भारतीय संस्कृति : चरित्र की संस्कृति

भारतीय संस्कृति : चरित्र की संस्कृति
हम सभी बड़े गर्व से कहते हैं कि भारत देश दुनिया का सबसे युवा देश है। हमारी जनसंख्या में युवाओं की अधिकता है। परन्तु मात्र युवा होना ही हमारे लिए गर्व की बात हो यह बेईमानी है। वास्तव में किसी देश युवा तभी सामर्थ्यवान होता है, जब युवाओं उस देश की संस्कृति से जुड़ा हुआ हो। जिस देश युवा अपनी संस्कृति से विमुख हो जाता है वह स्वत: ही पथ भ्रष्ट हो जाता है।
जब हम संस्कृति की बात करते है तो हम अपने भारत देश की संस्कृति पर गर्व करते हैं। किसी देश के नागरिकों का चरित्र ही उस देश की संस्कृति का प्रतिबिम्ब होता है। जिस भारत देश को हम माता कहते हैं, यह  हमारी संस्कृति ही है कि हम अपनी जन्मभूमि को माता का मानते देते हैं। लेकिन आज का युवा अपनी मूल संस्कृति से भटक चुका है, वह अपने स्वर्णिम इतिहास को भूलकर दूसरों की कही बात का अनुसरण करता है।वास्तव में उस भारत के नागरिकों का चरित्र आज के आधुनिक नग्नता वाले नागरिकों से भिन्न रहा है। श्रीराम जैसे चरित्र के पुरुष और सीता, अनुसुइया, सावित्री जैसी नारियों का यह देश रहा है। हमनें कभी भौतिक सुखों की चाह में नैतिकता का हनन नही होने दिया था। आज का यूवा उन महापुरुषों से स्वयं की तुलना करता है जिनके सामने जमीन में रेंगते कीड़ों के अतिरिक्त कुछ नही है।
हम सदैव श्रीकृष्ण के चरित्र पर संदेह करते हैं यह सिर्फ अल्प ज्ञान के कारण, यदि हमें पता होता कि श्रीकृष्ण नें 16108 स्त्रियों को अपनी पत्नी का स्थान क्यों दिया तो शायद इस तरह की मूर्खता पूर्ण बात आज का युवा न कर रहा होता।
भारतीय संस्कृति में  यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता  का पाठ पूरी दुनिया को सिखाया है। जो संसार स्त्री को मात्र उपभोग की वस्तु मानता आ रहा था उस दुनिया को अर्धांगिनी की भावना से जोड़ा है। एक पत्नी व्रत की धारणा भी हमारी संस्कृति का अंग है, अगर  देश की स्त्री राजमहलों के सुखों को त्यागकर अपने पति के साथ जंगल जाती है तो पति अपनी पत्नी की आन के लिए दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति का सर्वनाश कर देता है। हमारे देश में स्त्री की मर्यादा हनन करने वाले का मूल नास किया गया है जिसके लिए महाभारत और राम रावण युद्ध तो उदाहरण मात्र ही हैं। भारत माता नें उन पुत्रों को जन्म दिया है, जिन्होंने स्त्री को अपनी माता, बहन,पुत्री जैसे पवित्र बंधनों से जोड़ा है। किसी दूसरे की पत्नी का हरण करने पर श्रीराम ने सभी मर्यादा तोड़कर बालि का वध किया है तो स्त्री के अपमान का दण्ड दिलाने के लिए श्रीकृष्ण ने महाभारत का युद्ध करा दिया है। इस देश की स्त्री की नैतिक और चारित्रिक सुदृढ़ता नें स्त्री को देवी का दर्जा दिया है। इसके लिए किसी की दया भावना की जरूरत नही पड़ी बल्कि स्त्रियों ने अपने आपको इस काबिल बनाया कि पुरुष उनका सम्मान करें। जिस तरह आज के पुरुषों से भिन्न हमारे देश में मर्यादित पुरुषों की परम्परा रही है वैसे ही  आज की नग्नता परोसने वाली नारी के स्थान पर भारत की नारियों ने अपने चरित्र और सतित्व के बल पर त्रिदेवों को भी अपने सामने नतमस्तक किया है। रावण जैसा भौतिक सम्पदा से सम्पन्न व्यक्ति भी सीता को अपनी ओर आकर्षित न कर सका । हमारी संस्कृति को उन सावित्री  ने प्रदर्शित किया है जिनके सामने मृत्यु के देवता भी झुक गए हैं। यदि किसी नें असत्य का मार्ग अपनाया है तो दुर्गा और चण्डी का रूप लेकर भारत माता की बेटियों ने उन दुष्टों का वध किया है।  
निष्कर्ष के रूप में हम एक बात कह सकते हैं कि भारत की संस्कृति कभी भी भौतिक सुखों की चाह में नैतिक पतन की परम्परा वाली नही रही है। जैसे की आज हमें दिख रही है। हमारे देश को , हमारी संस्कृति को हमारे चरित्र के दम पर पहचान मिली। सम्पदा तो रावण के पास भी थी परन्तु चारित्रिक पतन ने उसका सर्वनास कर डाला। वहीं राम के चरित्र ने उन्हें देवतुल्य बना दिया।

अब गेंद आपके पाले में है कि हमें रावण बन कर हर वर्ष जलना है या फिर राम बन कर सबके दिलों में बसना है। सीता बन कर आदर्श बनना है या फिर सूर्पणखा की तरह अपने नाक कान कटा कर उपहास का पात्र बनना है।

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