच विचक्षण:।
सर्वोपकरणैर्युक्तानन्यान् पंच च काचनान्॥ 4॥
कुर्यात्पंचपलाद्द्धर्वमासहस्रपलावधि।
वृषान् लक्षणसंयुक्तान्दश चैव धुरन्धारान्।
सुवर्णशृभरणान् मुक्तालांगूलभूषणान्॥5॥
रौप्यपादाग्रतिलकान् रक्तकौशेयभूषणान्।
ग्दामचन्दनयुक्तान् शालायामविवामयेत्॥ 6॥
ततो मंगलशब्देन शुक्लमाल्याम्बरो बुधा:।
आहूय द्विजदाम्पत्यं हेमसूत्रांगुलीयकै:॥ 9॥
कौशेयवस्त्राकटकैर्मणिभिश्चाभिपूजयेत्।
शय्यां सोपस्करां दद्याद्धेनुमेकां पयस्विनीम्॥ 10॥
तत: प्रदक्षिणीकृत्य गृहीतकुसुमाजलि:।
इममुच्चारयेन्मंत्रामथसर्वं निवेदयेत्॥11॥
यस्माद्देवगणा: सर्वे स्थावराणि चराणिच।
धुरन्धारांगे तिष्ठन्ति तस्माद्धिक्ति: शिवे स्तुमे॥12॥
यस्माच्चभूमिदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।
दानान्यन्यानि मे भक्तिर्धर्म एव दृढा भवेत्॥ 13॥
दंडेन सप्तहस्तेन त्रिंशद्दण्डं नरिवत्तानम्।
त्रिभागहीनं गोचर्ममानमाह प्रजापति:॥14॥
मानेनानेन यो दद्यान्नरिवत्तानशतं बुधा:।
विधिनानेन तस्याशु क्षीयते पापसंहति:॥ 15॥
तदर्ध्दमथवा दद्यादपि गोचर्ममात्रकम्।
भवनस्थानमात्रां वा सोपि पापै: प्रमुच्यते॥ 16॥
यावन्ति लांगलकमार्गमुखानिभूमे,
र्भासां पतेर्दुहितुरंगजरोमकाणि।
तावन्तिशंकरपुरे स समाहितिष्ठेद्,
भूमिप्रदानमिह य: कुरुते मनुष्य:॥ 17॥
इन्द्रत्वमप्यधिगतं क्षयमभ्युपैति
नोभूमिलांगलधुरन्धर संप्रदानात्।
तस्मादघौघपटलक्षयकारिभूमे
र्दानविधोयमिति भूमिभवोद्भवाय॥ 19॥
सबका भावार्थ यह हैं कि ”अब पंचालंगलक नामक महादान का वर्णन करते हैं, जो महापातक का नाशक हैं। ग्रहणादि पुण्य तिथि में मनुष्य पाँच हलों सहित भूमिदान करे। वह भूमि चाहे ऊँची, नीची, खेड़ा, शस्य से पूर्ण, ग्राम अथवा सौ नरिवत्तान हो, अथवा यथाशक्ति उसका आधा भी हो। पाँच हल लकड़ी के सार के और पाँच सोने के बनवावे, जिनमें से लकड़ी वाले जोतने की सब सामग्री के सहित हो, परन्तु सोने के तो पाँच पल से लेकर 1000 पल (परिणाम विशेष) तक के बनवावें। लकड़ी के पाँच हलों के लिए दस धुरन्धर (हल की जुआ खींचने वाले), सुवर्ण लगी सींग और मुक्ता लगी पूँछवाले एवं पाँवों के अग्र में चाँदी मढ़े और लाल रेशम ओढ़ाये हुए तथा चन्दन और माला आदि से भूषित बैलों को भी दानशाला में लाकर रखे। उसके बाद शुक्ल वस्त्र और माला पहन मंगलजनक शब्दों से ब्रह्माणी और ब्राह्मण को बुलाकर सोने की करधनी, जनेऊ और आभूषण एवं रेशमी वस्त्र, मणि और कंगनों से उनकी पूजा करे। सब समान के साथ एक शय्या और दूध देने वाली धेनु का दान करे। उसके बाद प्रदक्षिणा कर अंजली में पुष्प लेकर इस अगले मन्त्रों का उच्चारण करके सब वस्तुएँ दे दे। हल की जुआ खींचने वाले बैल के अंगों में सब देवता, स्थावर और जंगम निवास करते हैं, इसलिए मेरी भक्ति शिव में उत्पन्न हो। और अन्य दान भूमिदान के सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं होते, इसलिए मेरी दृढ़ भक्ति धर्म में हो। सात हाथों वाले दण्ड से तीस दण्ड नपी भूमि एक नरिवत्तान कहलाती हैं और उसी का तीसरा भाग उसमें घटा देने से वही भूमि गोचर्म प्रमाणवाली कही जाती हैं। इस परिणाम से जो विचारवान 100 नरिवत्तान पूर्वोक्त विधि से दान करता हैं उसका पाप समुदाय नष्ट हो जाता हैं। जो उसका आधा, गोचर्म मात्र अथवा मकान बनाने भर भी देता हैं उसके भी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस प्रकार से हल आदि के सहित भूमि दान करे वह उतने ही वर्ष कैलाश में निवास करता हैं जितनी हराइयाँ उस भूमि पर जोतते समय बार-बार पड़ा करती हैं, अथवा जितने यमुना के रोम (शीकर) हैं। हल और जोतने वाले बैल के सहित भूमिदान करने में प्राप्त इन्द्र पदवी का भी नाश नहीं होता, इसलिए सब पापों का नाशक ऐसा भूमिदान ऐश्वर्य के लिए अवश्य करना चाहिए। जब-जब परशुराम ने पृथ्वी को नि:क्षत्रिया करके उसे कश्यपादि ब्राह्मणों को दिया, जिसका विवरण वाल्मीकीय रामायण के बालकाण्ड के 75वें सर्ग, स्कन्दपुराण के नागरखण्ड के 67वें अध्याय, ब्रह्मवैवर्तपुराण और महाभारतादि सभी ग्रन्थों में पाया जाता हैं। तो फिर उन लोगों ने भूम्यधिपतित्व (राज्य या जमींदारी) अवश्य ही स्वीकार किया और उनमें से बहुत से कृषि भी करते थे। इसके अतिरिक्त बहुत सा शिष्टाचार भी कृषि में प्रमाणरूप से मिलता हैं। दृष्टान्तार्थ धर्मारण्यस्थ ब्राह्मणों को लीजिए, जिनके याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह के त्याग की बात प्रथम ही कह चुके हैं। उन्हीं के विषय में स्कन्द पुराण के ब्रह्मखण्ड के धर्मारण्यमहात्म्य प्रसंग में ऐसा लिखा हैं कि :
पंचदशसहस्त्राणि मध्ये ये के च वाडवा:॥ 86॥
कृषिकर्मरता आसन् केचिद्यज्ञपरायणा:।
केचिन्मल्लाश्च संजाता: केचिद्वै वेदपाठका:॥99॥
स्वकर्मनिरता: शान्ता: कृषिकर्मपरायणा:।
धर्मारण्यान्नातिदूरे धोनू: संचारयन्ति ते॥ 300॥
बहवस्तत्रा गोपालाबभूवुर्द्विजबालका:।
तेषुग्रामेषु ते विप्राश्चातुर्विद्याद्विजोत्तामा:॥ 301॥ अ. 40
जिसका भावार्थ यह हैं कि ”उन 15 हजार वाडवों ब्राह्मणों में से कोई कृषि करते, कोई यज्ञ में लीन रहते, कोई पहलवानी करते और कोई वेदपाठ करते थे। वे लोग अपने-अपने धर्म में निरन्तर संलग्न हुए शान्त और कृषिकर्म में दत्तचित्त थे। उन ब्राह्मणों के बहुत से बालक गायों की रक्षा करते और धर्मारण्य के पास ही गायें चराया करते थे और रामचन्द्रजी के दिये हुए उन्हीं ग्रामों में चारों वेदों के ज्ञाता सर्वोत्तम वाडव (ब्राह्मण) रहा करते थे। इससे जो कोई ऐसा कहा करते हैं कि कृषि करने और दान आदि त्यागने से अयाचक ब्राह्मण कट्टर ब्राह्मण न रहकर हीन समझे जाने लगे, उनका स्पष्ट रूप से खण्डन हो गया। एक तो जब पूर्वोक्त रीति से कृषि ब्राह्मण का सनातन धर्म हैं, तो फिर उसके करने से कट्टरपना कहाँ चला गया? दूसरे अभी इन और पूर्व के श्लोकों से स्पष्ट ही विदित हुआ हैं कि धर्मारण्यवासी वाडव (ब्राह्मण) प्रतिग्रहादि तीन कर्मों के त्यागी और कृषि तथा गोपालनादि करते हुए यज्ञ दानादि के कर्ता थे और साथ ही, चारों वेदों के ज्ञाता थे न कि मूर्ख, जिससे भूल कर ऐसा करते रहे हों एवं श्रीरामचन्द्र द्वारा वहाँ स्थापित किये गये थे, फिर भी उनको ‘द्विजोत्तामा:’ अर्थात् सभी ब्राह्मणों से उत्तम कहा हैं। ठीक उनकी सी ही दशा तथा आचार-विचार और कर्म इन अयाचक ब्राह्मणों के भी हैं तो इनकी कट्टर ब्राह्मणता चली गयी और हीन समझे जाने लगे, इसे कहने की जगह ‘ये बहुत ही कट्टर और सब ब्राह्मणों से उत्तम ब्राह्मण हैं’ यही कहना न्यायसंगत हैं। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के प्रारम्भ में ही जब दशरथजी ने ‘पुत्रोष्टि’ नामक यज्ञ कराकर उसकी दक्षिणा में पृथ्वी दान को सर्वोत्तम समझ उसी का देना प्रारम्भ किया हैं तो ब्राह्मणों ने यह कहकर उसका इन्कार किया हैं कि हम लोग तपस्वी आदि हैं, अत: हम लोगों से भूमि का प्रबन्ध नहीं हो सकता। इसलिए उसके बदले अन्न, द्रव्यादि दीजिये। न कि भूलकर भी यह कहा हैं कि भूमिपतित्व अथवा उसमें कृषि करना हम लोगों के लिए शास्त्रनिन्दित हैं। इससे आपकी दी हुई पृथ्वी हमारे किसी काम की न होगी। अत: अन्नादि ही दक्षिणा में दीजिये। इस विषय में जिसे सन्देह हो वह वाल्मीकि रामायण का बालकाण्ड आदि में ही देखकर अपनी तुष्टि कर ले। उसी रामायण के अयोध्याकाण्ड के 32वें सर्ग में जब श्रीरामजी वन जाते हुए अपने महल की सब वस्तुएँ याचकों को देने लगे हैं उस समय उनके पास कुछ द्रव्य प्राप्ति के निर्मित्त आये हुए एक ऐसे ब्राह्मण का वर्णन हैं, जिससे उन युगों में भी कृषि करना ब्राह्मण का उत्तम धर्म सिद्ध होता हैं क्योंकि वहाँ लिखा हैं कि:
क्षत्रावृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललांगली।
तत्रासीत्पिंगलो गार्ग्यस्त्रिजटानाम वै द्विज:॥ 29॥
