अनर्गल अलाप
अनर्गल अलाप
देश को सशक्त देश के नागरिक बनाते हैं और उस सशक्तिकरण को लम्बे समय
तक बनाए रखने का दायित्व उस देश के वैचारिक विद्वानों का होता है। यदि बात
लोकतंत्र के सापेक्ष में की जाए तो न्यायपालिका और मीडिया की यह जिम्मेदारी बनती
है कि देश को मजबूत बनाने के लिए सदैव तत्पर रहें।
विगत कई वर्षों से कुछ ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं जोकि भारत में पहले
कभी नहीं हुई। कुछ नए शब्दों का प्रादुर्भाव हुआ है या यूं कहें कि इन शब्दों को
जबरन बनाया गया है।
असहिष्णुता – ये क्या होता है, यह तो बाद की बात है, आज भी
इसको बोलने में सामान्य लोगों को दिक्कत होती है। अब रही बात असहिष्णुता की तो जो
लोग सामान्य लोगों की श्रेणी से भिन्न हैं और उन्हें अति विशिष्ट श्रेणी में रखा
जाता है, वे लोग कहते हैं कि देश में असहिष्णुता है, तो शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति
हो जो उन महाशय की राजनीतिक मनोदशा को न समझ सका हो।
हां अगर यही बात देश की आम जनता ने कही होती तो बात विचारणीय हो जाती
है। लेकिन कुछ लोग आपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण जबरन ऐसी बातों को फैलाने में
लगे रहते हैं, जिनका जन-मानस से प्रत्यक्ष और आप्रत्यक्ष कोई संबंध है ही नहीं।
अभिव्यक्ति की आजादी - जानकर अच्छा लगता है
कि लोगों के दिल में आजादी के प्रति कितनी जागरुकता है। कम से कम बोलने के लिए तो
आजादी की भावना आ गई है। बोलने के चक्कर में क्या-क्या बोल जाते हैं बस ये पता
नहीं होता है। देश को तोड़ने वालों के पक्ष में खड़े होकर कहने लगते हैं की ये तो
अभिव्यक्ति की आजादी का हनन है। ऐसा लगता है कि यह अधिकार अभी कुछ ही वर्षों पहले
मिला है तभी इस अधिकार के प्रति नयी जागरुकता आयी है।
ये अधिकार हमारे पास आजादी के बाद से है पर अब इसका शोर क्यो मचाया जा
रहा है ये बात सभी जानते हैं। नागरिकों की आजादी का हनन जिस राजनीतिक पार्टी ने
सर्वाधिक किया है उसी के अन्ध समर्थकों को ये अधिकार अभी प्राप्त हुआ है जिसके
कारण वे अपने अधिकार के प्रदर्शन करने में इतना खो जाते हैं कि आतंकियों का भी
समर्थन बड़े गर्व से करने लगते हैं और कहते हैं कि यह तो अभिव्यक्ति की आजादी है।
लोकतंत्र खतरे में है – ये बिल्कुल नया-नया शब्द है, बस यूं समझ लीजिए की
एक परिवार की खुशामदी करने वाले लोगों ने इसे उस राजनीतिक परिवार के प्रति समर्पण
को जताते हुए अभी बनाया है।
इसके स्थान पर यदि यह कह देते कि चापलूसी, परिवारवाद, आतंकियों को
बड़वा देने की विचारधारा या फिर किसी पार्टी का अस्तित्व खतरे में है तो
शत-प्रतिशत सत्य भी होता।
जब व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति न हो सके, तो देश हित की बात करने
वाले लोगों की मूर्खता के ऐसे अनेकों प्रमाण यानी कि नव सृजित शब्दावली है जो ये
सिद्ध कर रही है कि जो लोग देश हित से
परेय होकर सिर्फ अपने हित की बात करते हैं, उनके अन्दर तिलमिलाहट हो रही है। अपने
कष्ट को अपना न कह कर देश के सन्दर्भ में जोड़ने का निरर्थक प्रय़ास करते रहते है।
असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की आजादी या फिर लोकतंत्र को खतरा आदि-आदि
इत्यादि जो बातें कही जा रही है इनका कभी भी जन-मानस से संबंध नहीं रहा है। पर
मसाला बना-बना कर इनको ऐसे पेश किया जाता है कि देश में बस यही बचा है बांकि कुछ
नहीं। यदि इन अनर्गल अलापों के स्थान पर जनता से जुड़ी समस्याएं जैसे कि गरीबी,
रोजगार, शिक्षा, सामाजिक समस्याएं आदि पर कभी बात हुई होती तो जो लोग भारत के
राजनीति के हासिए पर चले गए हैं वे आज इस शर्मनाक स्थिति में न होते। जो लोग जनता
को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें उसी जनता ने कितनी बार हार की धूल चटाई
है शायद वे भूल जाते हैं फिर भी इन सभी बेतुकी बातों को अपना ढाल बनाने का प्रयास
करते रहते हैं।
अनर्गल अलाप को छोड़िए और देश की जनता से जुड़े मुद्दे चुनिए ताकि आने
वाले समय में जनता आपको चुने।
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