कहीं-कहीं ‘क्षतवृति:’ ऐसा भी पाठ मिलता हैं। उसका अर्थ यह हैं कि ”उस जगह अथवा उस समय गंगोत्री पीतवर्ण का एक त्रिजट नामवाला ब्राह्मण था, जो अस्त्रादि द्वारा कन्दमूल खोदकर, अथवा फल, कुदाल और हल से अर्थात् कृषि करके नित्य ही वन में रहता हुआ अपनी जीविका करता था। उसी जगह यह भी लिखा हुआ हैं कि जब उसकी स्त्री ने बहुत दु:खी होकर उसे भगवान् रामचन्द्र के पास याचना करने के लिए कहा तो प्रथम उसने वहाँ न जाने के लिए बहुत ही आग्रह किया हैं, परन्तु स्त्री के आग्रह से अन्त में हारकर भगवान् के पास गया हैं और जब वहाँ उसके विलक्षण वेष को देखकर उसकी उत्तम ब्राह्मणता में शंका करके परीक्षार्थ श्रीरामजी ने कहा हैं कि बहुत दूर तक ये गायें खड़ी हैं तुम अपना दण्ड फेंको, जहाँ तक वह पड़ेगा उतनी गायें ले जाना। इस पर उसने उनके भाव समझ दण्ड ऐसा फेंका हैं कि वह कई कोस दूर जाकर पड़ा हैं। इसलिए उसकी शुद्धता देखकर श्रीरामजी बहुत प्रसन्न हुए हैं इत्यादि। क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि कृषि करना और अस्त्रादि धारण करना कट्टर ब्राह्मणपने के लक्षण हैं, न कि हीनता के? इस आख्यान से यह भी स्पष्ट हैं कि दान लेना प्रभृति अगतिक गति हैं, और काल पाकर याचक ब्राह्मण अयाचक और अयाचक ब्राह्मण याचक हो सकते हैं और इसी प्रकार अयाचक और याचक ब्राह्मणों के पृथक्-पृथक् दल बनते और घटते-बढ़ते जाते हैं। इसलिए यदि कोई अयाचक ब्राह्मण आवश्यकता पड़ने पर अपनी वंशावली आदि से यह सिद्ध करता हैं कि कुछ दिन पूर्व उनके पूर्वज याचक दल वाले ब्राह्मण थे और अपना विवाह सम्बन्ध याचक दल वालों से सिद्ध करता हैं तो जो विचारविकल पण्डितमानी यह कहकर इसकी हँसी उड़ाते हैं कि ‘लो’ कहाँ तो अयाचक ब्राह्मण बनते थे, कहाँ अब याचक बनने लगे इत्यादि। उनको पूर्व निर्णीत विषय और आख्यान से अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय कर उस कुशाग्र बुद्धि को इस रसायन द्वारा सुधार लेना चाहिए। महाभारत के सभापर्व के 51वें अध्याय में लिखा हैं कि :
गोवासना ब्राह्मणाश्च दाशनीयाश्च (दर्शनीयाश्च) सर्वश:।
प्रीत्यर्थं ते महाराज धर्मराज्ञो महात्मन:॥ 5॥
त्रिखर्बं बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:।
ब्राह्मणा वाटधानाश्च गोमन्त: शतसंघश:॥ 6॥
कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयान् शुभान्।
एवं बलिं समादाय प्रवेशं लेभिरे न च॥ 7॥
इसका भावार्थ यह हैं कि ”जब दुर्योधन युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से लौट कर गया हैं तो वहाँ उनकी जो सम्पत्ति उसने देखी थी उससे उसे बड़ा सन्ताप हुआ हैं, जिसका कारण पूछने पर शकुनि से इन्हीं सम्पदाओं का वर्णन करता हैं कि ‘हे महाराज!पृथ्वी और गाय-बैलों के संस्कारवाले (क्योंकि गो नाम पृथ्वी और गाय-बैलों का भीहैं)अर्थात् बड़े-बड़े राजा और कृषि करनेवाले एवं दर्शनीय अर्थात् दिव्य शरीरवाले अथवा बड़े-बड़े दाता ब्राह्मण युधिष्ठिर महाराज की प्रसन्नता के लिए तीन खर्व द्रव्य बलि(नजर) लिये हुए द्वार पर इसलिए रोके गये हैं कि बाहर ही बलि देकर उसके भीतर जाये।’ और वाटधन देश में रहनेवाले पूर्ववत् भूमि और गाय-बैलोंवाले ब्राह्मणों के सैकड़ों झुण्ड यज्ञ के लिए बहुत से सोने के कमण्डलु और दूसरी बलि (नजर) लेकर पूर्वोक्त कारण से भीतर जाने नहीं पाते हैं।” इससे पूर्व के 49वें अध्याय में कह चुके हैं कि-
ब्राह्मणावाटधनाश्च गोमन्त: शतसंघश:।
त्रिखर्वं बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:॥ 25॥
कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयान् शुभान्।
एतद्धनं समादाय प्रवेशं लेभिरे न च॥ 26॥
इसका अर्थ पहले-सा ही हैं। वाटधन देश उत्तर भारत में गान्धार, काश्मीर के पास में महाभारत के युद्धक्षेत्र के पास ही सम्भवत: कहीं था अथवा हैं। क्योंकि महाभारत के सभापर्व के 32वें अध्याय में ही नकुल के दिग्विजय प्रसंग में लिखा हैं कि जब इन्द्रप्रस्थ से पश्चिम की ओर दिग्विजय करने को निकले हैं तो :
तथामध्यमकेयांश्च वाटधनान् द्विजानथ।
पुनश्चपरिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिन:॥ 8॥
अर्थात् ”मध्यमक देशवासियों को जीत, वाटधन देश के ब्राह्मणों को जीता। उसके बाद घूमकर पुष्करारण्य वासियों को भी जीता।” फिर उद्योगपर्व में जब हस्तिनापुर में कौरव सेना को अवकाश न मिला तो ईधर-उधर के उसके पास के ही देशों में
¹क्योंकि सभी बलि (नजर) लानेवाले बड़े-बड़े राजाओं का वर्णन करके अन्त में 52वें अध्याय में लिखा हैं कि:
तत्रास्था द्वारपालैस्ते प्रोच्यन्ते राजशाशनात्।
कृतकाला: सुवलय: ततो द्वारमवाप्स्यथ॥ 19॥
अर्थात् उन सभी को युधिष्ठिर महाराज की आज्ञा से द्वारापालों ने यही कहा कि आप लोग बाहर ही बलि देकर अन्दर जाने पायेंगे। फैल गयी हैं, तो वहाँ पर वह मिला तो वाटधन देश का भी नाम आया हैं। जैसा कि :
तत: पंचनद चैव कृत्स्नं च कुरुजांगलम्॥ 29॥
तथारोहितकारण्यं मरुभूमिश्च केवला।
अहिच्छत्रां कालकूटं गंगाकूलं च भारत॥ 30॥
वारणं वाटधनाश्च यामुनश्चैव पर्वत:।
एष देश: सुविस्तीर्ण: प्रभूतधनधान्यवान्॥ 31॥
बभूव कौरवेयाणां बलेनातीव संवृत:॥32॥
अर्थात् ”हस्तिनापुर में न ऐटने पर पचनद सम्पूर्ण कुरुजांगल, रोहितकारण्य, केवल मरुभूमि, अहिच्छत्रा, कालकूट, गंगातट, वारण, वाटधन और यमुना के उद्गम स्थान का पर्वत इन सुविस्तीर्ण और बहुत धनधान्यवाले देशों को कौरव सेना ने छेंक लिया।” पण्श्निडतवर नीलकण्ठ ने भी अपने ‘भारत भाव प्रदीप’ में इस जगह यही लिखा हैं कि ‘अहिच्छत्रादय: प्रदेशविशेष:’ अर्थात् ‘ये अहिच्छत्रादि नाम प्रदेश विशेष के हैं।’ मत्स्यपुराण के 113वें अध्याय में भी ऐसा ही लिखा हैं कि :
वाल्हीका वाटधानाश्च आभीरा: कालतोयका:।
पुरन्धा्रराश्चैव शूद्राश्च पल्लवाश्चात्ताखण्डिका:॥ 40॥
गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रका:।
शका दु्रह्या: पुलिन्दाश्च पारदाहारमूर्त्तिका:॥ 41॥
रामठा कंटकाराश्च कैकेया दशनामका:।
क्षत्रियोपनिवेश्याश्च वैश्या: शूद्रकुलानि च॥ 42॥
अत्रायो थभरद्वाजा: प्रस्थला: सदसेरका:।
लम्पकास्तलगानाश्च सैनिका: सहजागलै:।
एतेदेशाउदीच्यास्तु………………………॥ 43॥
अर्थात् ”वाल्हीक, वाटधान, आभीर, कालतोयक, पुरन्धार, शूद्र पल्लव, आत्तखंडिक, गान्धार, यवन, सिन्धु-सौवीर, मद्रक, शक, दु्रह्य, पुलिन्द, पारदाहारमूर्त्तिक, रामठ, कण्टकार, केकय, दशनामक, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के देश, अत्रि, भरद्वाज, प्रस्थल सदसेरक, लम्पक-तलगान, सैनिक और जंगल ये उत्तर भारत के देश हैं॥
इसी वाटधन देश के राजा और जमींदार (भूमिपति) ब्राह्मण नकुल विजय के बाद बलि लेकर आये थे। गान्धारादि देशों में ब्राह्मण रहते हैं इसमें चीनी यात्री ‘हुईसंग’ (Hwi Seng) और ‘संगयुन’ (Sungyun) आदि की भी सम्मत्ति मिलती हैं, जो सन् 517 ई. के लगभग भारत यात्रा को आये थे। यह बात ‘फाह्यान और संगयुन की यात्रा’ (Travels of Fah-Hian and Sungyun) नामक पुस्तक में मिलती हैं। उसमें काश्मीर, गान्धार, बुखारा आदि कई देशों में जहाँ-तहाँ ब्राह्मणों का वर्णन करते हुए 197वें पृष्ठ में गान्धार के विषय में लिखा हैं कि “The people of the country belonged entirely to the Brahman caste. They had a great respect for the law of Budha, and loved to read the Sacred books.” अर्थात् गान्धार देशवासी सभी के सभी ब्राह्मण थे और बुद्ध अनुशासन से बहुत प्रेम रखते और पवित्र पुस्तकें पढ़ा करते थे। और यह उचित भी हैं। क्योंकि उन देशों में एक प्रकार के सारस्वत विप्र, जिनकी संज्ञा ‘भूमिहार’ शब्द के सदृश और इसी अर्थवाली ‘महियाल या महीवाल हैं, रहा करते हैं। इसलिए ‘भारत भ्रमण’ ग्रन्थ के 52वें पृष्ठ में जो पूर्वोक्त मत्स्यपुराण के 113वें अध्याय के नाम पर मिथ्या ही यह लिखा गया कि वाल्हीक, वाटधन, आभीर, कालतोयक यह शूद्रों के देश हैं और पल्लव, आत्तखण्डिक, गान्धार यह यवनों के देश हैं” वह असंगत हैं। साथ ही, उस 113वें अध्याय का अर्थ भी अभी कर चुके हैं। उसमें इस प्रकार के कहीं भी नहीं लिखा हैं।
अस्तु, उस प्रकृति ‘त्रिखर्वं’, ‘बलिमादाय’ इस श्लोक में जो ‘त्रिखर्वं’ यह पद हैं, उसका किसी ने ऐसा भी अर्थ किया हैं कि खर्व शब्द संख्यावाचक न होकर ‘खर्वोहस्वश्चवामन:’ (अम., 2 का. मनु. 46) इस कोष के अनुसार स्व का वाचक हैं और स्व शब्द छोटे या कम अर्थ में प्रयुक्त होता हैं। अत: ‘त्रिखर्व’ शब्द का यह अर्थ हुआ कि त्रीणि कर्माणिखर्वाणिस्वाणि न्यूनानि तेषां ते त्रिखर्वा:’ अर्थात् जिनके तीन कर्म याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह न्यून यानी छूट गये हैं उनका नाम त्रिखर्व हैं। सारांश, त्रिकर्मा यानी केवल याजन, अध्यायन और दान करनेवाला ब्राह्मण। यद्यपि ‘त्रिखर्व’ यह शब्द जब बलि का विशेषण होकर संख्यावाचक होता हैं तो जैसा बलि शब्द द्वितीयान्त एकवचन हैं वैसा ही ‘त्रिखर्व’ यह शब्द भी हैं, अत: अर्थ ठीक बैठता हैं। परन्तु पूर्वोक्त अर्थ में ब्राह्मण:’ शब्द का विशेषण होने से ‘त्रिखर्वा:’ ऐसा होना चाहिए। क्योंकि उसका विशेष्य ‘ब्राह्मणा:’ यह शब्द प्रथमान्त बहुवचन हैं। तथापि ‘त्रीणि कर्माणि खर्वाणि हृस्वानिन्यूनानियस्मिन्कर्मणि तद्यथास्यात्’ अर्थात् जिस क्रिया में तीन कर्म न्यून हो उसकी तरह से ऐसा विग्रह करके ‘त्रिखर्व’ पद को ‘तिष्ठन्ति’ इस क्रिया पद का विशेषण कर देने से ‘सामान्य नपुंसकम्’ इस व्याकरण वाक्तविक (कात्यायनवचन) मूलक क्रियाविशेषणानां कर्मत्व क्लीवत्व च’ अर्थात् क्रिया-विशेषण वाचक पद नपुंसक द्वितीयान्त हुआ करते हैं। इस न्याय के अनुसार ‘व्रिखर्व’ यह नपुंसक द्वितीयान्त एकवचन ठीक हो गया और इसका अर्थ भी पूर्वोक्त ही रहा। [नोट- 1 पण्डितवर श्री नीलकण्ठ ही वहाँ पर अपने ‘भारत भाव प्रदीप’ में लिखते हैं कि ‘त्रिखर्वं’ त्रीणियाजनाध्यापनाप्रतिग्रहा: खर्वाणि न्युव्जानि धनलाभरूपफलहीनानि येषां ते त्रिखर्वां याजनादिहीना इत्यर्थ:। इसका तात्पर्य ऊपर ही लिखा गया हैं।] बल्कि जब ‘त्रिखर्व’ शब्द को संख्यावाचक मानते हैं तभी त्रि शब्द का खर्वशब्द के साथ कर्मधारय समास नहीं हो सकता। क्योंकि दिक्संख्यसंज्ञायाम्’। (2। 1। 50) इस पाणिनिसूत्रानुसार दिशावाचक और संख्यावाचक शब्दों का कर्मधारय समास तभी होता हैं जब वह समस्त पद किसी प्रसिद्ध वस्तु का नाम हो, जैसे ‘सप्तर्षि’, ‘त्रिगुण’ और ‘त्रिदेव’ आदि प्रसिद्ध वस्तु का नाम हैं। परन्तु त्रिखर्व शब्द तो किसी का नाम नहीं हैं। इसलिए जैसे ‘अष्टी ब्राह्मणा:’ इस जगह समास नहीं होता वैसे ही यहाँ भी नहीं होना चाहिए। दूसरे इस त्रिखर्व पद में समाहार द्विगु नामक कर्मधारय समाम मानना होगा। क्योंकि संख्यापूर्वो द्विगु: (पा. 2। 1। 52) अर्थात् ‘संख्या पूर्वक कर्मधारय समास द्विगु कहलाता हैं, ऐसा पाणिनि का सूत्रा हैं। तो फिर जैसे ‘सप्तशती’ शब्द स्त्रीलिंग हो गया हैं वैसे ही ‘अकारान्तोत्तारपदो द्विगु: स्त्रियामिष्ट:’ इस महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि जी के अथवा महर्षि कात्यायन के वचनानुसार ‘त्रिखर्व’ पद का ‘त्रिखर्वी’ ऐसा स्त्रीलिंग रूप होना चाहिए। क्योंकि उस वाक्य का ऐसा अर्थ ही हैं कि अकारान्त उत्तर पदवाला द्विगु समास स्त्रीलिंग होता हैं और खर्व शब्द अकारान्त हैं। इसलिए इन सब दोषों के वारण करने के लिए जैसे ‘पंचपात’, ‘त्रिभुवन’, चतुर्युग इत्यादि शब्दों में स्त्रीलिंग नहीं होता वैसे ही इसका भी स्त्रीलिंग रूप हटाने के लिए उनकी तरह ‘पात्रादि गण’ में खर्व शब्द का पाठ मानना पड़ेगा। जिसमें ‘पात्राद्यन्तस्य न’ यह व्याकरण का वार्तिक स्त्रीलिंग रूप का निषेध करेगा, क्योंकि उसका अर्थ यह हैं कि पात्र आदि शब्द जिस समाहार द्विगुसमास के अन्त में हो उसका स्त्रीलिंग रूप नहीं होता, जैसा कि ऊपर दिखला चुके हैं।
अथवा जैसे ‘देवपूजा को ब्राह्मणों देवब्राह्मण:’ इस जगह मध्यमपदलोपी समास होता हैं वैसे ही त्रिसहितं त्रिरावृत्तां वा खर्वं त्रिखर्वम्’ अर्थात् तीन के सहित अथवा तीन आवृत्ति जिसकी की गयी हो ऐसा जो खर्व उसको त्रिखर्व कहते हैं। इस प्रकार से बड़े कष्ट से ‘त्रिखर्व’ शब्द की सिद्धि होगी। इसलिए इस अर्थ की अपेक्षा स्ववाला ही अर्थ अच्छा हैं, जिससे सिद्ध होता हैं कि पश्चिम, भूमिहारादि ब्राह्मणों की तरह वे भी त्रिकर्मा थे और कृषि करते तथा भूमिपति थे। इस प्रकार से धर्मशास्त्र, पुराण, महाभारत, वाल्मीकीय रामायणादि इतिहास और शिष्टाचार से सिद्ध हैं कि कृषि करनेवाले ब्राह्मण बहुत कट्टर ब्राह्मण होते हैं, क्योंकि वह सनातन धर्म हैं और प्रतिग्रहादि उस हालत में जीविकार्थ के लिए किये जा सकते हैं जब कोई दूसरा उपाय कृष्यादि उसके लिए न हो
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(घ) राज्य और युद्ध- अब हम प्रसंगवश यह भी दिखला देना चाहते हैं कि युद्ध करना और भूमिशासन (प्रजापालन या राज्य) भी ब्राह्मण का धर्म हैं, जिसे स्मृति, पुराण, इतिहास और सदाचार वगैरह सभी करने की आज्ञा देते हैं। साथ ही, यह भी स्मरण रखना चाहिए कि यदि राज करना ब्राह्मण का धर्म सिद्ध हो जायेगा तो फिर उसके लिए युद्ध अपरिहार्य हो जायेगा, क्योंकि राजा का ऐसा धर्म हैं। इसके लिए प्रथम हम यह दिखला देना उचित समझते हैं कि ‘राज’ शब्द क्षत्रिय मात्र का वाचक नहीं। यदि परम प्रसिद्ध और सर्वमान्य अमरकोष के द्वितीय काण्डान्तर्गत क्षत्रिय वर्ग में देखते हैं तो वहाँ ‘क्षत्रिय’ और ‘राजा’ ये दोनों शब्द भिन्न-भिन्न अर्थ वाले मालूम होते हैं। क्योंकि लिखा हैं कि :
(घ) राज्य और युद्ध- अब हम प्रसंगवश यह भी दिखला देना चाहते हैं कि युद्ध करना और भूमिशासन (प्रजापालन या राज्य) भी ब्राह्मण का धर्म हैं, जिसे स्मृति, पुराण, इतिहास और सदाचार वगैरह सभी करने की आज्ञा देते हैं। साथ ही, यह भी स्मरण रखना चाहिए कि यदि राज करना ब्राह्मण का धर्म सिद्ध हो जायेगा तो फिर उसके लिए युद्ध अपरिहार्य हो जायेगा, क्योंकि राजा का ऐसा धर्म हैं। इसके लिए प्रथम हम यह दिखला देना उचित समझते हैं कि ‘राज’ शब्द क्षत्रिय मात्र का वाचक नहीं। यदि परम प्रसिद्ध और सर्वमान्य अमरकोष के द्वितीय काण्डान्तर्गत क्षत्रिय वर्ग में देखते हैं तो वहाँ ‘क्षत्रिय’ और ‘राजा’ ये दोनों शब्द भिन्न-भिन्न अर्थ वाले मालूम होते हैं। क्योंकि लिखा हैं कि :
मूध्र्दाभिषिक्तो राजन्यो बाहुज: क्षत्रियों विराट्।
राजा राट्पार्थिवक्ष्माभृन्नृपभूपमहीक्षित:॥ 1॥
अर्थात् ”मूध्र्दाभिषिक्त, राजन्य, बाहुज, क्षत्रिय और विराट् ये क्षत्रियों के नाम हैं। और राट्, पार्थिव, क्ष्माभृत, नृप, भूप और महीक्षित् ये राजा के पर्याय हैं।” इससे स्पष्ट हैं कि क्षत्रिय से भिन्न भी राजा होता हैं। आगे चलकर और भी सफाई हैं क्योंकि लिखते हैं कि :
अथ राजकम् 5 राजन्यकंचनृपतिक्षत्रियाणांगणेक्रमात् 6 अर्थात् ”राजक शब्द नृपतिसमूह का वाचक हैं और राजन्यक शब्द क्षत्रिय समूह का”। इससे स्पष्ट हैं कि राजन्य शब्द ही क्षत्रिय मात्र का वाचक हैं, न कि राज शब्द भी। मेदनीकोष में लिखा हैं कि :
राजा प्रभौ च नृपतौ क्षत्रिये रजनीपतौ।
अर्थात् ”राजा प्रभु, नृपति, क्षत्रिय और चन्द्रमा को कहते हैं।” एक जगह और भी मेदनीकोष में ही लिखा हैं कि ”मूर्दाभिषिक्तो भूपाले मंत्रिणि क्षत्रियेपि च।’ अर्थात् ”मूध्र्दाभिषिक्त भूपाल, मन्त्री और क्षत्रिय को कहते हैं।” इससे जो कोई यह शंका करते हैं कि पूर्वोक्त अमर कोष में जो क्षत्रिय से पृथक् राजा को गिनाया हैं उसका यह तात्पर्य हैं कि सभी क्षत्रियों को राजा नहीं कहते, किन्तु जिन क्षत्रियों का अभिषेक किया जाता हैं और जो नरों के पति होते हैं उन्हें ही कहते हैं। उसका भी खण्डन हो गया हैं। क्योंकि मेदिनीकोष से स्पष्ट हैं कि क्षत्रियमात्र को भी राजा कहते हैं। इसके बाद क्षत्रिय से पृथक् नृपति, भूपाल या राजा को कहते हुए यह झलका रहे हैं कि क्षत्रिय से भिन्न राजा होता हैं। मनुस्मृति के 7वें अध्याय राज धर्म प्रकरण से स्पष्ट लिखा हैं कि :
राजधर्मान्प्रवक्ष्यामि यथा वृत्तो भवेन्नृप:॥ 1॥
अर्थात् ”राजा के धर्मों का अब कथन करते हैं कि नृप यथोचित आचार वाला हो।” इस श्लोक में राज धर्म को प्रतिज्ञा करके नृप धर्म का कथन करते हुए यह दिखला रहे हैं कि प्रजापालक मात्र ही राजा कहलाता हैं। कुल्लूकभट्ट भी यहाँ पर टीका में लिखते हैं कि :
राजशब्दो नात्रा क्षत्रिय जाति वचन: किंत्वभिषिक्त जनपद
पुरपालयितृपुरुषवचन: अतएवाह यथावृत्तोभवेन्नृपइति।
अर्थ यह हैं कि ”इस श्लोक में राज शब्द क्षत्रिय जाति का वाचक न होकर उस पुरुष मात्र का वाचक हैं जिसका अभिषेक देश, ग्रामादि के पालन के लिए किया जाता हैं। इसीलिए श्लोक में लिखते हैं कि नृप यथोचित आचार वाला हो।” ऐसा ही मेधातिथि ने भी यहाँ लिखा हैं। परन्तु अगले श्लोक में जो कुल्लूकभट्ट लिखते हैं ”एतेन क्षत्रिय एव राज्याधिकारी नान्य इति दर्शितम्” अर्थात् ”द्वितीय श्लोक में क्षत्रिय पद से यह सूचित किया हैं कि क्षत्रिय ही राज्याधिकारी हो सकता हैं, न कि दूसरा।” वह उनकी विचित्र बुद्धि की महिमा हैं, कि अगले और पिछले श्लोकों के अपने लेखों को भूलकर पूर्वापर विरुद्ध बक डालते हैं। उस श्लोक में तो क्षत्रिय पद ‘ब्राह्मण वसिष्ठ’ न्याय से आदर और विशेष दृष्टि का सूचक हैं। जैसे रामजी ने या किसी अन्य ने ही कह दिया कि ब्राह्मणों को बुला लाइये और गुरु महाराज वसिष्ठजी को बुलाते आइयेगा। तो यद्यपि वसिष्ठजी भी ब्राह्मण ही हैं, अत: उनके लिए पृथक् आज्ञा की आवश्यकता नहीं हैं। तथापि उनका आदर और उन पर विशेष दृष्टि सूचित करने के लिए उनका पृथक् नाम लिया हैं। वैसे ही यद्यपि राजा के कहने से क्षत्रिय राजा भी लिया जा सकता हैं, तथापि जबकि मनु जी स्वयमेव दशमध्याय में, जैसा कि हम पूर्व कह चुके हैं, कहते हैं कि-
वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम्॥ 8॥
अर्थात् ”ब्राह्मण का वेदाभ्यास और क्षत्रिय का प्रजा पालन सर्वोत्तम धर्म’ हैं। इसलिए उसी विशेषता और आदर की सूचना के लिए पृथक् क्षत्रिय शब्द का उल्लेख हैं। और भी जो कुछ यहाँ पर भट्टजी ने लिखा हैं वह सब कुछ विस्मरण मूलक हैं जिसको हम पहले ही दिखला चुके हैं। 12वें अध्याय में भी मनुजी ने ऐसा ही सूचित किया हैं कि :
राजन: क्षत्रियाश्चैव राज्ञां चैव पुरोहिता:।
वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गति:॥ 46॥
अर्थात् ”राजा, क्षत्रिय राजाओं के पुरोहित और दिन-रात शास्त्र में कलह करने वाले ये राजसों में मध्यम कहे जाते हैं। यहाँ भी क्षत्रिय से पृथक् शब्द हैं। ऐसा ही स्मृतियों में बहुत जगह मिला करता हैं। आगे चलकर इसी 12वें अध्याय में मनुजी स्पष्ट लिखते हैं कि :
सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति॥ 100॥
अर्थ यह हैं कि ”सेना-संचालन, राज्य, न्याय और सब लोगों का आधिपत्य वेद, शास्त्रादि का ज्ञाता ही ब्राह्मणादि कर सकता हैं, न कि क्षत्रियादि जाति विशेष।” यही बात स्पष्ट रूप से भट्टजी ने टीका में लिख दी हैं कि ‘एतत्सर्वं वेदात्मकशास्त्रज्ञ एवार्हति’ अर्थ वही हैं जो कह चुके हैं। मनुस्मृति के 9वें अध्याय में भी यही लिखा हैं कि :
प्रजापतिर्हिवैश्याय सृष्ट्वापरिददेपशून्।
ब्राह्मणायचराज्ञे च सर्वा:परिददेप्रजा:॥ 327॥
अर्थात् ”ब्रह्मा ने वैश्य को उत्पन्न करके उसके अधिकार में पशु और ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के अधिकार में सर्व प्रजा पालन दिया।” प्रथमाध्याय में भी लिखा हैं कि:
ब्राह्मणोजायमानोहिपृथिव्यामधिजायते।
ईश्वर:सर्वभूतानांधर्मकोशस्य गुप्तये॥ 99॥
सर्वस्वं ब्राह्मणस्येदं यत्किंचिज्जगतीगतम्।
श्रेष्ठयेनाभिजनेनेदं सर्वं वै ब्राह्मणो र्हति॥ 100॥
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च।
आनृशंस्याद्ब्राह्मणस्य भुजते हीतरे जना:॥ 101॥
जिसका तात्पर्य यह हैं कि ”राजा के दो काम होते हैं-(1) प्रजारक्षण, (2) कोषरक्षण। इसलिए मनुजी कहते हैं कि उत्पन्न होने के साथ ही ब्राह्मण सब प्राणियों का स्वामी और धर्म रूप कोष का रक्षक होता हैं। जो कुछ इस पृथ्वी पर हैं सभी ब्राह्मण का हैं, क्योंकि ब्रह्मा के सबसे श्रेष्ठ स्थान मुख से उत्पन्न होने से ही वह सबसे बड़ा हैं। इसलिए प्रथम सबका अधिकारी वही हो सकता हैं और उसके अभाव में ही दूसरा (क्योंकि यही उचित हैं कि प्रथम राजा का बड़ा पुत्र ही अधिकारी हो)। जो कुछ ब्राह्मण खाता, पहनता या देता हैं वह उसका ही हैं, बल्कि अन्य लोगों को जो कुछ मिला हैं उसे ब्राह्मण की कृपा ही समझनी चाहिए। महाभारत के शान्ति पर्व के राजधर्मानुशासन भाग में ऐल और वायु देवता के संवाद में 72वें अध्याय में भी यही लिखा हैं कि :
ऐलउवाच : द्विजस्य क्षत्राबंधोर्वा कस्येयं पृथ्वी भवेत्।
धर्मत: सह वित्तोन सम्यग्वायो प्रचक्ष्व मे॥ 9॥
वा. उ.। विप्रस्य सर्वमेवेदं यत्किंचिज्जगतीगतम्।
ज्येष्ठेनाभिजनेनेह तद्धर्मकुशला विदु:॥ 10॥
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्तेस्वंवस्तेस्वंददाति च।
गुरुर्हि सर्ववर्णानां ज्येष्ठ: श्रेष्ठश्च वै द्विज:॥ 11॥
पत्यभावे यथैव स्त्री देवरं कुरुते पतिम्।
आनन्तर्यात्तर्था क्षत्रां पृथ्वी कुरुते पतिम् ॥ 12॥
नारी तु पत्यभावे वै देवरं कुरुते पतिम्।
पृथ्वी ब्राह्मणलाभे क्षत्रियं कुरुते पतिम्॥ 13॥
जिसका तात्पर्य यह हैं कि ऐल (पुरूरवा) ने वायु से पूछा कि यह पृथ्वी वास्तव में धर्म दृष्टि से ब्राह्मण की हैं या क्षत्रिय की, इसे स्पष्ट रूप से कहिये। वायु ने उत्तर दिया कि जो कुछ इस पृथ्वी में हैं उसे धर्म ज्ञान में कुशल लोग ब्राह्मण का ही बतलाते हैं, क्योंकि वह सबकी अपेक्षा ज्येष्ठ हैं। ब्राह्मण जो कुछ खाता, पहनता अथवा देता हैं वह सब उसका ही हैं, क्योंकि वह सब वर्णों से ज्येष्ठ, श्रेष्ठ और सबका गुरु हैं। जिस प्रकार पूर्वनिश्चित पति के न रहने पर (मर जाने पर) उस कन्या का देवर से विवाह हो जाता हैं, वैसे ही ब्राह्मण राजा के न रहने पर क्षत्रिय पृथ्वी का पति होता हैं। यही अर्थ बाद के श्लोक का भी हैं। ‘पत्यभावे यथैव स्त्री’ का यह तात्पर्य भगवान् मनु ने कहा हैं कि :
यस्याम्रियेतकन्याया वाचासत्येकृतेपति:।
तामनेनविधानेन निजोविन्देत देवर:॥ 69॥ अ.9॥
कन्यायांदत्ताशुल्कायां म्रियेतयदिशुल्कद:॥
देवरायप्रदातव्या यदिकन्या नुमन्यते॥ 97॥ अ. 9॥
तात्पर्य यह हैं कि ”जिसके साथ विवाह की बातचीत की गयी हो वह पुरुष (पति) यदि वैवाहिक कार्य सप्तपदी आदि समाप्त होने से प्रथम ही मर जाये तो उसी सामग्री और उसी प्रकार से उसका यथोचित रीति से विवाह देवर (उक्त पति के छोटे भाई) से कर देना चाहिए। यदि किसी ने कन्या के बदले किसी कारण से कुछ ले लिया हो (यद्यपि कन्या विक्रय का निषेध इसी अध्याय के 98वें श्लोक में हैं, जैसा कि :
आददीत न शूद्रो पि शुक्लं दुहितरं ददन्।
शुक्लं हि गृह्णन् कुरुते छन्नं दुहितृविक्रयम्॥
अर्थात् ‘शूद्र भी द्रव्य लेकर कन्या न दे, क्योंकि इससे कन्या का विक्रय हो जाता हैं। अथवा आर्य विवाह में 1 या 2 जोड़े बैल लेने की आज्ञा हैं। जैसाकि मनुस्मृति के तृतीय अध्याय में लिखा हैं कि-
एकं गोमिथुनंद्वेवा वरादादाय धर्मत:।
कन्याप्रदानं विधिवार्षो धर्म: स उच्यते॥ 29॥
अर्थात् ”वर से एक या दो जोड़े बैल धर्मपूर्वक लेकर कन्यादान को आर्य विवाह कहते हैं”। परन्तु वे बैल भी विवाह काल में कन्या के पति को देने अथवा आवश्यक विवाह रूप यज्ञ कार्य सम्पादन के ही लिए जाते हैं, न कि अपने काम के लिए। क्योंकि मनुजी ने ही आगे चलकर लिखा हैं कि :
आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मृषैवतत्।
अल्पो प्येवं महान्वापि विक्रयस्तावदेव स:॥ 53 अ. 3॥
अर्थात् ”जो किसी ने आर्ष विवाह में दो बैल लेने को कहा हैं वह मिथ्या ही हैं, क्योंकि ऐसा करने से चाहे थोड़ा हो या बहुत कन्या विक्रय तो हो ही गया।” इस बात को इसी श्लोक की टीका में कुल्लूकभट्ट ने स्पष्ट कर दिया हैं। ऐसी दशा में यदि उसने बैल ले लिये हों, परन्तु विवाह कृत्य से प्रथम ही भावी पति का शरीर पात हो जाये तो यदि कन्या चाहे तो देवर से उसे ब्याह देना चाहिए।” इसलिए जो कोई पूर्वोक्त महाभारत के श्लोकों को देखकर अपनी अनभिज्ञता से कटाक्ष करता था कि वे श्लोक सनातन धर्म की दृष्टि से प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि उनके मानने से विधवा विवाह या नियोग सिद्ध हो जायेगा, उसे इस पूर्व व्याख्यान रूप अंजन से अपने ज्ञानचक्षु के दोषों का मार्जन कर लेना चाहिए। राजधर्म प्रकरण नामक आठवें अध्याय में भी मनुजी ने स्पष्ट ही कह दिया हैं कि :
यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपति:कार्यदर्शनम्।
तदानियुज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने॥ 9॥
सोस्य कार्याणि संपश्येत्सभ्यैरेव त्रिभिर्वृत:।
सभामेव प्रविश्याग्रयामासीन: स्थित एंव वा॥ 10। अ. 8॥
अर्थ यह हैं कि ”जब राजा किसी कारण से राज्य का प्रबन्ध न कर सके तो विद्वान् ब्राह्मण को उस जगह नियुक्त कर दे। वह ब्राह्मण उन कार्यों को तीन सभ्यों के सहित उत्तम सभा में बैठ अथवा खड़ा होकर उचित रीति से करे।” इसीलिए वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के 67वें सर्ग में राजा दशरथ के कोप-भवन से न लौटने पर लिखा हैं कि :
व्यतीतायां तु शर्वर्यामादित्यस्योदये तत:।
समेत्य राज्यकर्त्तार: सभामीयुर्द्धिजातय:॥
मार्कण्डेयोथ मौद्गल्यो वामदेवश्च कश्यप:।
कात्यायनो गौतमश्च जावालिश्च महायशा:॥
अर्थात् ”उस दिन रात बीतने पर सूर्योदय समय राज्य करने वाले (राज्य प्रबन्ध करने वाले) सभी महान् ब्राह्मण मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन और ज्वालि प्रभृति मिलकर सभा में आये।” इन श्लोकों में ‘राज्यकर्त्तार:’ लिखा हैं, जिसका अर्थ ‘राज्य करने वाले ब्राह्मण’ ऐसा होता हैं। इससे स्पष्ट हैं कि मुख्य राज्यकर्ता ब्राह्मण ही हैं। परन्तु उसमें बहुत झंझट और तपस्या तथा विचारादि में विघ्न देखकर जो लोग उससे उपराम हो जाते हैं वे क्षत्रियों के हाथ में उसे सौंप देते हैं। जैसे अपने भृत्यों के हाथ में किसी कार्य का प्रबन्ध सौंप दिया जाता हैं। अथवा आजकल भी बहुत से अन्य देशों में राजा के प्रतिनिधि जैसे शासन करते हैं वैसे ही ब्राह्मण लोग क्षत्रियादि को अपना प्रतिनिधि बनाकर स्वच्छन्द वेदाभ्यासादि करते थे। परन्तु जब किसी कारणवश उनके प्रतिनिधि स्वरूप क्षत्रियादि उसका प्रबन्ध न कर सकते थे तो स्वयं वे विचारशील गौतम और कात्यायनादि जैसे ब्रह्मर्षि उसका प्रबन्ध कर लेते थे। महर्षियों के इस राज्य प्रबन्ध से उस कुकल्पना का भी खण्डन हो गया जो लोग किया करते हैं कि राज्य और युद्ध करने से ही भूमिहारादि ब्राह्मण कट्टर न रहकर हीन हो गये। यदि यह कार्य कट्टर ब्राह्मणता का विरोधी होता तो क्या उन महर्षियों से भी कोई अधिक कट्टर हो सकता हैं जिन्होंने इसे किया हैं? क्या वे शास्त्र ज्ञाता न थे जिससे इसे निन्दित समझकर छोड़ देते? इस विषय में अभी बहुत वक्तव्य हैं।
प्राय: लोगों की यही धारणा हैं कि पुरोहिती ब्राह्मण को अवश्य कर्त्तव्य हैं। यद्यपि शास्त्रों का मत इस विषय में दिखला चुके हैं और दिखलायेंगे भी, तथापि इतना तो निर्विवाद हैं कि यदि किसी दशा में भी पुरोहित हो सकता हैं तो ब्राह्मण ही। क्योंकि मनुस्मृति के दशमध्याय में लिखा हैं कि :
त्रायो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात्क्षत्रियं प्रति।
अध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रह:॥ 77॥
वैश्यं प्रति तथैवैते निवर्तेरन्निति स्थिति:।
न तौ प्रति हि तान्धर्मान्मनुराह प्रजापति:॥ 78॥
अर्थात् ”ब्राह्मण के तीन कर्म याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह क्षत्रिय और वैश्य के लिए नहीं हैं, यही सिद्धान्त हैं, क्योंकि प्रजापति मनुजी ने उनके लिए वे धर्म नहीं बतलाये।” अत्रि संहिता में भी लिखा हैं कि :
प्रतिग्रहोध्यापनं च तथा विक्रेय:विक्रय:।
याज्यं चतुर्भिरप्येतै: क्षत्राविट्पप्तनम् स्मृतम्॥ 20॥
अर्थात् ”याजन, अध्यापन, प्रतिग्रह और निषिद्ध पदार्थों के विक्रय से क्षत्रिय और वैश्य पतित हो जाते हैं। अब उस पुरोहित के स्वरूप को विचारिये तो उससे भी ब्राह्मण का राज्य सम्बन्ध घनिष्ठ सिद्ध होता हैं। क्योंकि अमरकोष में ‘पुरोधास्तुपुरोहित:’ अर्थात् पुरोहित का नाम पुरोधा भी हैं, यह क्षत्रिय वर्ग में लिखा हैं, न कि ब्राह्मण वर्ग में और पुरोहित शब्द का अर्थ भी यह हैं कि जो युध्दादि सब व्यवहारों में अग्रणी हो, अर्थात् उसकी सम्मति सभी कार्यों में ली जाये। क्योंकि पुरुष अव्ययपूर्वक ‘धा’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करने पर पुरोहित शब्द सिद्ध होता हैं। जिसमें अव्यय का अर्थ ‘आगे’ हैं, और ‘धा’ धातु का अर्थ धारण करना व रखना। अर्थात् जो प्रथम रखा व माना गया हो। राजधर्म प्रकरण में ही मनुजी ने लिखा हैं कि पुरोहितं प्रकुर्वीत’ (अ. 7/75) अर्थात् राजा पुरोहित बनावे। और फिर लिखते हैं कि :
सर्वेषां तु विशिष्टेन ब्राह्मणेन विपश्चिता।
मन्त्रयेत्परमं मन्त्रां राजा षड्गुण्यसंयुतम्॥ 58॥
नित्यंतस्मिन्समाश्वस्त: सर्वकार्याणिनिक्षिपेत्।
तेन सार्ध्दंविनिश्चित्य तत:कर्मसमारभेत् ॥ 59॥ 7॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ”सर्व मन्त्रियों में श्रेष्ठ पण्डित ब्राह्मण मन्त्री से राजा सन्धि विग्रहादि सम्बन्धी बड़ी-बड़ी सलाह करे। सर्वदा ही उसका विश्वास करके सब काम करे और उसके साथ सलाह करके ही उसके बाद कार्य प्रारम्भ करे।” याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय में लिखा हैं कि :
स मंत्रिण: प्रकुर्वीत प्राज्ञान्मौलान्स्थिराञ्छुचीन्।
तै: सार्ध्दं चिन्तयेद्राज्यं विप्रेणाथ तत स्वयम्॥ 312॥
पुरोहितं प्रकुर्वीत दैवज्ञमुदितोदितम्।
दण्डनीत्यां च कुशलमथर्वांगिरसे तथा॥ 313॥
अपश्यता कार्यवशाद्वयवहारान्नृपेण तु।
सभ्यै: सहनियोक्तव्यो ब्राह्मण: कार्यदर्शने॥ 3॥ व्यव.॥
अर्थ यह हैं कि ”वह राजा श्रेष्ठ, स्थिर और पवित्र स्वभाववाले मन्त्री रखे। उनके विचारने के बाद ब्राह्मण मन्त्री से विचार कर अपने आप भी कार्य विचार करे। ज्योतिष विद्या जानने वाला, शास्त्रोक्त कर्मकारी, अर्थशास्त्रज्ञ और साम दानादि गुणों से युक्त पुरोहित रूप मन्त्री राजा बनावे। राजा यदि किसी कारण से राज्य कार्य न देख सके तो अन्य सभ्यों सहित ब्राह्मण मन्त्री को उसमें नियुक्त करे।” बौधायनस्मृति के 10वें अध्याय में लिखा हैं कि :
सर्वतोधुरं पुरोहितं वृणुयात्॥ 10॥
अर्थात् ”राज्य के सर्व कार्यों का करने वाला पुरोहित बनाये।” अग्निपुराण में लिखा हैं कि :
अभिषिञ्चदमात्यानां चतुष्टयमथो घटै:।
पूर्वतो हेमकुम्भेन घृतपूर्णेनब्राह्मण:॥ 18॥ अ. 218॥
अर्थात् ”उसके बाद चारों वर्ण वाले चार मन्त्री राजा का अभिषेक करें। उनमें से प्रथम ब्राह्मण मन्त्री घृतपूर्ण स्वर्ण घट से अभिषेक करे।” इन सब प्रमाणों से क्या यह सिद्ध नहीं होता कि ब्राह्मणों का राज्य से बहुत सम्बन्ध और उसमें अधिकार पूर्वकाल में भी था। इन अयाचक ब्राह्मणों के पूर्वज प्रथम इसी प्रकार के पुरोहित, ऋत्विक् और मन्त्री भी थे जिससे इनका व्यवहार राजसी था, जैसा कि मनु वाक्यों द्वारा दिखा चुके हैं कि क्षत्रिय, राजा और राज पुरोहित राजस कहलाते हैं और शान्ति पर्व के 76वें अध्याय में भी लिखा हैं कि :
ऋत्विक् पुरोहितो मन्त्री दूतो वार्त्तानुकर्षक:।
एते क्षत्रासमा राजन्ब्राह्मणानां भवन्त्युत॥ 7॥
अर्थात् ”ऋत्विक्, पुरोहित, मन्त्री और दूत इतने ब्राह्मण क्षत्रिय के सदृश राजस होते हैं।” इस प्रकार वे क्रमश: धनवान, बड़े-बड़े भूमिपति और जमींदार या राजे हो गये, जिससे पीछे उस राजपुरोहिती आदि को भी छोड़कर एकदम अलग हो गये। महाभारत के शान्तिपर्व के 73वें अध्याय राजधार्मनुशासन प्रकरण में लिखा हैं कि:
तञ्चैवान्वभिषिञ्चेत् तथा धार्मो विधीयते।
अग्रेयं हि ब्राह्मणे प्रोक्तं सर्वस्यैवेह धर्मत:।
पूर्वं हि ब्रह्मण: सृष्टिरिति ब्रह्मविदो विदु:॥ 29॥
ज्येष्ठेनाभिजनेनास्य प्राप्तं पूर्वं यदुत्तारम्।
तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ब्राह्मण: प्रसृताग्रभुक्॥ 30॥
अर्थ यह हैं कि ”उस पुरोहित का अभिषेक राजा करे, क्योंकि राजपाट सभी का प्रथमाधिकारी धर्म विचार से ब्राह्मण ही हैं। क्योंकि यह वार्त्ता वेदवेत्ता लोग जानते हैं कि प्रथम ब्राह्मण ही उत्पन्न हुआ। इसलिए ज्येष्ठ होने से जो कुछ मिले वह पहले ब्राह्मण का ही हैं, पीछे दूसरे का। इसलिए उसे मानना और पूजना चाहिए, क्योंकि वह सब वस्तुओं का प्रथमाधिकारी हैं।” स्कन्दपुराण के धर्मारण्य महात्म्य में बाडवों (ब्राह्मणों) के विषय में बहुत सा विवरण ग्राम और गोत्रपूर्वक दिया गया हैं और यह भी लिख दिया गया हैं कि अमुक ग्राम का अधिपति अमुक ब्राह्मण हुआ। साथ ही, स्पष्टतया लिखा गया हैं कि ‘राज्यं चक्रुर्वनस्य’ अर्थात् उस धर्मारण्य का राज्य बड़ी ब्राह्मण करते थे। महाभारत के आदिपर्व के 113वें अध्याय में स्वपुत्र अश्वत्थामा को दूध पीने के लिए एक गौ की आवश्यकता होने पर वह द्रोणाचार्य को द्रुपद से मित्रता में माँगनी पड़ी हैं। वे चाहते तो आजकल की भाँति उन्हें सहस्रों गायें मिल जातीं। परन्तु उन्हें प्रतिग्रह से डरकर ऐसा करना पड़ा। जब द्रुपद ने कोरा जवाब दिया कि राजा का मित्र भिक्षु (ब्राह्मण) न होकर राजा ही होता हैं, इसलिए आपसे मेरी मैत्री नहीं हो सकती। हाँ एक दिन के लिए भोजन मिल सकता हैं, तो द्रोणाचार्य रुष्ट होकर लौट गये हैं। इसी समय भीष्म पितामह ने उनसे मिल सब हाल जानकर कहा हैं कि :
अपज्यं क्रियतां चापं साधवस्त्रां प्रतिपादय।
भुङ्क्ष्व भोगान् भृशं प्रीत: पूज्यमान: कुरुक्षये॥ 64॥
कुरूणामस्ति यद्वित्तां राज्यंचेदं सराष्ट्रकम्।
त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव॥ 65॥
अर्थात् ”आप धनुष रख दीजिये, इन बच्चों को शस्त्रास्त्र विद्या सिखलाइये और कौरवों द्वारा पूजित होकर इनके देश में प्रसन्नतापूर्वक भोग भोगिये। कौरवों का जो धन और राज्य हैं वह सब आप ही का हैं और वे लोग भी आपके ही हैं। इसके बाद जब कौरव-पाण्डवों को युद्ध विद्या में कुशल करके पुराना बदला चुकाने के लिए उन्हें द्रुपद को पकड़ने को भेजा हैं और अर्जुन उसे परास्त करके पकड़ लाये हैं, तब द्रोणाचार्य ने शान्तिपर्व के 140वें अध्याय में कहा हैं कि :
अराजा किल नो राज्ञ: सखा भवितुमर्हति।
अत: प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन मया तव॥ 68॥
राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तारे।
सखायं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे॥ 69॥
माकन्दीमथ गंगायास्तीरे जमपदायुताम्।
सोध्यावसद्दीनमना: काम्पिल्यं च पुरोत्तामम्॥ 72॥
दक्षिणांश्चापि पाञ्चालान्यावच्चर्मण्वतीनदीम्।
अहिच्छत्रां च विषयं द्रोण: समभिपद्यत॥ 75॥
एवं राजन्नहिच्छत्रा पुरी जनपदायुता।
युधि निर्जित्य पार्थेन द्रोणाय प्रतिपादिता॥ 76॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ”हे द्रुपद! क्योंकि जो राजा नहीं हैं वह राजा का मित्र नहीं हो सकता, इसलिए ही मैंने तुम्हारा राज्य लेने का यत्न किया हैं। यदि तुम चाहो तो गंगा से दक्षिण के देश का राजा रहो और मैं उत्तर का और मुझे अब से मित्र समझो। इसके बाद वह द्रुपद खिन्न चित्ता होकर गंगा तट में माकन्दी में राजधनी बनाकर रहने लगा, जिसके आश्रित बहुत से प्रान्त थे और काम्पिल्यपुर और दक्षिण पाञ्चाल भी चर्मण्वती (वेतवा) नदी तक उसी के अधिकार में था। उत्तर पाञ्चाल अर्थात् अहिच्छत्रादि प्रदेशों के राजा द्रोणाचार्य हुए। इस प्रकार से बहुत से प्रदेशों सहित अहिच्छत्रापुरी को अर्जुन ने युद्ध में जीतकर द्रोणाचार्य को उसका राजा बना दिया।
स्कन्दपुराण के नागर खण्ड 68 और 69वें अध्याय में लिखा हैं कि :
सूत उवाच :
भार्गवोपि च तं हत्वा रक्तमादाय कृत्स्नश:।
तत्रा संप्रेषयामास यत्रा गर्ताथ पैतृकी ॥ 2॥
न सवालं न वृध्दं च परित्यजति भार्गव:।
यौवनस्थं विशेषण गर्भस्थं वाथ क्षत्रियम्॥ 3॥
प्रत्यक्षं सर्वविप्राणां तथा न्येषां तपस्विनाम्।
प्रतिज्ञां पूरयित्वाथ स विशोको बभूव ह॥ 8॥
ततो नि:क्षत्रिये लोके कृत्वा हयमखं च स:।
प्रायच्छत्सकलामुर्वीं ब्राह्मणेभ्यश्च दक्षिणाम्॥ 9॥
अथ लब्धावराविप्रास्तमूचुर्भृगुसत्तामम्।
नास्मद्भूमौ त्वया स्थेयमेको राजा यत: स्मृत:॥ 10॥
सोपि बाढ़मिति प्रोच्य हर्षेण महतान्वित:।
महीपर्यन्तमासाद्य प्रोवाचाथ नदीपतिम्॥ 11॥
आरोप्य सुमहच्चापमाग्नेयास्त्रां प्रयुज्य च।
त्रिशिखां भृकुटीं कृत्वा कोपेन महतान्वित:॥ 12॥
त्रिशिखां भृकुटीं कृत्वा कोपेन महतान्वित:॥ 12॥
रामउवाच।
मया नि:क्षत्रिया भूमि:कृता शैलवनान्विता।
ब्राह्मणेभ्यस्ततो दत्ता वाजिमेधो महामखे॥ 13॥
तस्मात्वं देहि मे स्थानं कृत्वापसरणं स्वयम्।
नहि दत्तवा ग्रहीष्यामि विप्रेभ्यो मेदिनीं पुन:॥ 14॥
न करोष्यथवा वाक्यं ममाद्य त्वं नदीपते।
स्थलरूपं करिष्यामि वद्द् यस्त्रा परिशोषितम्॥ 15॥
स्थलरूपं करिष्यामि वद्द् यस्त्रा परिशोषितम्॥ 15॥
सूत उवाच।
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा समुद्रो भयसंकुल:।
अपसारं ततश्चक्रे यावत्तास्याभिविञ्छतम्॥ 16॥
ततश्चकार तत्रौव वसतिं स भृगुद्वह:।
तपश्चर्या समायुक्त: पितुर्वधामनुस्मरन्॥ 17॥ अ. 68
तपश्चर्या समायुक्त: पितुर्वधामनुस्मरन्॥ 17॥ अ. 68
सूत उवाच।
ततो नि:क्षत्रिये लोके क्षत्रिण्यो वंशकारणात्।
क्षेत्रजान् ब्राह्मणेभ्यश्च सुषुबुस्तनयान्वरान्॥ 1॥
ते च वृध्दिं समासाद्य क्षेत्रजा: क्षत्रियोपमा:।
जगृहुर्मेदिनीं वीर्यात्संनिरस्य द्विजोत्तामान्॥ 2॥
ततस्ते ब्राह्मणा: सर्वे परिभूतिपदं गता:।
प्रोचुर्भार्गग्वमभ्येत्य दु:खेन महताविन्ता:॥ 3॥
राम राम महाबाहो यत्तवया वसुधा च न:।
वाजिमेधो मखे दत्ता हृता सा क्षत्रियैर्बलात्॥ 4॥
तस्मान्नो देहि तां भूतो हत्वा तान्क्षत्रियाधामान्।
कुरु श्रेयोभिवृध्दिं तां यद्यस्ति तव पौरुषम्॥ 5॥
ततो राम: क्रुधाविष्टो भूयस्तै: शबरै: सह।
पुलिन्दैर्मेदकैश्चैव क्षत्रियान्ताय निर्ययौ॥ 6॥
तत्रौव क्षत्रियान् हत्वा रक्तमादाय तद्बहु।
तां गत्तरां पूरयामास चकार पितृतर्पणम्॥ 7॥
प्रददौ ब्राह्मणेभ्यश्च वाजिमेधो धारां पुन:।
तैश्च निर्वासितस्तत्रा जगामोदधिसन्निधौ॥ 8॥
एवं तेन कृता पृथ्वी सर्वक्षत्राविवर्जिता।
त्रि:सप्तवारं विप्रेन्दा:! द्विजेभ्यश्चनिवेदिता॥ 9॥ अ. 69
त्रि:सप्तवारं विप्रेन्दा:! द्विजेभ्यश्चनिवेदिता॥ 9॥ अ. 69
भावार्थ यह हैं कि ”सूतजी ने कहा कि परशुराम ने सहार्जन को मार सब रक्त लेकर जहाँ पितृ तर्पण के लिए कुरुक्षेत्र में पाँच कुण्ड बनाये थे वहाँ भेज दिया। वे बाल, वृद्ध, गर्भस्थ और विशेषकर युवा क्षत्रिय को मारे बिना न छोड़ते थे। इस तरह सब ब्राह्मणों और तपस्वियों के सम्मुख अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर वे शोक रहित हो गये। इस प्रकार लोक को क्षत्रिय शून्य बना अश्वमेधा यज्ञ करके उसमें उन्होंने सब पृथ्वी कश्यप प्रभृति ब्राह्मणों को दक्षिणा दे दी। अब पृथ्वी का राज्य पाने पर उन ब्राह्मणों ने परशुरामजी से कहा कि हमारे राज्य में मत रहिये, क्योंकि एक राज्य में एक ही राजा रह सकता हैं। वे भी बहुत प्रसन्नतापूर्वक अच्छा कह पृथ्वी के किनारे समुद्र तट पर आकर, जिस समय उससे बोले उस समय वे महान् धनुष को चढ़ा, आग्नेयास्त्र का प्रयोग कर और भृकुटी टेढ़ी करके महान् कोपयुक्त हो रहे थे। उन्होंने कहा कि मैंने पर्वत और वन सबके सहित पृथ्वी क्षत्रिय रहित करके अश्वमेधा यज्ञ में ब्राह्मणों को दे दी। इसलिए तुम मुझे वासस्थान दो और यहाँ से हट जाओ, क्योंकि ब्राह्मणों को देकर फिर मैं उनसे भूमि छीन नहीं सकता। यदि तू मेरी बात न मानेगा तो आज ही अग्न्येस्त्र से तुझे सुखाकर स्थलरूप बना दूँगा। समुद्र उनका वचन सुन डरकर उतनी दूर हट गया जितना उन्हें इष्ट था। उसके बाद परशुरामजी उसी जगह वासस्थान बना पिता के वध का स्मरण करते हुए तपस्या करने लगे। इस प्रकार जब पृथ्वी क्षत्रियों से रहित हो गयी तो उनकी स्त्रियों ने ब्राह्मणों द्वारा श्रेष्ठ क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न किये, क्योंकि क्षेत्रज भी पुत्र हुआ करते हैं। वे क्षेत्रज बालक क्षत्रिय सदृश हुए और उन्होंने बलपूर्वक उन ब्राह्मणों को निकालकर पृथ्वी दबा ली। उसके बाद ब्राह्मण हार मानकर बहुत दु:खी हो परशुरामजी के पास आकर उनसे कहने लगे कि हे राम! जो पृथ्वी आपने हम लोगों को अश्वमेधा में दक्षिणा दी थी उसे क्षत्रियों ने छीन लिया। इसलिए यदि आपमें बल हैं, तो उन नीच क्षत्रियों को मार हमें पृथ्वी का राज्य पुन: देकर हमारा कल्याण करिये। यह सुनते ही परशुरामजी क्रोध से लाल हो बहुत से शबरों, पुलिन्दों और मेदकों के साथ उन क्षत्रियों का नाश करने के लिए निकले और उसी जगह उन क्षत्रियों को मार उनका रक्त लेकर उन पाँच गर्तों की भर दिया और उसी से पितृतर्पण किया। जब फिर उन्हें ब्राह्मणों ने अपने राज से निकाल दिया तो उसी समुद्र के पास चले गये। इसी प्रकार उन्होंने क्रमश: 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय शून्य कर उसका राज्य ब्राह्मणों को दे दिया।”
महाभारत के शान्तिपर्व में भी जहाँ पर पूर्वोक्त परशुरामजी का आख्यान हैं वहीं 49वें अध्याय में सहार्जुन के यज्ञ में भी ब्राह्मणों को पृथ्वी राज्य की प्राप्ति इस प्रकार लिखी हैं कि :
एतस्मिन्नेव काले तु कृतवीर्यात्मजो बली।
अर्जुनो नाम तेजस्वी क्षत्रियो हैंहयाधिप:॥ 35॥
दत्तात्रोय प्रसादेन राजा बाहुसहवान्।
चक्रवर्ती महातेजा विप्राणामाश्वमेधिके॥ 36॥
ददौ स पृथ्वीं सर्वां सप्तद्वीपां सपर्वताम्।
स्वबाह्नस्त्राबलेनाजौ जित्वा परमधर्मवित्॥ 37॥
इसका अर्थ यह हैं कि ”इसी समय (जिस समय परशुरामजी का जन्म हुआ) कृतवीर्य का पुत्र, महाबलवान् और अर्जुन नाम का क्षत्रिय हैंहय देश का राजा था। दत्तात्रेय की कृपा से जिसे सहबाहु मिले थे, ऐसे चक्रवर्ती राजा अर्जुन ने अश्वमेधा यज्ञ में, अपने बाहु और अस्त्र बल से पर्वत सहित सप्तद्वीपर्वती पृथ्वी जीतकर ब्राह्मणों को यज्ञ में दक्षिणा दे दी।” क्या इन सब आख्यानों से ब्राह्मणों के राजा होने से अब भी कोई सन्देह रह गया? इससे स्पष्ट हैं कि प्रथम जो ब्राह्मण अयाचक दल वाले थे, वे मन्त्री ही और अस्त्र, शस्त्रादि विद्या द्वारा एवं जो याचक दल वाले थे, वे ऋत्विक् और पुरोहित हो बड़े-बड़े राज्याधिकारी और जमींदार होकर एक ही अयाचक दलवाले होते गये और पश्चात् पुरोहिती और यजनादि भी उनका इसीलिए छूटता गया। विष्णुपुराण के चतुर्थांश के 24वें अध्याय में लिखा हैं कि :
मगधयां तु विश्वस्फटिकसंज्ञो न्यान्वर्णान् करिष्यति॥ 61॥
करैवत्तावटुपुलिन्दब्राह्मणान्राज्ये स्थापयिष्यति॥ 63॥
”कलि में मगधपुरी अथवा मगध देश में विश्वस्फटिक नाम का एक प्रतापी पुरुष क्षत्रिय से अन्य वर्ण कैवर्त, वटु, पुलिन्द और ब्राह्मणों को राजा बनायेगा।” वायुपुराण के 58वें अध्याय में लिखा हैं कि :
गोत्रोण वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमितिरुच्यते।
माधावस्य तु सों शेन पूर्वं स्वायम्भुवे न्तरे॥ 76॥
समा: स विंशतिं पूर्णा: पर्यटन्वै वसुन्धाराम्।
आचकर्ष च वै सेनां सवाजिरथकुञ्जराम्॥ 77॥
प्रगृहीतायुधौर्विप्रै: शतशोथ सहश:।
स तदा तै: परिवृतो म्लेच्छान्हन्ति सहम्त्राश:॥ 78॥
अर्थ यह हैं कि ”प्रथम स्वायम्भुव मन्वन्तर में चन्द्र गोत्र में प्रमिति नाम का (कल्कि भगवान् की जगह) विष्णु के अंश से एक ब्राह्मण उत्पन्न हुआ था जिसने पूरे 20 वर्ष पृथ्वी में घूमकर घोड़े और हाथी सहित सेना एकत्रित की और आयुध धारण करने वाले हजारों ब्राह्मणों को साथ ले बहुत से म्लेच्छों का नाश किया।” फिर 60वें अध्याय में चलकर लिखते हैं कि :
उर्व्यां जातास्तु ये शूद्रा ब्राह्मणानां निवेदिता:।
वृत्तयर्थं ब्रह्मयज्ञार्थं करस्तेषु कृतो महान्॥ 74॥
अनेन विधिना जातं विप्राणां शासनं महत्॥ 75॥
अर्थात् ”उस कलि में जब प्राय: शूद्र ही ब्राह्मणों के अधीन रह गये तो ब्राह्मणों ने जीविका और यज्ञादि के लिए उन्हीं पर कर लगाया। इस प्रकार से पृथ्वी में ब्राह्मणों का राज्य स्थिर हुआ।” और उसी के 57वें अध्याय में लिखा हैं कि :
श्रूयन्ते हि तप: सिद्धा ब्रह्मक्षत्रमया नृपा:॥ 121॥
अर्थात् ”बहुत से ब्राह्मण और क्षत्रिय राजे तपोबल से सिद्ध हो गये सुने जाते हैं।” मत्स्यपुराण के 272वें अध्याय में लिखा हैं कि :
ब्राह्मणास्तु चतुर्विंश भविष्यन्ति शतं समा:।
तत: प्रभृत्ययं लोक: सर्वो व्यापत्स्यते भृशम्॥ 44॥
चत्वारिंशद्द्विंजा ह्येते काण्वा भोक्ष्यन्ति वै महीम्।
चत्वारिंशत्पंच चैव भोक्ष्यन्तीमां वसुन्धाराम्॥ 35॥ 271॥
अर्थात् 100 वर्षों तक 24 ब्राह्मण राज्य करेंगे, इसके बाद सम्पूर्ण लोक विपत्तिग्रस्त होगा। कण्ववंशीय 40 ब्राह्मण 45 वर्षों तक इस पृथ्वी का राज्य करेंगे।”
‘ब्राह्मण राज परिचय’ नामक ग्रन्थ में एक मैथिल परमहंस महोपदेशक ने ब्राह्मणों के राज्यधिकार में श्रुतियाँ भी लिखी हैं। यथा ‘ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्दत’ (ऋग्वेद) और इस प्रकार उसका अर्थ किया हैं कि ”पृथ्वी का राज्य प्रथम ब्राह्मणों ने प्राप्त किया।” और भी लिखकर उसका अर्थ बतलाया हैं। यथा ‘अस्माकं ब्राह्मणानां राजा’ (यजुर्वेद), ‘ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो न वैश्य:’ (अथर्ववेद)। अर्थ यह हैं कि ”हम ब्राह्मणों में से वह राजा हैं। राजा ब्राह्मण ही हैं, क्षत्रिय व वैश्य नहीं।” इस प्रकार से श्रुति, स्मृति, पुराण और सदाचारों से सिद्ध हैं कि ब्राह्मण राजा होते थे और होते हैं तथा यह उनका शास्त्रोचित धर्म हैं। इससे कट्टर ब्राह्मणता में कोई धब्बा नहीं लग सकता। इस विषय में बहुत से नये एवं प्राचीन इतिहास भी दिखलायेंगे।
जब ब्राह्मण का राज्य करना सिद्ध हो गया तो युद्ध तो उसके लिए अर्थ सिद्ध हो गया। क्योंकि राज्य के साथ उसका घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। इसके विषय में प्रथम वायुपुराण का प्रमाण भी दिखला चुके हैं। महाभारत के शान्तिपर्व में किया हैं कि:
ब्राह्मणस्यापि चेद्राजन् क्षत्राधार्मेणर् वत्तात:।
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रांहि ब्रह्मसम्भवम्॥ अ.॥ 22॥
जिसका अर्थ यह हैं कि ”अर्जुन ने युधिष्ठिर महाराज से कहा हैं कि हे राजन्! जब कि ब्राह्मण का भी इस संसार में क्षत्रिय धर्म अर्थात् राज्य और युद्धपूर्वक जीवन बहुत ही श्रेष्ठ हैं, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मणों से ही हुए हैं, तो आप क्षत्रिय धर्म का पालन करके क्यों शोक करते हैं?” आगे चलकर 78वें अध्याय में लिखा हैं कि :
ब्राह्मणास्त्रिषु वर्णेषु शस्त्रां गृह्णन् न दुष्यति।
एवमेवात्मनस्त्यागान्नान्यं धर्मं विदुर्जना:॥ 29॥
ब्राह्मणस्त्रिषु कालंषु शस्त्रां गृह्णन् न दृष्यति।
आत्मत्राणे वर्णदोषे दुर्दम्यनियमेषु च॥ 34॥
उनर्मय्यादे प्रवृत्तो तु दस्युभि: संगरे कृते।
सर्वे वर्णा न दुष्येषु: शस्त्रावन्तो युधिष्ठिर॥ 18॥
अर्थात् अन्य तीन वर्णों के ऊपर शस्त्र चलानेवाला (युद्धकर्ता) ब्राह्मण दूषित नहीं होता, क्योंकि किसी आवश्यक कार्यवश इस प्रकार आत्मत्याग करने से बढ़कर कोई भी धर्म नहीं माना जाता। युद्ध करनेवाले ब्राह्मण को तीनों काल में कोई दोष नहीं हैं, विशेषकर अपनी रक्षा, वर्णों की रक्षा और बड़े-बड़े दुष्टों को दबाने के लिए। जब दुष्ट लोगों के युद्ध करने से शस्त्रीय मर्यादा टूटने लगे तो सभी ब्राह्मणादि युद्ध करने से दूषित नहीं होते।” मत्स्यपुराण के 103वें अध्याय में लिखा हैं कि :
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि क्षत्रीधर्मव्यस्थितिम्।
नैव दुष्टं रणे पापं युध्यमानस्य धीमत:॥ 21॥
किं पुन: राजधार्मेण क्षत्रियस्य विशेषत:॥ 22॥
अर्थात् ”हे राजन् (युधिष्ठिर) क्षत्रिय धर्म की व्यवस्था सुनिये। जबकि किसी भी लड़ाई में युद्ध करनेवाले को पाप नहीं होता, तो राजा होकर युद्ध करने वाले का क्या कहना हैं, उस पर भी विशेषकर क्षत्रिय का?” मत्स्यपुराण के 214वें अध्याय राजधर्म प्रकरण में लिखा हैं कि :
कुलीन: शीलसम्पन्नो धानुर्वेदविशारद:।
हस्तिशिक्षाश्वशिक्षासु कुशल: शलक्ष्मणभाषिता॥ 8॥
निमित्तो शकुने ज्ञाता वेत्ता चैव चिकित्सिते।
कृतज्ञ: कर्मणां शूरस्तथा क्लेशसहो ऋजु:॥ 9॥
व्यूहतत्त्वविधानज्ञ: फल्गुसारविशेषवित्।
राज्ञा सेनापति: कार्यो ब्राह्मण: क्षत्रियोथवा॥ 10॥
अर्थात् ”कुलीन, शीलवान, धनुर्वेद में निपुण, हस्तियों और अश्वों की शिक्षा में कुशल, मधुरभाषी, शकुनादि तथा चिकित्सा का ज्ञाता, कृतज्ञ, लड़ने में बहादुर, क्लेश सहन करने वाला, सरल स्वभाव, सेना रचना की विधि का ज्ञाता और छोटी-बड़ी बातों का विचार करनेवाला सेनापति ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय को रखना राजा के लिए उचित हैं।” अग्निपुराण के 220वें अध्याय में भी लिखा हैं कि :
सोभिषिक्त: सहामात्यो जयेच्छत्रून्नृपोत्ताम:।
राज्ञा सेनापति: कार्यो ब्राह्मण: क्षत्रियो थवा॥ 1॥
अर्थात् ”अभिषेक के अनन्तर राजा मन्त्रियों सहित होकर शत्रुओं को जीते, जिसके लिए ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय को सेनापति बनावे।”
जब कर्ण ने द्रोणाचार्य से ब्रह्मास्त्र का ज्ञान माँगा हैं तो उन्होंने उत्तर दिया हैं कि :
ब्रह्मास्त्रां ब्राह्मणो विद्याद्यथावच्चरितव्रत:।
क्षत्रियो वा तपस्वी योनान्योविद्यात्कथंचन॥ 13॥
स तु राममुपागम्य शिरसाभिप्रणम्य च।
ब्राह्मणो भार्गवो स्मीति गौरवेणाभ्यगच्छत॥ 15 शां॥ 2
अर्थात् ”ब्रह्मास्त्र केवल शास्त्रोक्ताचार वाला ब्राह्मण ही जान सकता हैं, अथवा क्षत्रिय जो तपस्वी हो, दूसरा नहीं। यह सुन वह परशुरामजी के पास, मैं भृगु गोत्री ब्राह्मण हूँ, ऐसा बनकर ब्रह्मास्त्र सीखने गया हैं।” अन्त में जब उन्हें उसका छल विदित हो गया तो उन्होंने शाप दिया हैं कि :
तस्मादेतन्न ते मूढ ब्रह्मास्त्र प्रतिभास्यति॥ 30॥
अन्यत्रा वधाकालात्तो सदृशेन समेयुष:।
अब्राह्मणे नहि ब्रह्म धु्रवं तिष्ठेत्कथंचन॥ 31॥ शां. 3
अर्थात् ”हे मूढ़, इसलिए ब्रह्मास्त्र का ज्ञान तुझे न रहेगा, केवल उस काल को छोड़कर जब तेरे बराबर वाले से तेरा वध होने लगेगा। क्योंकि यह ब्रह्मास्त्र ब्रह्म ठहरा। इसलिए ब्राह्मण से भिन्न के पास नहीं रह सकता।” इसके अतिरिक्त परशुराम, द्रोण, कृपाचार्य और अश्वत्थामा विप्र धुरन्धारों के युध्दों को कौन नहीं जानता? इन पूर्वोक्त पुराण और महाभारतादि के वचनों और द्रोणादिक दृष्टान्तों से ऐसा कहने वालों का मत निर्मूल हो गया कि यदि ब्राह्मण को युद्ध करना हैं भी तो केवल आपत्तिकाल में। क्योंकि द्रोणादि के ऊपर कौन-सी आपत्ति थी? और जब राजा का सेनापति ब्राह्मण ही हो सकता हैं, तब तो युद्ध ब्राह्मणों के लिए आपद्धर्म बतलाना नितान्त भूल हैं। किं बहुना, जब उनके लिए राज्य आपद्धर्म नहीं हैं कि तो युद्ध कैसे हो सकता हैं? अतएव मनुस्मृति में स्पष्ट रूप से 8वें अध्याय में लिखा हैं कि :
शस्त्रांद्विजातिभिर्ग्राह्यं धार्मोयत्रोपरुध्यते।
द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते॥ 348॥
आत्मनश्च परित्राणे दक्षिणानां च संगरे।
स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च घ्नन्धार्मेण न दुष्यति॥ 349॥
कुल्लूकभट्ट ने भी टीका में साफ लिखा हैं कि ‘ब्राह्मणाद्यैस्त्रिभिर्वर्णै:।’ अर्थात् ”जिस समय वर्णाश्रम धर्म में कोई विघ्न उपस्थित हो, कालवश ब्राह्मणादि वर्णों में परम युद्ध छिड़ जाये, अन्नादि द्वारा अपनी जीविका तथा शत्रु से रक्षा करने का अवसर हो, दक्षिणा में प्राप्त गौ प्रभृति को कोई छीनने लग जाये, अथवा चतुर लड़ाकों से काम पड़ जाये, तो ब्राह्मणादि तीनों वर्णवाले सभी युद्ध कर सकते हैं, और धर्म युद्ध से शत्रुओं को मारने में दोष भागी नहीं होते हैं।” इस पूर्वोक्त मनुवाक्य से जो बुद्धिमान ऐसा अर्थ निकालते हैं कि इतना अवसर गिनाने से युद्ध ब्राह्मण का आपद्धर्म सिद्ध होता हैं, उनकी बुद्धि की बलिहारी हैं। क्योंकि इतने ही तो अवसर युद्ध के लिए क्षत्रियों को भी पड़ते हैं। क्या उनके लिए व्यर्थ भी लड़ने की आज्ञा हैं? गिनाने का तात्पर्य तो केवल यह हैं कि जिसमें कोई भी वर्ण मनमाना हर घड़ी शस्त्रादि लेकर धूम न मचाता रहे।
इस प्रकार जब ब्राह्मण का शास्त्रोक्त धर्म युद्ध सिद्ध हो गया, तो जो कहीं-कहीं महाभारतादि में इसकी नाममात्र की कुछ निन्दा आती हैं, उसका सामान्य रीति से युद्ध को निन्दित ठहराने में तात्पर्य नहीं हैं। किन्तु दशा विशेष के लिए हैं। अर्थात् उसका मुख्य तात्पर्य यह हैं कि ब्राह्मण भी यह न समझ ले कि क्षत्रिय की तरह मेरा भी मुख्य धर्म युद्ध ही हैं। क्योंकि ऐसा समझने से अपने मुख्य धर्म वेदाभ्यास से वंचित हो जायेगा। जैसा जब कृषि, वाणिज्यादि को ब्राह्मणों का सनातन धर्म सिद्ध कर चुके हैं, तो उसके विषय में जो कुछ निन्दा कहीं-कहीं आती हैं कि :
गोरक्षकान्वाणिजिकांस्तथकारुकुशीलवान्।
प्रेष्यान्वाधरुषिकांश्चैव विप्राञ्शूद्रवदाचरेत्। 102॥ म. 8॥
कृषिकर्मरतो यश्च गवां च प्रतिपालक:।
वाणिज्यव्यवसायश्च स विप्रोवैश्यउच्यते। 378 अत्रिसंहिता।
अर्थात् ”गोरक्षक, वाणिज्य करनेवाले, नट, दूत और सूदखोर ब्राह्मण के साथ गवाही के समय शूद्रवत् व्यवहार करना चाहिए। कृषि करने वाला, गोपालक और वाणिज्य करनेवाला ब्राह्मण वैश्य कहलाता हैं। इन सभी का तात्पर्य केवल अनापत्ति काल में अपने हाथ में (स्वयंकृत) कृषि, वाणिज्य, गोपालन और कुसीद (सूद का व्यवहार) करने में हैं। यानी अनापत्तिकाल में अपने हाथ से कृत्यादि करने में ब्राह्मण वैश्य या शूद्रवत् हो सकता हैं, परन्तु आपत्तिकाल में तो उसे करने से भी नहीं। क्योंकि अनापत्ति में अस्वयंकृत और आपत्ति में स्वयंकृत कृष्यादि का विधान पूर्वसिद्धकर आये हैं, और विहित कर्म करने से कोई भी दोष भागी या नीच-ऊँच नहीं हो सकता।
अत: यह भी कथन, कि युध्दादि करने के कारण ही ये अयाचक ब्राह्मण अपने समाज में नीचे देखे जाने लगे, सर्वथा असंगत हैं। क्योंकि द्रोण और कृपाचार्य को कौन नीचा देखने वाला था, हैं या होगा? इस प्रकार यदि कोई शास्त्रोक्त करने से समाज में हीन समझा जाये तो सन्ध्या, अग्निहोत्रदि जो कुछ अवशिष्ट हैं वे भी रसातल को ही पहुँच जाये। यदि कोई ब्राह्मण सांसाररिक झंझटों से उपराम हैं तो वह युध्दादि मत करे और उसके लिए वह उचित भी नहीं हैं। परन्तु जो लोग सांसारिक पदार्थों से विरक्त न होकर प्रतिष्ठा, राज्य और लक्ष्मी प्रभृति पदार्थों के अभिलाषी हैं, उनके लिए युद्ध क्यों उचित नहीं और वे उसे क्यों न करें एवं ऐसा करने से हीन क्यों समझे जाये? शास्त्रीय रीति से तो हमें इसमें कोई कारण दीख नहीं पड़ता। अत: निर्विवाद सिद्ध हैं कि इस प्रकार बहुत से अयाचक और याचक दल वाले भी ब्राह्मण युध्दादि द्वारा समय-समय पर राज्य और जमींदारी स्थापित करते और फलत: एक पृथक् दल वाले बनते गये।
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